डॉ. सतीश मिश्रा
नई दिल्ली | शनिवार | 22 नवम्बर 2025
बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय द्वारा पूर्व प्रधानमंत्री और “फरार आरोपित” शेख हसीना को भारत से वापस सौंपने की मांग—और यह कहते हुए कि उन पर ट्रिब्यूनल द्वारा मौत की सजा सुनाई गई है—ने मोदी सरकार के लिए एक जटिल, दोहरी मुश्किल वाली स्थिति (Catch-22) खड़ी कर दी है।
अब सवाल यह है कि नई दिल्ली ढाका की इस मांग को स्वीकार करे या अस्वीकार कर दे।
भारत को भेजे एक पत्र में बांग्लादेश मंत्रालय ने दोनों देशों के बीच प्रत्यर्पण समझौते का हवाला देते हुए कहा है कि हसीना की वापसी सुनिश्चित करना भारत की “अनिवार्य जिम्मेदारी” है।
अगर नई दिल्ली इस मांग को ठुकराती है, तो इससे सभी द्विपक्षीय समझौतों पर सवाल उठेंगे और ढाका को महत्वपूर्ण समझौतों से पीछे हटने का बहाना मिल जाएगा।
बांग्लादेश विदेश मंत्रालय के पत्र में कहा गया है:
“इन व्यक्तियों को, जिन्हें मानवता के खिलाफ अपराधों में दोषी ठहराया गया है, किसी भी देश द्वारा शरण देना अत्यंत अनFriendly कदम होगा और न्याय की उपेक्षा होगी।”
मंत्रालय का इशारा इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल (ICT-BD) की आज की टिप्पणियों की ओर था, जिसमें हसीना और पूर्व गृह मंत्री असदुज़्ज़मान खान कमाल को पिछले वर्ष छात्रों पर हुए दमन को लेकर कई मामलों में दोषी पाया गया है।
हसीना और खान के अलावा, पूर्व आईजीपी चौधरी अब्दुल्ला अल-मामून को भी “मानवता के खिलाफ अपराध” के लिए दोषी ठहराया गया है।
पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को बांग्लादेश में बड़े पैमाने पर छात्र आंदोलन के कारण सत्ता से बाहर होना पड़ा था।
पिछले वर्ष जुलाई में देश में बड़े विरोध प्रदर्शनों ने सरकार को हिला दिया, जिसका परिणाम अगस्त में उनकी सरकार के पतन और उनके पद से हटने के रूप में सामने आया।
तब से हसीना भारत में स्व-निर्वासन (self-exile) में रह रही हैं।
उनके बेटे सजीब वाजेद के अनुसार, वे दिल्ली में एक गुप्त सुरक्षित स्थान पर हैं, जहाँ भारत उन्हें पूर्ण सुरक्षा प्रदान कर रहा है।
उन्होंने अपने एक ईमेल बयान में लिखा था,
“मुझे भारतीय जनता का गहरा आभार है, जिन्होंने पिछले एक वर्ष में मुझे सुरक्षित आश्रय दिया।”
78 वर्षीय हसीना ने बांग्लादेश अदालत के उस आदेश की अवहेलना भी की, जिसमें उन्हें भारत से लौटकर अपने मुकदमे में पेश होने को कहा गया था—जहाँ यह तय होना था कि क्या उन्होंने उस छात्र-आंदोलन पर हिंसक कार्रवाई का आदेश दिया था, जिसके चलते उनकी सरकार गिर गई।
मौत की सजा पर प्रतिक्रिया देते हुए शेख हसीना ने अदालत के आरोपों को गलत बताया और कहा कि फैसला एक “धांधली वाले ट्रिब्यूनल ने दिया है, जिसे एक गैर-निर्वाचित सरकार ने बिना किसी लोकतांत्रिक जनादेश के स्थापित और संचालित किया है।”
उन्होंने अपने बयान में कहा:
“वे पक्षपाती और राजनीतिक रूप से प्रेरित हैं। मौत की सज़ा की उनकी मांग अंतरिम सरकार के चरमपंथी तत्वों की स्पष्ट और खतरनाक मंशा को दिखाती है—कि वे बांग्लादेश की आखिरी निर्वाचित प्रधानमंत्री को समाप्त करना चाहते हैं और अवामी लीग को एक राजनीतिक शक्ति के रूप में खत्म करना चाहते हैं।”
भारत की विदेश नीति के सामने गंभीर चुनौती
हसीना को प्रत्यर्पित करने की ढाका की मांग ने भारत की विदेश नीति के लिए कई चुनौतियाँ पैदा कर दी हैं।
अगर भारत इसे स्वीकार नहीं करता है, तो बांग्लादेश के चीन–पाकिस्तान खेमे में झुकने की संभावना बढ़ जाएगी—जिसका मतलब होगा कि भारत की सीमा अधिक असुरक्षित हो जाएगी, और आतंकवादियों की घुसपैठ, ड्रग तस्करी, स्मगलिंग तथा अन्य अवैध गतिविधियाँ और बढ़ेंगी।
मोदी सरकार पिछले कई महीनों से हसीना के प्रत्यर्पण के मुद्दे पर निर्णय टालती रही है, लेकिन अब मौत की सजा के बाद उसके विकल्प और सीमित हो गए हैं।
अगर भारत हसीना को प्रत्यर्पित करने का निर्णय लेता है, तो इसे इस रूप में देखा जाएगा कि नई दिल्ली ने अपने सबसे भरोसेमंद पड़ोसी मित्रों में से एक को मुश्किल समय में छोड़ दिया।
दोनों ही स्थितियों में मोदी सरकार “पुरे संकट” में है।
(डॉ. सतीश मिश्रा वरिष्ठ पत्रकार और अनुभवी राजनीतिक विश्लेषक हैं। वे ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन में सीनियर फ़ेलो रह चुके हैं।)
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