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प्रो. प्रदीप माथुर

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नई दिल्ली | शनिवार | 13 दिसंबर 2025

भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में संजय गांधी की उपस्थिति बहुत लंबी नहीं रही। दिसंबर 1971 के बांग्लादेश युद्ध के बाद वे सार्वजनिक तौर पर चर्चित होने लगे और जून 1980 में एक दुर्भाग्यपूर्ण हवाई दुर्घटना में उनका निधन हो गया। छोटी-सी सार्वजनिक जीवन यात्रा के बावजूद संजय गांधी ने समाज पर गहरी छाप छोड़ी, हालांकि उनकी विरासत मिश्रित रही।

संजय गांधी ने कभी कोई औपचारिक सरकारी पद नहीं संभाला। लेकिन उनकी मां प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी पर जब बढ़ते राजनीतिक विरोध और बिहार में जयप्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति तथा गुजरात में नव निर्माण आंदोलन—जिन्हें आरएसएस का गुप्त समर्थन प्राप्त था—का दबाव बढ़ने लगा, तब वे स्वाभाविक रूप से संजय गांधी की ओर झुकने लगीं। इस प्रकार संजय गांधी सार्वजनिक जीवन में अधिक प्रासंगिक होते गए और राजनीतिक वर्ग व मीडिया का ध्यान उनकी ओर गया।

व्यक्तित्व की तरह ही संजय गांधी की विरासत भी विरोधाभासों से भरी हुई थी। एक विदुषी मां और श्रेष्ठ पब्लिक स्कूल शिक्षा के बावजूद उन्हें पुस्तकों या गंभीर बौद्धिक कार्यों में कोई विशेष रुचि नहीं थी। वे व्यावहारिक कार्यों के धनी, त्वरित कार्रवाई में विश्वास रखने वाले, और युवाओं की अधीरता का प्रतीक थे।

अपने तरीके से संजय गांधी आधुनिक भारत की एक सशक्त दृष्टि रखते थे। उन्होंने युवा शक्ति को संगठित किया और देश को तेज़ विकास की दिशा में ले जाने के लिए जड़ता और यथास्थिति को तोड़ने का प्रयास किया। आपातकाल के दौरान प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार द्वारा उनके आग्रह पर घोषित 20-सूत्रीय कार्यक्रम सामाजिक-आर्थिक विकास की व्यापक दृष्टि को दर्शाता था। इसमें ग्रामीण विकास, वृक्षारोपण, जन्म नियंत्रण के साथ-साथ दहेज प्रथा जैसी सामाजिक कुप्रथा को समाप्त करने की बात शामिल थी, जो भारतीय नारी की गरिमा को आहत करती रही है।

संजय गांधी आने वाली भारतीय ऑटोमोबाइल क्रांति को भांप चुके थे। छोटे कार प्रोजेक्ट के लिए उनकी आलोचना की जाती रही, लेकिन मारुति कार की अपार सफलता ने सिद्ध कर दिया कि उनकी दृष्टि सही दिशा में थी। परिवार नियोजन और वृक्षारोपण पर उनका जोर बाद की सभी सरकारों की नीति में किसी न किसी रूप में शामिल रहा। यदि उनकी असामयिक मृत्यु न हुई होती तो देश की दिशा किस प्रकार बदलती, यह तो अनुमान का विषय है, परंतु अल्पकाल में भी उन्होंने कुछ ऐसे कार्य आरंभ किए जो देश को सही मार्ग पर ले गए।

संजय गांधी ने भारतीय राजनीति के अभिजात्यवाद के खिलाफ काम किया और उसे आम जनता के करीब लाया। हालांकि, उनकी वैचारिक गहराई की कमी ने राजनीति में कुछ अवांछित तत्वों के प्रवेश का रास्ता भी खोला।

बौद्धिक प्रशिक्षण की कमी और स्वभावगत अधीरता के कारण उन्होंने कुछ गंभीर गलतियां भी कीं। इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा इंदिरा गांधी का चुनाव अमान्य किए जाने के बाद आपातकाल घोषित करने का दबाव बनाना उनमें से एक बड़ी भूल थी। इससे नेहरू-गांधी परिवार और कांग्रेस पार्टी की छवि को स्थायी क्षति पहुंची। दूसरा बड़ा राजनीतिक नुकसान वामपंथी दलों को कांग्रेस से अलग-थलग कर देने का था, जिससे कांग्रेस की वैचारिक स्थिति कमजोर हुई और अंततः बीजेपी-आरएसएस जैसे दक्षिणपंथी, साम्प्रदायिक और बड़े उद्योगों के हितों का प्रतिनिधित्व करने वाली शक्तियों के उभार का मार्ग खुला।

जैसा कि अक्सर हमारे देश में होता है, परिवर्तन लाने की इच्छा रखने वाले हर व्यक्ति की तरह संजय गांधी भी आलोचना और दुष्प्रचार के शिकार बने। मैं स्वयं उन झूठी बातों का प्रत्यक्ष साक्षी हूं जो उनके खिलाफ सुनियोजित तरीके से फैलाई गईं।

मैं उस समय द ट्रिब्यून, चंडीगढ़ में कार्यरत था। 1972 या 1973 में एक उपचुनाव के दौरान संजय गांधी पंजाब आए थे। अगले दिन एक प्रमुख हिंदी अखबार ने उनकी रैली की खबर में एक छोटा-सा बॉक्स आइटम प्रकाशित किया—शीर्षक था “अंग्रेज़ी दा पुत्तर”। लिखा गया कि संजय गांधी हिंदी ठीक से नहीं बोलते और उनकी हिंदी अंग्रेज़ों जैसी है। मैंने यह पढ़कर सोचा कि शायद पब्लिक स्कूल की पृष्ठभूमि के कारण वे हिंदी में प्रवीण न हों। यह बात राजनीतिक रूप से भले ही महत्वपूर्ण न हो, पर आम पाठक के मन में उनके प्रति नकारात्मक धारणा जरूर बनती—यही उद्देश्य उनके विरोधियों का था।

फिर 1977 के आम चुनाव में संजय गांधी चंडीगढ़ आए। द ट्रिब्यून के लिए मेरा उनका साक्षात्कार तय हुआ। आधे घंटे की बातचीत के दौरान मुझे महसूस हुआ कि संजय गांधी अत्यंत शुद्ध हिंदी बोल रहे थे, जबकि अंग्रेज़ी पत्रकारिता के कारण मैं स्वयं अपने सवालों में अंग्रेज़ी के अनेक शब्दों का प्रयोग कर रहा था। तभी मुझे पांच वर्ष पहले पढ़ा हुआ वह भ्रामक समाचार-आइटम याद आया।

उसी समय उनके खिलाफ एक और अफवाह सुनने को मिली। एक दिन बाज़ार में मटन की दुकान पर खरीदारी करते हुए मैंने एक ग्राहक को कहते सुना कि संजय ने अपनी मां को थप्पड़ मार दिया। कारण बताया गया कि संजय अपने मनपसंद ब्रांड की शराब न लाने पर एक नौकर को डांट रहे थे और जब श्रीमती इंदिरा गांधी ने बीच-बचाव किया तो उन्होंने अपनी मां को थप्पड़ मार दिया। यह कथा जितनी चौंकाने वाली थी, उतनी ही अविश्वसनीय। लेकिन कुछ ही देर में ग्रॉसरी दुकान और फिर सब्ज़ी मंडी में भी वही कहानी सुनने मिली—मानो पूरा चंडीगढ़ उसे जान चुका हो।

दफ्तर लौटकर जब मैंने यह बात साथियों से साझा की तो उन्होंने भी बताया कि वे यह अफवाह सुन चुके हैं। यह आरएसएस की चुनावी अफवाह-फैक्ट्री की एक विशिष्ट उपज थी, जो उस समय पूरी गति से काम कर रही थी।

दुर्भाग्य है कि कांग्रेस ने कभी इस तरह के दुष्प्रचार का मुकाबला करने के लिए प्रभावी तंत्र विकसित नहीं किया—न तब, न अब। संभव है कि संजय गांधी ऐसे प्रयासों का नेतृत्व कर सकते थे, पर ईश्वर को कुछ और ही मंजूर था।

(वरिष्ठ पत्रकार और मीडिया गुरु प्रो. प्रदीप माथुर मेडियामैप न्यूज़ नेटवर्क के संपादक-इन-चीफ और एमबीकेएम फाउंडेशन के चेयरमैन हैं—यह संस्था सामाजिक कार्य के लिए समर्पित एक गैर-लाभकारी संगठन है।)

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