गोपाल मिश्रा

नई दिल्ली I रविवार I 05-04-2026
सिविल सोसाइटी के विभिन्न वर्गों—पत्रकारों, लेखकों, न्यायपालिका के कुछ सदस्यों, कॉर्पोरेट अधिकारियों और वरिष्ठ नौकरशाहों—का एक विशिष्ट समूह हाल ही में वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप माथुर के 80वें जन्मदिन पर एकत्र हुआ। यह आयोजन महज़ जन्मदिन का उत्सव नहीं था, बल्कि भारत में हाल के वर्षों में प्रेस की स्वतंत्रता में आई गिरावट पर सामूहिक चिंता का भी प्रतीक था। वैश्विक प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत का 151वां स्थान इस चिंता को और गंभीर बनाता है।
17 जनवरी को 80 वर्ष पूरे कर चुके प्रदीप माथुर आज भी अपने कार्य के प्रति उतने ही सक्रिय हैं, जितने अपने युवा दिनों में थे। वे प्रतिदिन आठ घंटे से अधिक काम करते हैं—एक अनुशासन जो युवा पत्रकारों के लिए भी प्रेरणास्रोत है। उल्लेखनीय यह है कि लगभग पाँच दशकों के अपने लंबे करियर के बावजूद वे अतीत की उपलब्धियों में उलझने के बजाय वर्तमान चुनौतियों पर केंद्रित रहते हैं।
अपने छात्रों और युवा सहयोगियों के लिए उनका संदेश स्पष्ट है—“आज़ादी खतरे में है, इसे पूरी ताकत से बचाओ।” यह विचार पंडित जवाहरलाल नेहरू के उस दृष्टिकोण को प्रतिबिंबित करता है, जिसमें स्वतंत्रता को मानवीय अस्तित्व का मूल आधार माना गया है। माथुर का मानना है कि लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर खतरे समय-समय पर नए रूपों में सामने आते हैं, और इनके मुकाबले के लिए सजगता तथा नवाचार दोनों आवश्यक हैं।
वर्तमान समय में मीडिया के सामने चुनौतियाँ और जटिल हो गई हैं। निजी टीवी चैनलों और सोशल मीडिया के प्रसार ने सूचना के प्रवाह को तेज़ तो किया है, लेकिन निष्पक्ष और तथ्यपरक पत्रकारिता के लिए नई कठिनाइयाँ भी खड़ी की हैं। इस परिदृश्य में प्रदीप माथुर ने ‘मीडिया मैप’ नामक पत्रिका और एक थिंक टैंक की स्थापना की, जिसका उद्देश्य गुणवत्तापूर्ण पत्रकारिता को बढ़ावा देना है। उनका विश्वास है कि ऐसे प्रयास देश के अन्य हिस्सों में भी फैलेंगे।
माथुर की पत्रकारिता का मूल सिद्धांत स्पष्ट है—तथ्यों से कभी समझौता नहीं और निष्पक्षता की निरंतर कोशिश। उनके समकालीनों का कहना है कि उन्होंने कभी भी बिना तथ्य और तर्क के अपनी बात नहीं रखी और न ही किसी राजनीतिक दल या व्यक्ति के प्रचार का हिस्सा बने। यही उनकी विश्वसनीयता की सबसे बड़ी पहचान है।
भारत में मीडिया की वर्तमान स्थिति पर वे तीखी टिप्पणी करते हैं। उनका मानना है कि बड़े मीडिया संस्थानों के मालिकों की व्यावसायिक लालसा और नैतिक साहस की कमी ने पत्रकारिता की गुणवत्ता को नुकसान पहुँचाया है। नतीजतन, पाठकों और दर्शकों का भरोसा कम हुआ है। आज स्थिति यह है कि बड़े अखबारों और टीवी चैनलों को आम लोग ‘सूचना’ के बजाय ‘मनोरंजन’ का माध्यम मानने लगे हैं।
अखबारों की गिरती साख का एक कारण तकनीकी बदलावों को माना जाता है, लेकिन वास्तविकता यह है कि कई संस्थान राजनीतिक और कॉर्पोरेट हितों के उपकरण बन गए हैं। रेलवे स्टेशनों और शहरों में अखबारों की उपलब्धता में कमी तथा टीवी डिबेट्स को ‘मीडिया सर्कस’ कहे जाने की प्रवृत्ति इसी बदलाव को दर्शाती है।
प्रदीप माथुर का करियर इस संदर्भ में विशेष महत्व रखता है। 1980 के दशक में उन्होंने ‘नेशनल हेराल्ड’ में कार्य किया, जो स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान एक महत्वपूर्ण आवाज़ रहा था। बाद के वर्षों में भी यह अखबार अपनी वैचारिक स्वतंत्रता के लिए जाना जाता रहा, हालांकि समय के साथ इसमें कई उतार-चढ़ाव आए। माथुर ने उस दौर में भी इस संस्थान को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया, जब परिस्थितियाँ अनुकूल नहीं थीं।
उन्होंने चंडीगढ़ के ‘ट्रिब्यून’ जैसी सुविधाजनक नौकरी छोड़कर ‘नेशनल हेराल्ड’ का रास्ता चुना—एक ऐसा निर्णय जिसने उन्हें आर्थिक और पेशेवर चुनौतियों के बीच ला खड़ा किया। सीमित संसाधनों में परिवार का पालन-पोषण करना आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। यही उनका सबसे बड़ा व्यक्तिगत त्याग था।
हालाँकि इस निर्णय से उनके करियर में अस्थायी गिरावट आई, लेकिन उन्होंने अपने परिश्रम से पुनः प्रतिष्ठा हासिल की। उन्होंने ‘पायनियर’ का संपादन किया, वाराणसी संस्करण की शुरुआत की और बाद में भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) में शिक्षण कार्य से जुड़े। वहाँ उन्होंने नई पीढ़ी को स्वतंत्र और जिम्मेदार पत्रकारिता का महत्व समझाया।
80 वर्ष की आयु में भी उनका उत्साह कम नहीं हुआ है। ‘मीडिया मैप’ के माध्यम से वे आज भी वैचारिक हस्तक्षेप कर रहे हैं। यह पत्रिका आज के मीडिया परिदृश्य में एक छोटे लेकिन महत्वपूर्ण ‘नखलिस्तान’ की तरह उभरी है, जहाँ गंभीर और निष्पक्ष विश्लेषण मिलता है। ऐसे समय में जब मीडिया का बड़ा हिस्सा सतही सामग्री या प्रायोजित खबरों में उलझा हुआ है, यह प्रयास विशेष महत्व रखता है।
माथुर ने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया—आकाशवाणी और दूरदर्शन—के साथ भी सक्रिय भूमिका निभाई है। एक लेखक और संपादक के रूप में उन्होंने जनसंचार पर कई महत्वपूर्ण कार्य किए हैं और हजारों लेख लिखे हैं। उनकी अकादमिक और शोध उपलब्धियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी मान्यता मिली है।
उनके 80वें जन्मदिन का समारोह केवल एक व्यक्ति का सम्मान नहीं था, बल्कि उस पत्रकारिता परंपरा का भी स्मरण था जो सत्य, स्वतंत्रता और सामाजिक उत्तरदायित्व पर आधारित है। वरिष्ठ नेता सुनील शास्त्री सहित अनेक गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति ने इस आयोजन को और अर्थपूर्ण बना दिया।
आज जब मीडिया के सामने विश्वसनीयता का संकट है, प्रदीप माथुर जैसे पत्रकार उम्मीद की किरण हैं। उनकी जीवन यात्रा यह बताती है कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी चुनौतीपूर्ण क्यों न हों, यदि प्रतिबद्धता और नैतिक साहस हो, तो पत्रकारिता समाज में परिवर्तन का सशक्त माध्यम बनी रह सकती है।
We must explain to you how all seds this mistakens idea off denouncing pleasures and praising pain was born and I will give you a completed accounts..
Contact Us