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डॉ पी पी वांगचुक

नई दिल्ली | शनिवार | 28 फरवरी 2026

प्रेम, शांति और आनंद—ये केवल आदर्श शब्द नहीं, बल्कि सभ्य जीवन की आधारशिला हैं। किंतु जब हमारी धरती माता युद्धों, हिंसा और वैमनस्य से आहत होती है, तब इन मूल्यों का अस्तित्व ही संकट में पड़ जाता है। एक प्रगतिशील और मानवीय समाज की कल्पना तब अर्थहीन हो जाती है, जब हर दिन गोलियों की आवाज़ करुणा की पुकार को दबा देती है। ऐसे समय में शांति केवल विकल्प नहीं, बल्कि मानवता का अनिवार्य मिशन बन जाती है।

इसी उद्देश्य को लेकर भिक्षु पनकारा के नेतृत्व में 18 बौद्ध भिक्षुओं ने 108 दिनों में 2,703 किलोमीटर से अधिक की ऐतिहासिक पदयात्रा पूरी की। यह केवल दूरी तय करने का अभियान नहीं था, बल्कि चेतना जगाने की यात्रा थी—एक ऐसी यात्रा जिसने दुनिया भर में लाखों लोगों के दिलों को छुआ और शांति के लिए वैश्विक संवाद को नई ऊर्जा दी।

यह पदयात्रा अमेरिका के टेक्सास से शुरू होकर वाशिंगटन में संपन्न हुई। 108 दिनों तक निरंतर चलना, वह भी बारिश, तूफान और विपरीत परिस्थितियों के बीच, साधारण बात नहीं है। रास्ते में अनेक चुनौतियाँ आईं। एक दर्दनाक सड़क दुर्घटना में दो भिक्षु गंभीर रूप से घायल हो गए। उनमें से एक को अपना एक पैर तक गंवाना पड़ा। फिर भी, मिशन की आंतरिक शक्ति ने उन्हें विचलित नहीं होने दिया। उनका संकल्प था—दुनिया को यह याद दिलाना कि युद्ध कभी भी स्थायी शांति और सद्भाव का माध्यम नहीं बन सकता।

इस पदयात्रा का एक और प्रेरक अध्याय था—अलौकिक समर्पण का प्रतीक ‘आलोक’ नामक कुत्ता। यह वही आवारा कुत्ता था, जो 2022 में कोलकाता की सड़कों पर भटकता था। जब भिक्षु भारत में अपनी शांति-यात्रा पर निकले, तो आलोक उनके पीछे-पीछे चल पड़ा। मानो उसे भी इस मिशन की गंभीरता का आभास हो। धीरे-धीरे वह इस यात्रा का अभिन्न हिस्सा बन गया।

भारत से अमेरिका तक की यात्रा में आलोक ने असाधारण धैर्य और निष्ठा का परिचय दिया। हालांकि इतनी लंबी पदयात्रा उसके स्वाभाविक जीवन का हिस्सा नहीं थी। अत्यधिक थकान और लगातार परिश्रम के कारण उसके पैरों ने जवाब दे दिया। उसे अस्पताल में भर्ती कर सर्जरी करानी पड़ी। परंतु उपचार के कुछ ही समय बाद वह फिर से भिक्षुओं के साथ लौट आया—मानो यह उसका भी मिशन हो। अमेरिका की सड़कों पर वह लगभग मार्गदर्शक की तरह उनके साथ चला और हर पड़ाव पर लोगों के स्नेह और प्रशंसा का केंद्र बना।

इस शांति-यात्रा के दौरान हजारों लोग विभिन्न शहरों में भिक्षुओं के स्वागत के लिए आगे आए। कोई रोते हुए उनका अभिवादन कर रहा था, तो कोई गुलाब, चॉकलेट और आवश्यक वस्तुएँ भेंट कर रहा था। यह दृश्य केवल समर्थन का नहीं, बल्कि उस वैश्विक पीड़ा का प्रतीक था, जो आज मानवता के हृदय में पल रही है। लोग शांति चाहते हैं, परंतु अक्सर नेतृत्व की दिशा उस चाहत से मेल नहीं खाती।

भिक्षुओं की यह पदयात्रा केवल एक आध्यात्मिक अभ्यास नहीं थी; यह एक नैतिक हस्तक्षेप भी थी। यह उन विश्व नेताओं के लिए एक मौन किंतु प्रभावशाली संदेश था, जिनके निर्णयों ने धरती को युद्धभूमि में बदल दिया है। जब निर्दोष लोग प्रतिदिन हिंसा का शिकार होते हैं, तब शांति की आवाज़ उठाना साहस का कार्य है। भिक्षुओं ने अपने कर्म से यह सिद्ध किया कि करुणा और धैर्य, शक्ति और हथियारों से कहीं अधिक प्रभावी हो सकते हैं।

शांति केवल संघर्ष की अनुपस्थिति नहीं है; यह न्याय, सह-अस्तित्व और पारस्परिक सम्मान की उपस्थिति है। यदि समाज में भय और असुरक्षा का वातावरण रहेगा, तो न तो विकास संभव है और न ही सच्ची खुशी। बिना शांति के कोई भी राष्ट्र प्रगतिशील नहीं बन सकता। जीवन का उद्देश्य भी तभी सार्थक है, जब वह सहायक और सौहार्दपूर्ण परिवेश में फल-फूल सके।

यदि हम शांति के ऐसे प्रयासों की उपेक्षा करते हैं, तो मानवता की श्रेष्ठता पर प्रश्नचिह्न लग जाएगा। मनुष्य को अन्य प्राणियों से जो अलग बनाता है, वह उसकी करुणा, विवेक और सह-अस्तित्व की क्षमता है। जब यही गुण कमजोर पड़ जाते हैं, तब सभ्यता का भविष्य भी संकट में पड़ जाता है।

आज आवश्यकता है कि विश्व नेतृत्व अपने “जंग लगे” दृष्टिकोण को बदले। कठोर हृदय और संकीर्ण सोच से न तो स्थिरता आएगी और न ही सम्मान। प्रेम, संवाद और सहयोग ही स्थायी समाधान का मार्ग हैं। नेताओं की भूमिका केवल सत्ता संभालना नहीं, बल्कि मानवता को सुरक्षित और सम्मानजनक भविष्य की ओर ले जाना है—एक ऐसा भविष्य जहां हर व्यक्ति को अपनी क्षमता सिद्ध करने का अवसर मिले।

अंततः, भिक्षुओं की यह 2,703 किलोमीटर की यात्रा हमें यही सिखाती है कि शांति कोई दूर का आदर्श नहीं, बल्कि सामूहिक प्रयास से साकार होने वाली वास्तविकता है। यह जीवन की आवश्यकता भी है और उसका उद्देश्य भी।

पंचलाइन स्पष्ट है—शांति ही एकजुट, प्रगतिशील और खुशहाल दुनिया की एकमात्र कुंजी है। आज मानवता शांति के लिए पुकार रही है। प्रश्न यह है कि क्या हम उस पुकार को सुनने के लिए तैयार हैं? (डॉ. पीपी वांगचुक एक संपादक, स्तंभकार और पेशेवर वक्ता हैं)

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