आर्थिक प्रगति से सामान्यतः आधुनिकीकरण की अपेक्षा की जाती है—जिससे जीवन स्तर में सुधार होता है और समाज में अधिक सूचित, तर्कसंगत तथा प्रबुद्ध दृष्टिकोण विकसित होता है। किंतु समकालीन भारत एक चिंताजनक विरोधाभास प्रस्तुत करता है। एक ओर अर्थव्यवस्था प्रभावशाली विकास दर दर्ज कर रही है और तकनीकी प्रगति दैनिक जीवन को नया रूप दे रही है, वहीं दूसरी ओर समाज कई महत्वपूर्ण सामाजिक सूचकों पर पीछे खिसकता हुआ दिखाई देता है।
उन्नीसवीं सदी के आरंभ, स्वतंत्रता आंदोलन और आज़ादी के तुरंत बाद के दशकों में दिखे सामाजिक सुधारवादी आग्रहों को मज़बूत करने के बजाय हम अंधविश्वास, रूढ़िवाद और अतार्किकता के पुनरुत्थान के साक्षी बन रहे हैं। इक्कीसवीं सदी में—जब अपेक्षाकृत छोटे देश भी वैज्ञानिक चेतना और नागरिक विवेक को सचेत रूप से विकसित कर चुके हैं—भारतीय समाज बढ़ते हुए पुनरुत्थानवादी विचार-ढाँचों में फँसा प्रतीत होता है। आधुनिक साधन और सुविधाएँ मध्ययुगीन मानसिकताओं के साथ असहज सह-अस्तित्व में हैं।
पिछले एक दशक में धार्मिक उन्माद में अभूतपूर्व वृद्धि देखी गई है। धार्मिक गतिविधियों पर होने वाला व्यय, विशेषकर बहुसंख्यक समुदाय के भीतर, चौंकाने वाला है। यदि बहुसंख्यक हिंदू समुदाय की बात करें, तो पूजा-पाठ और हवन में प्रयुक्त दैनिक अनुष्ठान सामग्रियों से जुड़े ‘आस्था उद्योग’ का आकार लगभग एक दशक पहले के अनुमानित ₹2,000 करोड़ से बढ़कर आज ₹15,000 करोड़ से अधिक हो गया है और आने वाले समय में इसके और बढ़ने के स्पष्ट संकेत हैं। केवल तीर्थयात्राओं पर होने वाला वार्षिक खर्च ही लगभग ₹1.4 लाख करोड़ आँका जाता है। इसके अतिरिक्त, धार्मिक आयोजनों की संख्या तथा विभिन्न प्रकार के धार्मिक गुरुओं की तादाद में भी अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। ऐसा प्रतीत होता है कि आस्था हमारी अर्थव्यवस्था के सबसे तेज़ी से बढ़ते क्षेत्रों में से एक बन गई है।
परंपरागत नैतिक तर्क के अनुसार बढ़ती धार्मिकता से अधिक ईश्वर-भययुक्त, करुणाशील और नैतिक रूप से सुदृढ़ नागरिक तैयार होने चाहिए। किंतु वास्तविकता इससे बिल्कुल भिन्न कहानी कहती है। अपराध दर चिंताजनक रूप से बढ़ रही है—क्षेत्रों और सामाजिक श्रेणियों की सीमाएँ लांघते हुए। इससे भी अधिक परेशान करने वाली बात समाज के सबसे कमजोर वर्गों—दलितों, अल्पसंख्यकों, महिलाओं और गरीबों—के विरुद्ध अपराधों में तीव्र वृद्धि है। यह प्रवृत्ति केवल कानून-व्यवस्था की विफलता का संकेत नहीं देती, बल्कि मानवीय मूल्यों और सामाजिक सहानुभूति के गहरे क्षरण की ओर इशारा करती है।
धार्मिक उपभोग के उछाल और बढ़ती सामाजिक क्रूरता का सह-अस्तित्व नैतिक सार के खोखलेपन को उजागर करता है। जब अनुष्ठान नैतिकता का स्थान ले लें और प्रदर्शन विवेक का विकल्प बन जाए, तब आस्था व्यवहार को सभ्य बनाने में असफल हो जाती है। हमारे सामने विरोधाभास स्पष्ट है: पहले कभी धर्म ने सार्वजनिक और निजी जीवन में इतना स्थान नहीं घेरा था, और न ही पहले कभी करुणा इतनी दुर्लभ लगी थी। यदि इस अंतर्विरोध का ईमानदारी से सामना नहीं किया गया, तो केवल आर्थिक वृद्धि ही नैतिक और सामाजिक पतन को नहीं रोक सकेगी।
प्रश्न यह है कि चूक कहाँ हो रही है और इस प्रवृत्ति को कैसे रोका जाए। स्पष्ट है कि उपदेशक और अनुयायी के बीच एक गहरा अंतराल है। लोग प्रवचन सुनते तो हैं, पर न तो उन्हें समझते हैं और न ही उन पवित्र व सद्गुणी शब्दों को आत्मसात करते हैं। प्रतीत होता है कि मूल समस्या संप्रेषण की है।
जैसे शासन, राज्य और चुनावी व्यवस्था से जुड़े संप्रेषण को ‘राजनीतिक संप्रेषण’ कहा जाता है, वैसे ही आस्था से जुड़े विषयों के संप्रेषण को ‘आध्यात्मिक संप्रेषण’ कहा जा सकता है। हमारे देश में आध्यात्मिक संप्रेषण से जुड़ी कई समस्याएँ हैं, जो गुरु या धार्मिक ज्ञानदाता और शिष्य या भक्त—जो इस ज्ञान को ग्रहण कर अपने जीवन और सोच को आकार देता है—के बीच की दूरी की जड़ में हैं।
संभवतः पहली समस्या यह है कि अधिकांश धार्मिक नेता, विशेषकर बहुसंख्यक समुदाय के, स्वयं अज्ञानी हैं और जिन मुद्दों से उन्हें निपटना चाहिए, उनकी समझ का अभाव रखते हैं। समस्या धार्मिक ज्ञान के साधकों में भी है। वे जो कुछ उन्हें दिया जाता है, उसे बिना तर्क की जाँच किए और अंधविश्वास के साथ स्वीकार कर लेते हैं।
इसी अतार्किक दृष्टिकोण के कारण वे देवतुल्य व्यक्तियों और उनके द्वारा किए गए कथित चमत्कारों से जुड़ी तमाम कल्पनापूर्ण कथाओं पर विश्वास कर लेते हैं। इन धार्मिक समूहों से जुड़े निहित स्वार्थ अंधविश्वास और पुरानी सामाजिक प्रथाओं को बढ़ावा देते हैं, जिनका आधुनिक विश्व की व्यवस्थाओं में कोई स्थान नहीं है।
प्रश्न यह है कि समाज के बड़े हिस्से को इन निहित स्वार्थों से कैसे मुक्त किया जाए। इसका उत्तर है वैज्ञानिक चेतना का प्रचार और संस्कार—जो आजकल उपेक्षा का शिकार है। वैज्ञानिक चेतना किसी भी आस्था के विरुद्ध नहीं होती; बल्कि वह आस्था को उन मलिनताओं से मुक्त करती है जो स्वार्थी तत्वों द्वारा अपने हित साधने के लिए उसमें जोड़ दी जाती हैं।
वैज्ञानिक चेतना पर आधारित आध्यात्मिक संप्रेषण हमें बेहतर और अधिक उदात्त मनुष्य बनाएगा तथा हमारे समाज के चरित्र और सामाजिक सूचकों में सुधार लाएगा।
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