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प्रो प्रदीप माथुर

नई दिल्ली | शनिवार | 1 नवंबर 2025

बिहार के चुनाव हमेशा राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में रहे हैं। यह केवल एक राज्य का चुनाव नहीं होता, बल्कि पूरे देश के राजनीतिक तापमान का संकेतक भी होता है। बिहार के 40 लोकसभा क्षेत्र, गहरी राजनीतिक चेतना और सशक्त जनमत इसे एक निर्णायक भूमिका में रखते हैं।

आज फिर से बिहार सुर्खियों में है—जहाँ नीतीश कुमार, तेजस्वी यादव और प्रशांत किशोर जैसे नेता राज्य की सत्ता के लिए संघर्षरत हैं। इस बार का परिदृश्य पहले से कहीं अधिक जटिल और रोचक है। जातीय समीकरणों, सामाजिक न्याय, युवा नेतृत्व और नए राजनीतिक प्रयोगों की टकराहट ने बिहार को एक बार फिर से भारतीय राजनीति की प्रयोगशाला बना दिया है।

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एनडीए की दुविधा : नेतृत्व का प्रश्न

एनडीए गठबंधन इस बार भी मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित करने से बच रहा है। भाजपा के भीतर और जदयू के साथ रिश्तों में खिंचाव किसी से छिपा नहीं है। भाजपा, बड़ी पार्टी होते हुए भी, लंबे समय से नीतीश कुमार के नेतृत्व को स्वीकारती रही है, परंतु अब परिस्थितियाँ बदल रही हैं।

प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी के मैदान में उतरने से भाजपा को ऊपरी जातियों के वोट बैंक के बिखरने की चिंता है। भाजपा की परंपरागत मजबूती इन वर्गों में रही है, और किशोर का प्रभाव इन्हीं तबकों में तेज़ी से बढ़ता दिख रहा है। ऐसे में भाजपा न तो खुलकर नीतीश कुमार को आगे करना चाहती है, न ही अपने किसी नए चेहरे को घोषित करने का जोखिम उठाना चाहती है।

दूसरी ओर, महागठबंधन ने तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री प्रत्याशी घोषित कर स्पष्टता दिखाई है। यह कदम रणनीतिक दृष्टि से उसे स्थिरता देता है, जबकि एनडीए की असमंजस स्थिति जनता के बीच प्रश्न खड़े करती है।

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प्रशांत किशोर : रणनीतिकार से चुनौतीकर्ता तक

प्रशांत किशोर बिहार की राजनीति के सबसे दिलचस्प पात्र बन चुके हैं। कभी नरेंद्र मोदी और ममता बनर्जी जैसे नेताओं के लिए रणनीति बनाने वाले किशोर अब स्वयं मैदान में उतर चुके हैं। बहुतों का मानना है कि वे भाजपा की “बी-टीम” हैं, परंतु सच्चाई इससे कहीं अधिक जटिल है।

उनका समर्थन आधार वही ऊँची जातियाँ और शहरी तबके हैं, जो कभी भाजपा की रीढ़ माने जाते थे। ऐसे में जन सुराज पार्टी का उभार सीधे भाजपा के पारंपरिक वोट बैंक को चुनौती देता है। किशोर न पूरी तरह भाजपा विरोधी हैं, न समर्थक—पर उनकी मौजूदगी से चुनावी गणित निश्चित रूप से बदल जाएगा।

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फ्रीबीज़ की राजनीति और मतदाता की समझ

बिहार में इस बार सरकार ने महिलाओं को ₹10,000 तक का डायरेक्ट ट्रांसफर दिया है, वहीं महागठबंधन ने हर परिवार से एक व्यक्ति को नौकरी देने का वादा किया है। ऐसी घोषणाएँ अब भारतीय राजनीति का सामान्य हिस्सा बन चुकी हैं।

परंतु अब जनता की समझ बदल चुकी है। मतदाता जानते हैं कि ये धनराशियाँ सरकारी संसाधनों से आती हैं, किसी नेता की जेब से नहीं। अब मतदाता केवल ‘फ्रीबीज़’ पर नहीं, बल्कि रोजगार, शिक्षा और विकास जैसे ठोस मुद्दों पर भी विचार करते हैं। बिहार में इस सोच का विस्तार लोकतंत्र के परिपक्व होने का संकेत है।

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सामाजिक न्याय बनाम जातिवाद : एक शाश्वत बहस

बिहार की राजनीति की धुरी हमेशा “सामाजिक न्याय” रही है। लेकिन समय-समय पर यह बहस जातिवाद के आरोपों में उलझ जाती है। जातिवाद का आरोप अक्सर वे लगाते हैं, जो नहीं चाहते कि पिछड़े और दलित वर्ग सशक्त हों।

लालू यादव के दौर में ऊँची जातियों के वर्चस्व को पहली बार चुनौती मिली, जिसने सामाजिक ढाँचे में बड़ा परिवर्तन किया। आज भी जाति बिहार की राजनीति का कारक है, परंतु नई पीढ़ी के लिए यह निर्णायक नहीं रह गया है। अब चर्चा बेरोजगारी, शिक्षा और अवसरों की समानता पर केंद्रित है।

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नीतीश कुमार : स्थिरता या थकान का प्रतीक?

नीतीश कुमार पिछले दो दशकों से बिहार की राजनीति के केंद्र में हैं। उन्होंने एनडीए और महागठबंधन दोनों के साथ सत्ता साझा की है। लेकिन अब जनता के बीच यह सवाल गूंज रहा है—क्या उन पर अब भी भरोसा किया जा सकता है?

नीतीश अब भी राजनीति के एक महत्वपूर्ण पात्र हैं, पर मुख्य किरदार नहीं। भाजपा उन्हें राजनीतिक मजबूरी में साथ रखे हुए है। उम्र और बार-बार गठबंधन बदलने की प्रवृत्ति से जनता में थकान का भाव उभर रहा है। यह संभावना प्रबल है कि यह उनका अंतिम चुनाव हो।

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युवा चेहरों का उभार : नई राजनीति की दस्तक

बिहार में इस बार युवा नेतृत्व का प्रभाव स्पष्ट रूप से बढ़ा है। तेजस्वी यादव, चिराग पासवान, मुकेश सहनी, और निश्चय कुमार—all represent a generational shift.

इन युवा नेताओं में ऊर्जा, संवाद क्षमता और जनसंपर्क की निपुणता है। वे सोशल मीडिया के माध्यम से भी व्यापक जनमत तैयार कर रहे हैं—यह पुरानी शैली की राजनीति से भिन्न है। भाजपा के पास फिलहाल ऐसा कोई युवा चेहरा नहीं है जो इनसे सीधी टक्कर ले सके, और यही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बनती जा रही है।

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मल्लाह जाति और राजनीतिक गणित

बिहार के सामाजिक समीकरण में मल्लाह जाति की भूमिका निर्णायक बन चुकी है। लगभग 34 लाख मल्लाह मतदाता कई सीटों के नतीजे पलट सकते हैं। महागठबंधन द्वारा मुकेश सहनी को उपमुख्यमंत्री पद का संभावित उम्मीदवार घोषित करना इसी रणनीति का हिस्सा है। इस कदम से गठबंधन को नीचली जातियों में अतिरिक्त मजबूती मिली है।

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‘जंगलराज’ बनाम ‘सुशासन’ : पुरानी बहस का अंत

लालू यादव के शासनकाल को “जंगलराज” कहकर निशाना बनाना भाजपा की परंपरागत रणनीति रही है। परंतु अब यह मुद्दा पुराना हो चुका है। लालू बीस साल से सत्ता से बाहर हैं, और अब जंगलराज का डर केवल प्रचार का औजार रह गया है।

आलोचनाओं के बावजूद, लालू यादव ने बिहार में पिछड़े वर्गों को आवाज़ दी और उन्हें राजनीतिक प्रक्रिया में शामिल किया। ग्रामीण और गरीब तबकों में उनकी स्वीकार्यता अब भी बनी हुई है। इस बार मतदाता ‘जंगलराज बनाम सुशासन’ की बहस से आगे बढ़ चुके हैं।

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आर्थिक पिछड़ापन : विकास की असली चुनौती

बिहार की सबसे बड़ी समस्या उसका आर्थिक ढाँचा है। न उद्योग हैं, न पर्याप्त बुनियादी ढाँचा। राज्य अब भी कृषि पर निर्भर है, लेकिन यहाँ की कृषि निरंतर बाढ़ और सूखे की मार झेलती है।

नदियों पर पर्याप्त बाँध नहीं, सिंचाई का अभाव है। जब तक कृषि मजबूत नहीं होगी, ग्रामीण अर्थव्यवस्था भी कमजोर रहेगी। यही कारण है कि बिहार अब भी भारत के सबसे पिछड़े राज्यों में गिना जाता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि नदियों पर बाँध बन जाएँ और बाढ़ नियंत्रण सशक्त हो, तो राज्य कृषि क्रांति देख सकता है। पंजाब की तरह यहाँ भी हरित क्रांति संभव है, बशर्ते राजनीतिक इच्छाशक्ति और योजनाबद्ध निवेश हो।

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वामपंथ की वापसी : विचारधारा अब भी जीवित है

जहाँ देश के अधिकांश हिस्सों से वामपंथ लगभग लुप्त हो चुका है, वहीं बिहार में CPI(ML) अब भी सम्मानजनक उपस्थिति बनाए हुए है। महागठबंधन द्वारा वामपंथी दलों को लगभग 20 सीटें देना इसका प्रमाण है कि बिहार में विचारधारात्मक राजनीति अभी जीवित है।

यह दर्शाता है कि बिहार केवल जातीय या व्यक्तिवादी राजनीति का प्रदेश नहीं है; यह वैचारिक संघर्षों और जनआंदोलनों की भी भूमि है।

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अभिनेताओं और जनप्रिय चेहरों का प्रवेश

इस चुनाव में कई अभिनेता, गायक और कलाकार मैदान में हैं। कुछ इसे राजनीति के पतन के रूप में देखते हैं, पर लोकतांत्रिक दृष्टिकोण अलग है। लोकतंत्र में वही प्रतिनिधि बनता है जिसे जनता पसंद करती है।

यदि कोई अभिनेता या कलाकार जनता के बीच लोकप्रिय है और समाज की समझ रखता है, तो राजनीति में उसका प्रवेश अस्वाभाविक नहीं। राजनीति केवल विद्वानों की बपौती नहीं, बल्कि जनता से जुड़े व्यक्तियों की भागीदारी से ही सशक्त बनती है।

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राजनीति और जनता से जुड़ाव : जमीनी अनुभव का महत्व

राजनीति केवल स्टूडियो या टीवी डिबेट से नहीं सीखी जा सकती। जो नेता जनता के बीच रहते हैं, वही राजनीति की असली नब्ज़ समझ पाते हैं।

राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ और प्रशांत किशोर की ‘जन सुराज यात्रा’ इस तथ्य के उदाहरण हैं। दोनों नेताओं ने किताबों की राजनीति से निकलकर ज़मीन पर संवाद का रास्ता चुना। यह वही परंपरा है जो कभी जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से जन्मी थी—जनता के बीच जाकर राजनीति को नया अर्थ देना।

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बदलता बिहार : जाति से मुद्दों की ओर

इस बार का चुनाव केवल जातीय समीकरणों का नहीं, बल्कि मुद्दों का चुनाव बनता जा रहा है। बेरोजगारी, पलायन, शिक्षा और आर्थिक अवसरों की कमी जैसे प्रश्न अब लोगों के दिमाग में प्रमुख हैं।

जाति अब भी मौजूद है, लेकिन निर्णायक नहीं। नई पीढ़ी अपनी पहचान से अधिक अपने अवसरों और भविष्य को लेकर सजग है। यह सोच बिहार को एक नई दिशा में ले जा सकती है—जहाँ सामाजिक न्याय और आर्थिक विकास एक साथ चलें।

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निष्कर्ष : परिवर्तन की देहरी पर बिहार

बिहार इस समय संक्रमण के दौर में है। पुरानी राजनीति अपनी सीमाओं तक पहुँच चुकी है, और नई राजनीति दरवाज़े पर दस्तक दे रही है। सत्ता परिवर्तन अब केवल दलों का नहीं, बल्कि पीढ़ियों का होगा।

तेजस्वी यादव जैसे युवा नेता इस बार निर्णायक भूमिका में दिखाई देते हैं। नीतीश कुमार की राजनीतिक यात्रा अपने अंतिम चरण में प्रतीत होती है। भाजपा को नए नेतृत्व की तलाश करनी होगी, जबकि प्रशांत किशोर तीसरे ध्रुव के रूप में उभर सकते हैं।

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परिणाम की झलक और आगे की राह

यदि महागठबंधन को बहुमत मिलता है, तो तेजस्वी यादव मुख्यमंत्री पद के स्वाभाविक दावेदार होंगे। और यदि एनडीए सत्ता में लौटता है, तो भी नीतीश कुमार का दोबारा मुख्यमंत्री बनना कठिन दिखता है।

भाजपा के भीतर नेतृत्व परिवर्तन की आहट सुनी जा रही है, जबकि प्रशांत किशोर यदि 20–25 सीटें भी जीतने में सफल होते हैं, तो बिहार की राजनीति में एक स्थायी तीसरा विकल्प उभर आएगा।

बिहार बदल रहा है—यह अब केवल राजनीति का मैदान नहीं, बल्कि नए भारत की दिशा तय करने वाली भूमि बन चुका है।

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(समापन)

लेखक एक वरिष्ठ मीडिया विश्लेषक एवं शिक्षाविद् हैं।

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