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प्रो प्रदीप माथुर

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नई दिल्ली 19 जून 2024

ज पाकिस्तान गंभीर संकट से गुजर रहा है। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ चाहे कितनी भी बड़ी-बड़ी बातें करें और चाहे चीन से मिलकर भारत के विरुद्ध विश्व में अपना वर्चस्व दिखाने का दावा करें लेकिन वह मन ही मन समझते हैं कि वह उस जर्जर और कमजोर देश के नेता हैं जिसके अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह लग रहा है।

 पाकिस्तान में आर्थिक और राजनीतिक संकट तो है ही पर उसका वैचारिक संकट वर्ष 1970-71 के संकट से भी बड़ा है  जब पाकिस्तान विभाजित हुआ था  और पूर्वी पाकिस्तान ने अलग होकर बांग्लादेश के रूप में जन्म लिया। जैसा सब जानते हैं कि बांग्लादेश के युद्ध में पाकिस्तान को भारत के हाथों बहुत बुरी तरह पराजित होना पड़ा था।

देश का विभाजन और युद्ध में शर्मनाक पराजय पाकिस्तान के लिए एक बहुत बड़ी त्रासदी थी, पर उससे उभरकर पाकिस्तान ने एक प्रभावशाली राष्ट्र के रूप में अपनी पहचान बनाई और परमाणु ऊर्जा का विकास कर विश्व के परमाणु शस्त्र वाले कुछ गिने-चुने राष्ट्रों में शुमार हो गया। अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण पाकिस्तान विश्व की बड़ी शक्तियों जैसे अमेरिका, रूस, चीन और भारत का महत्वपूर्ण केंद्र बिंदु है। लेकिन आज पाकिस्तान के सामने आर्थिक और राजनीतिक संकटों से भी बड़ा संकट है, और वह वैचारिक संकट है जो उसकी स्थापना और उसकी सार्थकता पर प्रश्नचिन्ह लगा रहा है।

मजे की बात यह है कि वर्तमान रूप में पाकिस्तान के वैचारिक अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगाने वाले उसके विरोधी शत्रु न होकर उसके अपने बुद्धिजीवी और प्रबुद्ध नागरिक है। पाकिस्तान का सत्ता विरोधी मीडिया मुखर रूप से प्रश्न कर रहा है कि अस्तित्व में आने के बाद 73 वर्ष में पाकिस्तान ने क्या किया और आज उसकी इतनी बुरी हालात क्यों है।

आज आर्थिक विकास और सामाजिक सामंजस्य के मुद्दों को लेकर भारत भी संघर्षरत है। लेकिन पाकिस्तान के तमाम बुद्धिजीवियों और मुखर मीडिया की नजरों में भारत ने आशातीत सफलता प्राप्त की है और पाकिस्तान बहुत पीछे रह गया है, जबकि दोनों देश एक साथ ही ब्रिटिश उपनिवेशवाद से स्वतंत्र हुए थे। पाकिस्तान में कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना के दो राष्ट्रवादी सिद्धांत पर भी प्रश्न चिन्ह लगाए जा रहे हैं जिसके कारण पाकिस्तान अस्तित्व में आया।

यह भी कहा जा रहा था कि पाकिस्तान की परिकल्पना चाहे जैसी भी रही हो और अखंड भारत के विभाजन का निर्णय चाहे जैसा भी रहा हो अस्तित्व में आने के बाद पाकिस्तान को धार्मिक कट्टरता और भारत से शत्रुता के मार्ग पर नहीं चलना चाहिए था, क्योंकि इससे पाकिस्तान का बहुत नुकसान हुआ है और इसी कारण पाकिस्तान के हुक्मरान राष्ट्र निर्माण के गंभीर मसलों पर ध्यान नहीं दे सके जिसका खामियाजा पाकिस्तान की वर्तमान पीढ़ी को भुगतना पड़ रहा है। इसी पृष्ठभूमि में आज पाकिस्तान में बुद्धिजीवी वर्ग अपने राष्ट्र की परिकल्पना को पुनः परिभाषित करने की मांग उठा रहा है जिसका एक बहुत बड़ा आयाम यह भी है कि भारत और भारतीय संस्कृति का अंध विरोध समाप्त किया जाए और भारतीय उपमहाद्वीप की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का सम्मान किया जाए। प्रबुद्ध पाकिस्तानी जनमानस और मीडिया में उठते इन तमाम प्रश्नों को मूर्तरूप दिया है वरिष्ठ पाकिस्तानी पत्रकार, कूटनीतिज्ञ और राजनीतिक सलाहकार हुसैन हक्कानी ने जो अब पाकिस्तानी शासनतंत्र के कोप से बचने के लिए अमेरिका में रहते हैं। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के सलाहकार रहे और संयुक्त अमेरिका में पाकिस्तान के राजदूत रहे, और किसी समय पाकिस्तानी व्यवस्था की आंख का तारा रहे हक्कानी साहब ने अपनी पुस्तक रीइमेजिंग पाकिस्तान में पाकिस्तान की वैचारिक परिकल्पना को पुनः परिभाषित करने की बात कही है।

हक्कानी साहब का कहना है कि जन्म के 73 साल बाद आज पाकिस्तान एक अस्थिर अर्ध-सत्तावादी राष्ट्रीय सुरक्षा राज्य है जो संवैधानिक व्यवस्था या कानून के शासन के तहत खुद को लगातार चलाने में विफल रहा है। वह कहते हैं कि अर्ध-सत्तावादी राज्य वह जगह है जहां आपके पास स्वतंत्रता के कुछ तत्व हैं, इसलिए यह सोवियत संघ या नाजी जर्मनी की तरह नहीं है, लेकिन इसमें एक अभिजात वर्ग है जो देश को चलाता है और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के माध्यम से परिवर्तन करने की अनुमति नहीं देता है। मीडिया को स्वतंत्रता का भ्रम है लेकिन वास्तव में स्वतंत्र बहस नहीं है और यह एक राष्ट्रीय सुरक्षा राज्य है क्योंकि राज्य का एक अंग सेना है और वह पूरी तरह से देश पर हावी है।

पाकिस्तानी राष्ट्रवाद को दो महत्वपूर्ण विशेषताओं से परिभाषित किया गया है। एक यह है कि पाकिस्तान मुसलमानों की भूमि है और दूसरा यह है कि पाकिस्तान भारत से अलग है। मुसलमानों की एक अंतर्निहित अक्षमता थी कि वे हिंदुओं के साथ रहें। पाकिस्तान के राष्ट्रवाद में लोगों को यही सिखाया जाता है। इसलिए पाकिस्तानी स्कूल के पाठ्यक्रम में सिंध के इतिहास के बारे में कुछ भी नहीं है, बलूचिस्तान के इतिहास के बारे में भी इसमें कुछ भी नहीं है। कारण यह है कि सिन्ध और बलूचिस्तान का इतिहास दो-राष्ट्र सिद्धांत पर आधारित वैचारिक राष्ट्रवाद का समर्थन नहीं करता है।

भारत में बड़ी संख्या में मुसलमान रहते हैं इसलिए पाकिस्तान के मुसलमानों को भारत से अलग कर दिया गया है। तर्क यह है कि हमने एक राज्य बनाया है और यह राज्य हमेशा भारत की घेराबंदी की स्थिति में है। इसलिए पाकिस्तान में सेना का प्रभुत्व होना अनिवार्य है। पाकिस्तान को एक सेना विरासत में मिली और सेना के आकार से मेल खाने के लिए खतरा बढ़ा। शायद यही कारण है कि पाकिस्तान एक अर्ध-सत्तावादी राष्ट्रीय सुरक्षा राज्य के रूप में परिवर्तित हो गया।

पाकिस्तान को एक नए राष्ट्र बनाने के पीछे क्या विचारधारा या सोच थीॽ पाकिस्तान को इस्लामिक देश क्यों बनाया जा रहा हैॽ इस्लामिक देश कैसा होना चाहिएॽ इस्लामिक राज्य की प्रकृति क्या होगीॽ इस्लामिक राज्य बनाने के पीछे मकसद क्या हैॽ केंद्र सरकार और प्रांतों के बीच क्या संतुलन होना चाहिएॽ क्या भारत से शत्रुता आवश्यक हैॽ जैसे कई अहम सवाल थे जिनका जबाव पाकिस्तान के जनमानस को पाकिस्तान के निर्माण के समय पता हेना चाहिए था। लेकिन दुर्भाग्यवश इन सावलों के जबाव कहीं नहीं मिले जिसके कारण पाकिस्तान को भारत जैसा संविधान नहीं मिला। आजादी के दो साल के भीतर भारत को अपना संविधान मिल गया। पाकिस्तान भी ऐसा कर सकता था, पर उसने ऐसा नहीं किया।

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