भारत ने 1 जनवरी 2026 को ब्राजील से ब्रिक्स की अध्यक्षता ग्रहण की, जिसने पिछले वर्ष 17वें शिखर सम्मेलन की मेजबानी की थी। अब नई दिल्ली के नेतृत्व में दस उभरती अर्थव्यवस्थाओं का यह समूह अपने 18वें शिखर सम्मेलन की तैयारी कर रहा है, ऐसे समय में जब अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था अभूतपूर्व दबाव में है। वैश्विक प्रणाली पहले ही यूक्रेन और पश्चिम एशिया के संघर्षों, ऊर्जा अस्थिरता और आर्थिक अनिश्चितता से जूझ रही है। इस पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की आक्रामक, लेन–देन आधारित विदेश नीति की वापसी ने स्थिति को और अधिक जटिल बना दिया है। मित्र और प्रतिद्वंद्वी, दोनों ही अब शुल्क, प्रतिबंध और राजनीतिक दबाव का सामना कर रहे हैं, अक्सर बहुपक्षीय संस्थानों और अंतरराष्ट्रीय कानून की परवाह किए बिना।
इसी पृष्ठभूमि में यह सवाल तेज़ी से उभर रहा है कि क्या भारत के नेतृत्व में ब्रिक्स वाशिंगटन के एकतरफावाद के लिए एक विश्वसनीय संतुलनकारी शक्ति बन सकता है, या फिर यह एक ढीला-ढाला मंच बना रहेगा जो अपने आर्थिक वजन को रणनीतिक प्रभाव में बदलने में असमर्थ है। ट्रम्प द्वारा व्यापार युद्ध की भाषा को फिर से जीवित करना और देशों को “अमेरिका-विरोधी गुटों” से दूरी बनाने की चेतावनी देना इस बहस को और अधिक प्रासंगिक बना देता है।
ब्रिक्स की उत्पत्ति मूलतः एक आर्थिक अवधारणा से हुई थी। 2001 में गोल्डमैन सैक्स के अर्थशास्त्री जिम ओ’नील ने “ब्रिक” शब्द गढ़ा था, जिसमें ब्राजील, रूस, भारत और चीन को वैश्विक अर्थव्यवस्था के भविष्य के चालक के रूप में देखा गया था। 2006 से यह एक राजनीतिक मंच के रूप में विकसित हुआ और 2010 में दक्षिण अफ्रीका के शामिल होने के बाद “ब्रिक्स” बना। बाद के वर्षों में मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात और इंडोनेशिया जैसे देशों के जुड़ने से इसका विस्तार हुआ, जिससे यह केवल एक निवेश श्रेणी न रहकर ग्लोबल साउथ की सामूहिक आकांक्षाओं का प्रतीक बन गया।
आज ब्रिक्स देश विश्व की लगभग आधी आबादी और वैश्विक जीडीपी के एक चौथाई से अधिक का प्रतिनिधित्व करते हैं। न्यू डेवलपमेंट बैंक, आकस्मिक रिज़र्व व्यवस्था, केंद्रीय बैंकों का सहयोग ढांचा, थिंक टैंक नेटवर्क और भुगतान प्रणालियाँ इस मंच को एक ठोस संस्थागत आधार देती हैं। इनका उद्देश्य विश्व बैंक और आईएमएफ जैसी पश्चिम-प्रधान संस्थाओं के प्रभुत्व को संतुलित करना और विकासशील देशों को अधिक आवाज़ देना है।
सबसे संवेदनशील मुद्दा अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने की बढ़ती चर्चा है। डी-डॉलरीकरण अभी एक समान और त्वरित प्रक्रिया नहीं है, लेकिन यह अमेरिका की वित्तीय शक्ति की जड़ पर चोट करता है। इसी संदर्भ में भारतीय रिज़र्व बैंक का यह प्रस्ताव कि ब्रिक्स देशों की केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्राओं (सीबीडीसी) को आपस में जोड़ा जाए, खासा महत्व रखता है। इससे सीमा-पार व्यापार और पर्यटन भुगतान स्थानीय डिजिटल मुद्राओं में संभव हो सकते हैं और डॉलर पर निर्भरता घट सकती है।
सूत्रों के अनुसार, आरबीआई ने सुझाव दिया है कि सीबीडीसी की आपसी संगतता (इंटरऑपरेबिलिटी) को 2026 ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के एजेंडे में रखा जाए। यह 2025 की रियो घोषणा में भुगतान प्रणालियों के एकीकरण के आह्वान का ही विस्तार है। भारत पहले ही ई-रुपये को अन्य डिजिटल मुद्राओं से जोड़ने में रुचि दिखा चुका है, ताकि लेन-देन तेज़ हों और रुपये का अंतरराष्ट्रीय उपयोग बढ़े, हालांकि आधिकारिक रूप से इसे डी-डॉलरीकरण की रणनीति नहीं बताया गया है।
ब्रिक्स के प्रमुख सदस्य—भारत, चीन, रूस और ब्राजील—सभी अपनी डिजिटल मुद्राओं पर प्रयोग कर रहे हैं। चीन डिजिटल युआन को अंतरराष्ट्रीय मंच पर आगे बढ़ा रहा है, जबकि भारत ने ई-रुपये में ऑफलाइन भुगतान और सरकारी हस्तांतरण जैसी सुविधाएँ जोड़ी हैं। यदि इन प्रणालियों को जोड़ा जाता है तो लेन-देन की लागत घट सकती है और पश्चिमी वित्तीय नेटवर्क पर निर्भरता कम हो सकती है।
लेकिन इसके राजनीतिक निहितार्थ गहरे हैं। अमेरिका पहले ही डॉलर को दरकिनार करने के प्रयासों के खिलाफ सख्त चेतावनी दे चुका है और दंडात्मक टैरिफ जैसे कदमों के संकेत दिए हैं। ट्रम्प द्वारा ब्रिक्स को संभावित “विरोधी ब्लॉक” के रूप में देखने की प्रवृत्ति नई दिल्ली के लिए एक रणनीतिक दुविधा खड़ी करती है। एक ओर, डिजिटल मुद्रा पहल से ब्रिक्स में भारत की नेतृत्व भूमिका मजबूत होगी; दूसरी ओर, इससे वाशिंगटन के साथ व्यापार और तकनीकी सहयोग पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल और विदेश मंत्री एस. जयशंकर किसी भी ऐसे कदम को लेकर सतर्क बताए जाते हैं जो अमेरिका के साथ संबंधों को अनावश्यक रूप से तनावपूर्ण बना दे। रूस के साथ स्थानीय मुद्रा में व्यापार का अनुभव भी चेतावनी देता है कि बिना मजबूत निपटान तंत्र और मुद्रा परिवर्तनीयता के, डॉलर को दरकिनार करना व्यावहारिक कठिनाइयाँ पैदा कर सकता है।
इसके अतिरिक्त, किसी साझा डिजिटल भुगतान नेटवर्क के लिए साइबर सुरक्षा, डेटा संरक्षण, तकनीकी मानकों और शासन नियमों पर सहमति आवश्यक होगी। संवेदनशील वित्तीय बुनियादी ढांचे को साझा करने में देशों की हिचकिचाहट प्रगति को धीमा कर सकती है।
इस प्रकार भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता ऐसे मोड़ पर आई है जहां अवसर और जोखिम दोनों असाधारण हैं। समूह की बढ़ती सदस्यता और संस्थागत ताकत उसे वैश्विक आर्थिक शासन में वास्तविक भूमिका निभाने का अवसर देती है, लेकिन आंतरिक विविधता और बाहरी दबाव उसे चुनौती भी देते हैं।
अंततः सवाल यह है कि क्या भारत महत्वाकांक्षा और विवेक के बीच संतुलन साधते हुए ब्रिक्स को एक प्रभावी, सुसंगत और विश्वसनीय बहुपक्षीय शक्ति में बदल पाएगा। डिजिटल मुद्रा सहयोग इस परीक्षा का प्रतीक है—यह वित्तीय नवाचार का मार्ग भी खोल सकता है और एक ध्रुवीकृत दुनिया में तनाव का नया केंद्र भी बन सकता है। भारत इस संतुलन को कैसे साधता है, इससे न केवल ब्रिक्स का भविष्य, बल्कि उभरती बहुध्रुवीय व्यवस्था में उसकी अपनी भूमिका भी तय होगी।
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