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प्रभजोत सिंह

A person wearing a red turban

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नई दिल्ली | शनिवार | 8 नवंबर 2025

क संत, उपदेशक, पैग़ंबर, आधुनिक युग के धर्म के प्रवर्तक और स्त्री–पुरुष समानता, मानव समानता तथा “सर्बत दा भला” – सबके कल्याण – के महान प्रवक्ता। ये सभी विशेषण भी गुरु नानक देव जी के व्यक्तित्व को पूर्ण रूप से नहीं बयाँ कर पाते। पहले सिख गुरु, गुरु नानक देव जी का प्रकाश पर्व अब वैश्विक आयोजन बन चुका है। दुनिया भर के गुरुद्वारों में अखंड पाठ – श्री गुरु ग्रंथ साहिब का निरंतर पाठ – के साथ भव्य आयोजन हो रहे हैं। सिख समुदाय अपने घरों और व्यापारिक स्थलों को रोशनी से सजाता है और गुरुद्वारे जगमगाते हुए विशेष कीर्तन दरबारों से गूँज उठते हैं।

1469 में शेखूपुरा (वर्तमान पाकिस्तान) के ननकाना साहिब में एक साधारण व्यापारी परिवार में जन्मे गुरु नानक देव जी ने न केवल समाज को रूढ़ियों और अंधविश्वासों से मुक्त करने का बीड़ा उठाया, बल्कि समानता, धार्मिक सौहार्द और सार्वभौमिक भाईचारे का संदेश दिया।

556 वर्ष बीत जाने के बाद भी उनकी शिक्षाएं आज के समय में और अधिक प्रासंगिक हैं। जब दुनिया धार्मिक असहिष्णुता, साम्प्रदायिक विभाजन, लैंगिक असंतुलन और सामाजिक विघटन जैसी चुनौतियों से जूझ रही है, गुरु नानक का संदेश मानवता के लिए दिशा-सूचक बन जाता है।

दुनिया भर में गुरु नानक देव जी के 556वें प्रकाश पर्व के अवसर पर अखंड पाठ साहिब के आरंभ के साथ उत्सव प्रारंभ हो चुका है। आज का विभाजित संसार भी उनके “लंगर” – सामुदायिक रसोई – के विचार की सराहना करता है, जहाँ हजारों भूखे, बेघर और पीड़ित लोगों को बिना किसी भेदभाव के भोजन मिलता है। न किसी की जाति पूछी जाती है, न धर्म, न देश।

गुरु नानक देव जी ने न केवल सामाजिक बुराइयों के खिलाफ आंदोलन चलाया बल्कि उन्होंने एक साधारण, श्रमशील और संतुष्ट जीवन जीने का उपदेश भी दिया।

कपूरथला जिले के सुल्तानपुर लोधी में उनके जीवन का एक अहम हिस्सा बीता। यही स्थान आज भी विश्वभर से श्रद्धालुओं, धार्मिक नेताओं और विचारकों को आकर्षित करता है।

भारत सरकार और शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) के प्रयासों से पाकिस्तान सरकार ने श्री करतारपुर साहिब के लिए एक “कॉरिडोर” – गलियारा – खोला, जहाँ गुरु नानक देव जी ने अपने अंतिम वर्ष बिताए। इस करतारपुर कॉरिडोर से प्रतिदिन पाँच हज़ार श्रद्धालु दर्शन कर सकते हैं।

पंजाब सदियों से भाईचारे, सेवा और प्रगति का केंद्र रहा है। जब गुरु नानक देव जी के पिता कालू मेहता ने उन्हें व्यापार शुरू करने के लिए 20 रुपये दिए, तो उन्होंने उससे सामान खरीदकर गरीबों को भोजन कराया। यही “गुरु का लंगर” परंपरा की शुरुआत थी, जो आज भी सिख धर्म की सबसे विशिष्ट पहचान है और जिसने विश्वभर में सामुदायिक रसोई की प्रेरणा दी।

हर सिख का स्वप्न होता है श्री करतारपुर साहिब और श्री ननकाना साहिब – गुरु नानक देव जी की जन्मस्थली – की तीर्थयात्रा करना। लेकिन 1947 के विभाजन के बाद ये पवित्र स्थल सीमाओं के उस पार चले गए। करतारपुर साहिब कॉरिडोर का खुलना दशकों बाद उस सपने के साकार होने जैसा है।

श्री करतारपुर साहिब गुरुद्वारा में श्रद्धालु प्रतिदिन सीमित संख्या में पहुँचते हैं। 2019 में आरंभ हुई इस यात्रा में प्रतिदिन 5,000 तीर्थयात्री भारतीय सीमा से होकर पाकिस्तान के नारोवाल जिले स्थित गुरुद्वारे तक पहुँचते हैं। सीमा पार करने के बाद वे इलेक्ट्रिक वैन से स्थल तक जाते हैं और वहाँ 20 अमेरिकी डॉलर का शुल्क अदा करते हैं। पाकिस्तान सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के सेवादार उन्हें ऐतिहासिक स्थल, संरचना और उसकी परंपराओं के बारे में बताते हैं।

नारोवाल में सिख परिवारों की संख्या बहुत कम है, लगभग 125–150। फिर भी यहाँ का वातावरण श्रद्धा और सेवा से भरा हुआ है। यहाँ स्थित कुआँ, जिसे गुरु नानक देव जी खेतों की सिंचाई के लिए प्रयोग करते थे, आज भी श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए सुरक्षित है। आसपास उनके खेत, सरोवर, दीवान हॉल, सराय और लंगर हॉल हैं।

करतारपुर साहिब का यह परिसर सफेद संगमरमर से निर्मित है और अपनी शांत भव्यता में गुरु नानक की शिक्षाओं को मूर्त रूप देता है। परिसर में एक संग्रहालय और विशाल प्रतीकात्मक कृपाण भी है, जिसे 2018 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इमरान खान ने इस गलियारे के उद्घाटन अवसर पर समर्पित किया था।

इस वर्ष जब दोनों पंजाब बाढ़ की विभीषिका से जूझ रहे थे, करतारपुर साहिब भी जलमग्न हो गया था। लेकिन पाकिस्तान सरकार ने तीव्र कार्रवाई कर उसे शीघ्र ही पूर्व स्थिति में बहाल किया। विडंबना यह है कि वही इमरान खान, जिन्होंने इस पवित्र स्थल को दुनिया के लिए खोला, आज अपने ही देश में कारावास झेल रहे हैं।

गुरु नानक देव जी ने सिख धर्म की स्थापना कर मानवता को न केवल नई दिशा दी बल्कि यह भी सिखाया कि सच्चा धर्म कर्म, सेवा और समानता में निहित है। उनकी वाणी और उनका जीवन आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना पाँच सदियों पहले था।

(लेखक प्रभजोत सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं, लंबे समय तक ‘द ट्रिब्यून’, चंडीगढ़ में रहे। खेल पत्रकारिता में उनका विशेष स्थान है। वर्तमान में वे कनाडा और भारत के बीच अपना समय बाँटते हैं।)

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