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डॉ सतीश मिश्रा 

नई दिल्ली | शनिवार | 17 जनवरी 2026

8 जनवरी 2026 को पश्चिम बंगाल में एक अभूतपूर्व राजनीतिक नाट्य देखने को मिला, जब प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने एक साथ राज्य में आई-पैक (I-PAC) के कार्यालय और उसके प्रमुख प्रतीक जैन के आवास पर छापे मारे। इस कार्रवाई के दौरान स्वयं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का अचानक छापे के स्थान पर पहुँचना और केंद्रीय एजेंसी के अधिकारियों से आमना-सामना होना, केंद्र और राज्य के बीच टकराव का कारण बन गया।

सामान्य परिस्थितियों में किसी भी केंद्रीय एजेंसी को कानून के तहत जाँच और छापेमारी का अधिकार होता है, लेकिन जिस तरह से मोदी सरकार के कार्यकाल में ईडी, सीबीआई, आयकर विभाग और यहाँ तक कि राज्यपाल जैसे संवैधानिक पदों का उपयोग विपक्ष शासित राज्यों की निर्वाचित सरकारों को अस्थिर करने के लिए किया जा रहा है, उसने ममता बनर्जी को खुलकर मोर्चा संभालने के लिए मजबूर कर दिया।

इन छापों का समय भी कई सवाल खड़े करता है। इसी वर्ष पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव होने हैं और भाजपा नेतृत्व लगातार राज्य में अपनी जीत और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के सफाए के दावे कर रहा है। ऐसे में ईडी की कार्रवाई को राजनीतिक बदनामी और चुनावी लाभ से जोड़कर देखा जा रहा है।

ईडी ने दावा किया कि यह कार्रवाई कोयला तस्करी से जुड़े कथित धन शोधन मामले की जाँच के तहत की गई है और यह धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के अंतर्गत कानूनी है। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों और स्वयं आई-पैक ने इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए चिंताजनक बताया। आई-पैक ने अपने बयान में कहा कि यह एक दुर्भाग्यपूर्ण दिन है और इस तरह की कार्रवाई एक अस्थिर करने वाली मिसाल कायम करती है, हालांकि उन्होंने कानून के दायरे में रहकर पूरा सहयोग देने की बात दोहराई।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने छापे के दौरान मौके पर पहुँचकर ईडी पर अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर पार्टी की चुनावी रणनीति से जुड़े दस्तावेज और संवेदनशील डेटा जब्त करने की कोशिश का आरोप लगाया। उन्होंने इस कार्रवाई को राजनीतिक रूप से प्रेरित बताते हुए मीडिया के सामने केंद्र सरकार की मंशा पर सवाल उठाए।

इसके बाद ईडी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर ममता बनर्जी और वरिष्ठ राज्य अधिकारियों के खिलाफ सीबीआई जाँच की माँग की, जबकि पश्चिम बंगाल सरकार ने भी ‘केविएट’ दाखिल कर यह सुनिश्चित किया कि बिना दोनों पक्षों को सुने कोई एकतरफा आदेश न हो।

पिछले एक दशक में ईडी के कामकाज के आँकड़े भी गंभीर प्रश्न उठाते हैं। 2015 से 2025 के बीच धन शोधन कानून के तहत दर्ज हजारों मामलों में से केवल मुट्ठी भर मामलों में ही सजा हो सकी है। इसके बावजूद विपक्षी दलों—कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस आदि—के नेताओं के खिलाफ एजेंसी की सक्रियता लगातार बढ़ती गई है, जबकि भाजपा में शामिल होने वाले कई नेताओं पर दर्ज मामले या तो ठंडे बस्ते में चले गए या वापस ले लिए गए।

इस पूरे परिदृश्य में ममता बनर्जी का खुलकर प्रतिरोध करना संघीय ढांचे की रक्षा की दिशा में एक राजनीतिक संदेश है। यह केवल एक राज्य और एक केंद्रीय एजेंसी का टकराव नहीं, बल्कि संविधान की उस मूल भावना का प्रश्न है जिसमें राज्यों के अधिकारों और स्वायत्तता की रक्षा को सर्वोपरि माना गया है। एक मजबूत केंद्र के नाम पर राज्यों के अधिकारों को कुचलने की प्रवृत्ति को लोकतंत्र में स्वीकार नहीं किया जा सकता—और ममता बनर्जी का यह कदम इसी चेतावनी का प्रतीक है।

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