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बीके सुशांत

नई दिल्ली | शनिवार | 28 फरवरी 2026

राष्ट्रनिर्माण और जनमत को दिशा देने में मास मीडिया की भूमिका निर्विवाद रूप से केंद्रीय है। लोकतंत्र की जीवंतता, पारदर्शिता और जवाबदेही काफी हद तक इस बात पर निर्भर करती है कि मीडिया कितना सजग, स्वतंत्र और संतुलित है। ऐसे में “मीडिया वेलनेस” पर गंभीर विमर्श की पहल केवल स्वागतयोग्य नहीं, बल्कि समय की मांग है। प्रश्न यह नहीं कि पहल किसने की, बल्कि यह है कि आज के तनावपूर्ण, प्रतिस्पर्धी और तेज़ रफ्तार मीडिया परिवेश में इसकी प्रासंगिकता कितनी गहरी है।

मीडिया को अक्सर “हमेशा सक्रिय” संस्था के रूप में देखा जाता है। 24×7 न्यूज़ साइकिल, डिजिटल प्लेटफॉर्म की तात्कालिकता और सोशल मीडिया की निरंतरता ने पत्रकारों के कार्य-दबाव को कई गुना बढ़ा दिया है। ऐसे में जब मीडिया समाज, सरकार और संस्थाओं की जवाबदेही तय करता है, तो उससे पहले उसे स्वयं अपनी अंतरात्मा के प्रति जवाबदेह होना चाहिए। क्योंकि मूलतः मीडिया का दायित्व सार्वजनिक हित, सामाजिक कल्याण और मानवता की व्यापक भलाई के लिए है।

पत्रकारिता की पेशेवर संस्कृति ऐसी है जिसमें मीडिया कर्मियों से अपेक्षा की जाती है कि वे निजी सुख-सुविधाओं से ऊपर उठकर समाज की सेवा करें। संकट की घड़ी हो, चुनावी माहौल हो या आपदा की स्थिति—सबसे पहले और सबसे लंबे समय तक सक्रिय रहने की उम्मीद पत्रकारों से ही की जाती है। लेकिन विडंबना यह है कि मीडिया से निरंतर सेवा की अपेक्षा करने वाला समाज शायद ही कभी उनके स्वास्थ्य, मानसिक संतुलन और पारिवारिक जीवन के बारे में सोचता है। कुछ विचारकों ने तो यहां तक कहा है कि पत्रकारों ने दुनिया को उससे कहीं अधिक दिया है, जितना उन्हें बदले में मिला है।

यदि नागरिक समाज को मीडिया की जवाबदेही तय करने का अधिकार है, तो उसका कर्तव्य भी बनता है कि वह मीडिया कर्मियों के कल्याण के लिए ठोस कदमों का समर्थन करे। इसी संदर्भ में हाल ही में विज्ञान भवन में आयोजित “मीडिया वेलनेस: कर्मयोग इन एक्शन” कार्यक्रम उल्लेखनीय है। यह पहल इस विचार पर आधारित है कि मीडिया की प्रभावशीलता केवल तकनीकी दक्षता या संसाधनों से नहीं, बल्कि आंतरिक सशक्तिकरण से भी जुड़ी है।

मीडिया वेलनेस का सीधा अर्थ है—मीडिया कर्मियों का समग्र कल्याण। इसमें शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक संतुलन, भावनात्मक स्थिरता और नैतिक दृढ़ता सभी शामिल हैं। प्रश्न उठता है कि यह जिम्मेदारी किसकी है—सरकार की, समाज की या स्वयं मीडिया की? सरकार अपने नियंत्रण वाले मीडिया संस्थानों के लिए नीतियां बना सकती है, संसाधन उपलब्ध करा सकती है, प्रशिक्षण कार्यक्रम चला सकती है। लेकिन यदि कल्याण के नाम पर हस्तक्षेप या पूर्वाग्रह जुड़ जाए, तो मीडिया की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। स्वतंत्र पत्रकारों के लिए यह स्थिति “रोटी और स्वतंत्रता” के बीच कठिन चुनाव जैसी हो सकती है।

लोकतंत्र में प्रेस को चौथा स्तंभ कहा जाता है। वह सरकार का अंग नहीं, बल्कि उस पर निगरानी रखने वाला स्वतंत्र संस्थान है। उसकी भूमिका शासन के तीनों अंगों—विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका—के बीच संतुलन बनाए रखने में सहायक दबाव समूह की है। भारतीय संदर्भ में कुछ लोग प्रेस की शक्ति की तुलना भगवान शिव की तीसरी आंख से करते हैं—एक ऐसी दृष्टि जो सत्य को उजागर करती है। ऐसी स्थिति में मीडिया का कल्याण सत्ता का विशेषाधिकार नहीं, बल्कि उसकी स्वतंत्रता का पूरक होना चाहिए।

सरकार यदि मीडिया को नवीनतम संचार तकनीकों, डिजिटल सुरक्षा, एआई उपकरणों, प्रशिक्षण संसाधनों और सुरक्षित कार्य-परिस्थितियों के माध्यम से सशक्त बनाती है—और वह भी बिना किसी शर्त या हस्तक्षेप के—तो यह स्वागतयोग्य कदम होगा। डिजिटल युग में डिजिटल डिटॉक्स, साइबर सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम भी उतने ही आवश्यक हैं जितने पारंपरिक पत्रकारिता कौशल।

फिर भी, मीडिया वेलनेस का सबसे महत्वपूर्ण आयाम आत्म-प्रेरित है। बाहरी संस्थाएं—चाहे वे सरकारी हों या गैर-सरकारी—सहयोगी या सूत्रधार की भूमिका निभा सकती हैं, लेकिन वास्तविक परिवर्तन तभी संभव है जब पत्रकार स्वयं अपने जीवन में संतुलन और आत्मानुशासन को अपनाएं। यहीं “कर्मयोग” की अवधारणा सार्थक हो जाती है—कर्तव्य के साथ आंतरिक चेतना का समन्वय।

ब्रह्माकुमारी संगठन की पहल इसी दिशा में दीर्घकालिक प्रयासों का हिस्सा है। पिछले छह दशकों से यह संस्था मीडिया समुदाय के लिए आंतरिक सशक्तिकरण, सॉफ्ट स्किल विकास, तनाव प्रबंधन, ध्यान सत्र, कार्यशालाएं और राजयोग शिविर आयोजित करती रही है। इन कार्यक्रमों का उद्देश्य किसी प्रतिफल की अपेक्षा किए बिना मानवता की सेवा करना है। देश-विदेश में फैले उनके हजारों आध्यात्मिक अध्ययन केंद्रों के माध्यम से मीडिया कर्मियों को मानसिक शांति और आत्म-स्थिरता के साधन उपलब्ध कराए जाते हैं।

विज्ञान भवन में आयोजित सेमिनार, टॉक शो और राजयोग सत्रों का सार यही था कि पत्रकार अपने दैनिक पेशेवर कर्तव्यों के साथ ध्यान और योग को एकीकृत करें। जब कर्म के साथ योग जुड़ता है, तो कार्य केवल पेशा नहीं, बल्कि सेवा बन जाता है। इससे आंतरिक शक्ति, सकारात्मक सोच, मानवीय मूल्यों और नैतिक साहस का विकास होता है।

आज के प्रतिस्पर्धी और कभी-कभी विषाक्त मीडिया वातावरण में यह संतुलन अत्यंत आवश्यक है। सनसनी, टीआरपी और डिजिटल ट्रैफिक की दौड़ के बीच यदि पत्रकार अपने मूल्यों और मानसिक स्वास्थ्य की उपेक्षा करते हैं, तो दीर्घकाल में मीडिया की विश्वसनीयता भी प्रभावित होगी। अतः मीडिया वेलनेस केवल व्यक्तिगत कल्याण का विषय नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक स्वास्थ्य का प्रश्न है।

अंततः, मीडिया की शक्ति उसकी आंतरिक दृढ़ता और नैतिक स्पष्टता में निहित है। कर्मयोग की भावना के साथ जब पत्रकारिता की जाती है, तो वह केवल सूचना का माध्यम नहीं रहती—वह समाज को दिशा देने वाली सृजनात्मक शक्ति बन जाती है। यही मीडिया वेलनेस का वास्तविक अर्थ है—बाहरी सक्रियता के साथ आंतरिक शांति का संतुलन। (लेखक स्वतंत्र पत्रकार और ब्रह्माकुमारी संगठन के मीडिया प्रवक्ता हैं)

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