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प्रो. प्रदीप माथुर

A person with white hair and glasses

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नई दिल्ली | शनिवार | 29 नवंबर 2025

सामान्य बोलचाल में प्रयुक्त होने वाला पिछड़ापन एक अस्पष्ट शब्द है, जिसकी अलग–अलग लोग अलग–अलग तरीके से व्याख्या करते हैं। मूल रूप से यह परंपरावादी स्थिति और आधुनिकीकरण की शक्तियों के बीच चल रहे सतत संघर्ष को दर्शाता है। यह किसी विशेष समूह, समुदाय या क्षेत्र की अनन्य विशेषता नहीं है। सच तो यह है कि हर व्यक्ति और हर सामाजिक समूह के पास किसी को पिछड़ा या गैर–पिछड़ा कहने की अपनी–अपनी कसौटी होती है।

किसी भी समुदाय या समूह में पिछड़ापन अनेक प्रकार का हो सकता है—आर्थिक, सामाजिक, शैक्षिक, मनोवैज्ञानिक या तकनीकी। सामान्यतः आर्थिक विकास और बेहतर शिक्षा से पिछड़ेपन को दूर किया जा सकता है, लेकिन एक महत्वपूर्ण तथ्य जिसे हम अक्सर नज़रअंदाज़ कर देते हैं, यह है कि सामाजिक और मनोवैज्ञानिक पिछड़ापन, आर्थिक पिछड़ेपन से भी अधिक गंभीर होता है। कारण यह है कि सामाजिक गतिशीलता को समझे बिना हम आर्थिक समस्याओं की सही तरह पहचान नहीं कर सकते।

लेख एक नज़र में
पिछड़ापन एक अस्पष्ट अवधारणा है, जो आर्थिक, सामाजिक, शैक्षिक, मनोवैज्ञानिक और तकनीकी स्तरों पर अलग-अलग रूपों में दिखाई देता है। लेख बताता है कि भारतीय मुसलमान, विशेषकर उत्तर भारत में, पारंपरिक सोच और बदलते समय के साथ कदम न मिला पाने के कारण अनेक अवसरों का लाभ नहीं उठा सके।
हालांकि समुदाय ने देश को कई उत्कृष्ट पेशेवर दिए हैं, पर मजबूत सामाजिक नेतृत्व और सकारात्मक प्रतिनिधित्व का अभाव रहा है। सत्ता-तंत्र के पूर्वाग्रह और अन्याय भी उनकी प्रगति में बाधा बने, पर मुस्लिम नेतृत्व ने भी समस्याओं के समाधान में पर्याप्त सक्रियता नहीं दिखाई। सुधार के लिए उन्हें पराजयवादी और पृथकतावादी दृष्टिकोण छोड़कर आधुनिक, उदार और सहभागी सोच अपनानी होगी।
अन्य कमजोर वर्गों के साथ मिलकर न्यायपूर्ण व्यवस्था की मांग, बेहतर मीडिया रणनीति और सकारात्मक कहानियों का प्रचार आवश्यक है। खुले, वैज्ञानिक और संवादपूर्ण दृष्टिकोण से पिछड़ापन दूर किया जा सकता है।

किसी भी समाज की सामाजिक–आर्थिक संरचना को समझने के लिए एक तर्कपूर्ण दृष्टिकोण, जीवन की वास्तविकताओं का वैज्ञानिक विश्लेषण और वैज्ञानिक दृष्टिकोण आवश्यक है। आज के दौर में तकनीक के साथ अद्यतन रहना भी उतना ही ज़रूरी हो गया है, क्योंकि तकनीकी प्रवृत्तियों के बिना आर्थिक ठहराव को तोड़ा नहीं जा सकता और न ही बदलते रोजगार–बाज़ार को समझा जा सकता है।

इन्हीं विषयों पर पिछले सप्ताह आयोजित एक व्यापक चर्चा में विचार हुआ। यह चर्चा ‘नेशनल माइनॉरिटी लीगल काउंसिल’ द्वारा आयोजित की गई थी, जिसे अल्पसंख्यक मुद्दों पर कानूनी जागरूकता बढ़ाने हेतु वरिष्ठ सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ताओं ने बनाया है।

यह सच है कि विशेषकर उत्तर भारत के मुसलमान आर्थिक तरक्की में अन्य समुदायों की गति के साथ कदमताल नहीं कर सके और स्वतंत्रता के बाद उभरे अवसरों का पूरा लाभ नहीं उठा सके। लेकिन इसके आधार पर पूरे समुदाय को पिछड़ा घोषित कर देना उचित नहीं है। वास्तविकता यह है कि मुसलमानों का बड़ा हिस्सा अत्यधिक पारंपरिक बना रहा और बदलते समय के साथ तालमेल नहीं बिठा पाया।

साथ ही यह भी एक तथ्य है कि स्वतंत्र भारत में मुसलमानों ने विभिन्न क्षेत्रों में देश के सबसे श्रेष्ठ और प्रतिष्ठित पेशेवरों को जन्म दिया है। किंतु समुदाय के भीतर ऐसे प्रतिबद्ध सामाजिक नेतृत्व का अभाव रहा, जो इन उत्कृष्ट व्यक्तित्वों को समुदाय के सामने आदर्श के रूप में प्रस्तुत कर सके और युवाओं को प्रेरित कर सके। इसके अभाव में बार–बार अतीत की गौरवगाथा दुहराने और सरकार से अपेक्षित सहयोग न मिलने की शिकायतों में ही ऊर्जा खर्च होती रही।

यह कहना भी गलत नहीं होगा कि सत्ता–तंत्र ने कई बार मुसलमानों के साथ पूर्वाग्रहपूर्ण या कम अनुकूल व्यवहार किया है। बीते एक दशक में यह पूर्वाग्रह और भी बढ़ता दिखा है तथा मुसलमानों के विरुद्ध अन्यायपूर्ण घटनाओं में भी चिंताजनक बढ़ोतरी हुई है। लेकिन साथ ही यह भी सच है कि—सामाजिक, राजनीतिक और व्यावसायिक—मुस्लिम नेतृत्व का बड़ा वर्ग समुदाय के व्यापक उत्थान के प्रति बहुत कम सक्रिय रहा है। अधिकतम उन्होंने बेहद ढीला–ढाला रवैया अपनाया और समस्याओं के समाधान की दिशा में गंभीर प्रयास नहीं किए।

मुसलमानों में पिछड़ापन दूर करने के लिए सबसे पहले पराजयवादी दृष्टिकोण को छोड़ना होगा। यह समझना होगा कि पिछड़ेपन की जड़ अत्यधिक पारंपरिक विचार–दृष्टि में निहित है, जो अब पूरी तरह अप्रासंगिक हो चुकी है। जैसे ही आधुनिक दृष्टिकोण का विकास होगा, आर्थिक पिछड़ापन दूर करना कहीं आसान हो जाएगा। कई मुस्लिम नेताओं में प्रचलित यह प्रवृत्ति कि पिछड़ेपन को मुद्दा बनाकर सत्ता–तंत्र से व्यक्तिगत लाभ लिया जाए, त्यागनी होगी।

अपनी समस्याओं के समाधान के लिए मुसलमानों को पृथकतावादी दृष्टिकोण छोड़ना होगा। उन्हें यह समझना होगा कि हमारे समाज में, जो अभी भी सामंती मानसिकता से ग्रस्त है, कई अन्य सामाजिक समूह भी अपने उचित अधिकारों से वंचित हैं। मुसलमानों को समाज के सभी कमजोर वर्गों के साथ मिलकर एक न्यायपूर्ण व्यवस्था की मांग करनी चाहिए, क्योंकि यह व्यवस्था दिन–प्रतिदिन ‘हैसतमंद’ और ‘बेजुबान’ के बीच की खाई को बढ़ाती जा रही है। मुसलमानों को समझना होगा कि वे अकेले नहीं हैं जिनके साथ व्यवस्था अन्यायपूर्ण है; इसका संचालन भी मजबूत जड़ वाले निहित स्वार्थ कर रहे हैं।

इसलिए पिछड़ापन दूर करने के लिए मुस्लिम समुदाय को अन्य समुदायों के साथ सामाजिक संपर्क बढ़ाना होगा। आत्मविश्वास की कमी दूर करनी होगी और उदार तथा समन्वयकारी दृष्टिकोण अपनाना होगा। ऐसा करने से वे दूसरों की दृष्टि को भी बेहतर ढंग से समझ सकेंगे।

हमें समझना होगा कि हमारे यहां साम्प्रदायिकता वैचारिक कम और औद्योगिक अधिक है। यह भ्रष्टाचार, अक्षमता, अज्ञान, आत्म–प्रचार और निजी फायदे की ओट है। इसलिए इसे किसी एक धार्मिक समुदाय—बहुसंख्यक या अल्पसंख्यक—की पहचान बनाना उचित नहीं। यह निहित स्वार्थी वर्गों के हाथ में एक औजार है जिसके माध्यम से वे सामाजिक सीढ़ी चढ़ना, राजनीतिक शक्ति हासिल करना और अपने व्यवसायिक हित बढ़ाना चाहते हैं। मुसलमान और अन्य आर्थिक रूप से कमजोर समूह इन स्वार्थी तत्वों के खेल को अलग–थलग रहकर नहीं, बल्कि मिलकर ही विफल कर सकते हैं।

सरकारी सहायता की दिशा में अपनी बात प्रभावी ढंग से रखने के लिए मुस्लिम समुदाय को बेहतर संचार–रणनीतियाँ और मीडिया से सशक्त जुड़ाव विकसित करना होगा। मीडिया में मुसलमानों से संबंधित अधिकांश खबरें नकारात्मक होती हैं—भेदभाव, अन्याय और उत्पीड़न की कहानियाँ। ये ज़रूरी हैं, परंतु इनके साथ–साथ सकारात्मक खबरें भी होनी चाहिए—औसत मुसलमान की उपलब्धियों और अच्छे कार्यों की कहानियाँ, जिनकी कमी नहीं है। अफसोस कि क्रिकेट के अतिरिक्त किसी भी क्षेत्र में मुस्लिम उपलब्धियों की सकारात्मक कहानियाँ मीडिया में लगभग नहीं दिखाई देतीं। लोकप्रिय मीडिया और मुस्लिम उपलब्धिधारकों के बीच एक मजबूत सेतु आज की आवश्यकता है।

आधुनिक समाज में मीडिया विकास का एक अनिवार्य घटक है और पिछड़ापन मिटाने का भी। कम से कम शिक्षित मुसलमानों को यह बात समझनी चाहिए। किसी भी सामाजिक समूह को आगे बढ़ने के लिए प्रभावी संचार रणनीति की आवश्यकता होती है—और मुसलमानों को इससे उदासीन नहीं रहना चाहिए। गलतफहमी और दुष्प्रचार से मुकाबला करने के लिए भी मीडिया का सहारा लेना आवश्यक है, क्योंकि ये अक्सर अल्पसंख्यकों के प्रति पूर्वाग्रही लोगों द्वारा फैलाए जाते हैं।

निस्संदेह मुसलमानों में पिछड़ापन एक बड़ी समस्या है, लेकिन ऐसा कोई कारण नहीं कि जो लोग इसे ईमानदारी से दूर करना चाहते हैं—चाहे मुसलमान हों या अन्य—वे इसे सकारात्मक और उदार दृष्टिकोण अपनाकर दूर न कर सकें।

(वयोवृद्ध पत्रकार और मीडिया गुरु प्रो. प्रदीप माथुर मेडियामैप न्यूज़ नेटवर्क के प्रधान संपादक और एमबीकेएम फाउंडेशन के चेयरमैन हैं, जो एक गैर–लाभकारी स्वैच्छिक सामाजिक संस्था है।)

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