बीएमसी चुनाव, जनभागीदारी और लोकतंत्र की परीक्षा
लगभग साढ़े तीन वर्षों के लंबे अंतराल के बाद आखिरकार महाराष्ट्र राज्य निर्वाचन आयोग ने मुंबई महानगर पालिका (बीएमसी) समेत 29 महानगरपालिकाओं के चुनाव की तारीखों का ऐलान कर दिया है। मुंबई नगर निगम के निर्वाचित पार्षदों का कार्यकाल 7 मार्च 2022 को समाप्त हो गया था, जिसके बाद से यह एशिया की सबसे अमीर महानगरपालिका प्रशासकों के भरोसे चल रही थी। अब जब चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो रही है, तो यह केवल एक स्थानीय निकाय का चुनाव नहीं, बल्कि महाराष्ट्र की राजनीति का ‘सेमीफाइनल’ माना जा रहा है।
मुंबई महानगरपालिका का वार्षिक बजट कई छोटे राज्यों के बजट से भी अधिक है। 227 वार्डों वाली इस संस्था पर नियंत्रण का अर्थ है—शहर की ज़मीन, बुनियादी ढांचे, सार्वजनिक सेवाओं और अरबों रुपये के संसाधनों पर प्रभावी पकड़। ऐसे में यह चुनाव स्वाभाविक रूप से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक संदर्भों से भी जोड़ा जा रहा है।
इसी पृष्ठभूमि में हाल ही में न्यूयॉर्क के मेयर चुनाव का उदाहरण बार-बार सामने लाया जा रहा है। वहां एक अपेक्षाकृत साधारण पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवार ने, न तो बड़े धनबल के सहारे और न ही कॉर्पोरेट या मीडिया समर्थन के बल पर, बल्कि व्यापक जनभागीदारी और वैचारिक स्पष्टता के दम पर सत्ता प्रतिष्ठान को चुनौती दी। सवाल यह है कि क्या ऐसा ही कोई राजनीतिक उलटफेर मुंबई जैसे महानगर में संभव है?
चुनाव टालने की राजनीति और लोकतांत्रिक संकट
राजनीतिक विश्लेषकों और विपक्षी दलों का आरोप है कि पिछले कई वर्षों से महाराष्ट्र में स्थानीय निकाय चुनाव जानबूझकर टाले गए। 74वें संविधान संशोधन का मूल उद्देश्य सत्ता के विकेंद्रीकरण और शहरी नागरिकों की भागीदारी को मज़बूत करना था, लेकिन व्यवहार में नगरपालिकाओं को नौकरशाही नियंत्रण में रखा गया। इससे न केवल जनप्रतिनिधियों की भूमिका समाप्त हुई, बल्कि भ्रष्टाचार और अपारदर्शिता भी बढ़ी।
विपक्ष का कहना है कि यदि सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट निर्देश नहीं आता, तो शायद ये चुनाव और आगे टल जाते। स्थानीय निकायों में निर्वाचित प्रतिनिधियों के अभाव का सीधा असर नागरिक सुविधाओं पर पड़ा—सड़कों की हालत, सार्वजनिक परिवहन, स्वास्थ्य सेवाएं, सफाई व्यवस्था और आवास जैसी बुनियादी ज़रूरतें बुरी तरह प्रभावित हुईं।
मुंबई बनाम न्यूयॉर्क: समानताएं और सबक
न्यूयॉर्क और मुंबई—दोनों अपने-अपने देशों की आर्थिक राजधानियां हैं। दोनों ही शहरों में कॉर्पोरेट पूंजी, रियल एस्टेट और बड़े बुनियादी ढांचा प्रोजेक्ट्स का दबदबा है। न्यूयॉर्क के चुनाव में जिस तरह ‘क्रोनी कैपिटलिज़्म’ के खिलाफ जनाक्रोश सामने आया, वही भावना मुंबई में भी दिखाई देने लगी है।
मुंबई में बड़े प्रोजेक्ट्स, मेट्रो निर्माण, सड़कें, एयरपोर्ट, ज़मीन का व्यावसायीकरण और सार्वजनिक संपत्तियों के निजीकरण को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। बीएमसी के विशाल कोष और संपत्तियों पर निजी कंपनियों की नज़र होने के आरोप भी आम हैं। ऐसे में न्यूयॉर्क का उदाहरण यह संकेत देता है कि यदि जनता संगठित हो, तो धन और सत्ता का प्रभुत्व अजेय नहीं रहता।
असली मुद्दे क्या होने चाहिए?
विशेषज्ञों का मानना है कि बीएमसी चुनाव में पहचान और ध्रुवीकरण की राजनीति के बजाय शुद्ध नागरिक मुद्दों को केंद्र में रखा जाना चाहिए। मुंबई आज जिन ज्वलंत समस्याओं से जूझ रही है, उनमें प्रमुख हैं—
• आवास संकट: झुग्गी-झोपड़ी पुनर्विकास, किफायती आवास और किरायेदारों के अधिकार
• सार्वजनिक परिवहन: बेस्ट बस सेवा का लगातार कमजोर होना, मेट्रो और लोकल के बीच तालमेल
• स्वास्थ्य सेवाएं: बीएमसी अस्पतालों की स्थिति, निजीकरण का खतरा
• पर्यावरण और बुनियादी ढांचा: सड़कों की हालत, बाढ़, नालों की सफाई
• भ्रष्टाचार और पारदर्शिता: ठेकों, परियोजनाओं और बजट खर्च पर निगरानी
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि जब चुनाव जनता की रोज़मर्रा की ज़िंदगी से जुड़े मुद्दों पर लड़ा जाता है, तो लोगों को यह ‘अपनी लड़ाई’ लगती है—जैसा न्यूयॉर्क में हुआ।
एकता बनाम बिखराव
बीएमसी चुनाव में विपक्षी दलों के बीच तालमेल एक बड़ा प्रश्न बना हुआ है। महाविकास आघाड़ी ने लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ लड़े, लेकिन नगर निगम चुनावों में ज़मीनी समीकरण अलग होते हैं। वहीं कुछ दलों ने अपने पुराने अनुभवों के आधार पर अकेले लड़ने का निर्णय भी लिया है।
राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार, असली चुनौती यह है कि मतों का अनावश्यक विभाजन न हो और चुनाव ध्रुवीकरण की बजाय विकास और लोकतांत्रिक मूल्यों के इर्द-गिर्द घूमे। न्यूयॉर्क चुनाव का सबसे बड़ा सबक यही है कि वैचारिक स्पष्टता, डर से मुक्ति और जनता के बीच सीधा संवाद किसी भी चुनावी गणित को बदल सकता है।
निष्कर्ष: क्या मुंबई में बदलाव संभव है?
मुंबई का इतिहास गवाह है कि यह शहर केवल पूंजी का नहीं, बल्कि संघर्ष, विविधता और लोकतांत्रिक चेतना का भी केंद्र रहा है। संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन से लेकर मज़दूर आंदोलनों तक, मुंबई ने बार-बार यह दिखाया है कि जब नागरिक संगठित होते हैं, तो वे सत्ता की दिशा बदल सकते हैं।
बीएमसी चुनाव इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे तय करेंगे कि मुंबई का भविष्य जनहित के हाथों में होगा या कॉर्पोरेट हितों के। न्यूयॉर्क में जो हुआ, वह कोई चमत्कार नहीं था—वह संगठित जनभागीदारी का परिणाम था। सवाल यह नहीं कि क्या न्यूयॉर्क मुंबई बन सकता है, बल्कि यह है कि क्या मुंबई अपनी लोकतांत्रिक आत्मा को फिर से पहचानने के लिए तैयार है।
आने वाले बीएमसी चुनाव इसी सवाल का उत्तर देंगे।
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