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मसूद अब्दाली

नई दिल्ली | शनिवार | 24 जनवरी 2026

रान में हाल के महीनों में दिखाई दे रही सार्वजनिक अशांति को केवल महंगाई, बेरोज़गारी या मुद्रा अवमूल्यन की तात्कालिक प्रतिक्रिया के रूप में देखना उसके ऐतिहासिक अनुभवों के लंबे सिलसिले को नज़रअंदाज़ करना होगा। यह उथल-पुथल न तो रातोंरात पैदा हुई है और न ही इसे केवल आर्थिक आंकड़ों से समझा जा सकता है। ईरान की आज की राजनीतिक-सामाजिक स्थिति दशकों से चले आ रहे विदेशी हस्तक्षेप, दंडात्मक प्रतिबंधों, क्षेत्रीय शक्ति-संघर्ष और निरंतर बाहरी दबाव का परिणाम है। विडंबना यह है कि जो वैश्विक शक्तियां आज “ईरानी जनता के अधिकारों” की दुहाई देती हैं, वही सात दशकों से अधिक समय से ईरान के आंतरिक मामलों में दखल देकर उसकी राजनीतिक और आर्थिक राह को प्रभावित करती रही हैं।

इस कहानी की जड़ें 1950 के दशक में मिलती हैं, जब ईरान के पहले लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसादेघ ने 1951 में तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण किया। उस समय देश के विशाल तेल संसाधनों पर ब्रिटिश-नियंत्रित एंग्लो-ईरानी ऑयल कंपनी का वर्चस्व था। मोसादेघ का निर्णय राष्ट्रीय संप्रभुता की घोषणा था, लेकिन यह ब्रिटेन और अमेरिका को स्वीकार्य नहीं था। शीत युद्ध की मानसिकता में पश्चिमी नेतृत्व को आशंका थी कि मोसादेघ कम्युनिस्ट तुदेह पार्टी के प्रभाव में आ सकते हैं और पश्चिम का रणनीतिक हित कमजोर हो जाएगा।

अगस्त 1953 में सीआईए और ब्रिटेन की एमआई-6 ने मिलकर एक गुप्त तख्तापलट रचा, जिसे अमेरिका में “ऑपरेशन अजाक्स” और ब्रिटेन में “ऑपरेशन बूट” कहा गया। इसके परिणामस्वरूप मोसादेघ की सरकार गिरा दी गई और शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी की सत्ता बहाल कर दी गई। यह घटना भले ही अपेक्षाकृत कम रक्तपात वाली रही हो, लेकिन इसने ईरान के लोकतांत्रिक प्रयोग को कुचल दिया और पश्चिम के प्रति गहरे अविश्वास की नींव रख दी, जिसकी गूंज आज भी ईरानी राजनीति में सुनाई देती है।

पश्चिमी समर्थन से सत्तासीन शाह का शासन भीतर से कमजोर था। राजनीतिक दमन और सामाजिक असमानता ने धीरे-धीरे असंतोष को जन्म दिया, जो 1979 की इस्लामी क्रांति में फूट पड़ा। अमेरिका के प्रबल समर्थन के बावजूद शाह को देश छोड़ना पड़ा और इस्लामी गणराज्य की स्थापना हुई। इसके साथ ही अमेरिका-ईरान संबंधों में सहयोग की जगह शत्रुता ने ले ली। तेहरान का यह विश्वास और मजबूत हुआ कि उसकी नई व्यवस्था को शुरू से ही बाहरी ताकतों द्वारा अस्थिर करने की कोशिशें की जा रही हैं।

यह टकराव तब और तीखा हो गया जब 1980 में सद्दाम हुसैन के नेतृत्व में इराक ने ईरान पर हमला कर दिया। आठ वर्षों तक चला यह युद्ध ईरान के लिए विनाशकारी सिद्ध हुआ—लाखों लोग मारे गए, बुनियादी ढांचा तबाह हुआ और अर्थव्यवस्था चरमरा गई। ईरान का आरोप रहा है कि अमेरिका और उसके क्षेत्रीय सहयोगियों ने परोक्ष रूप से इराक का समर्थन किया ताकि इस्लामी गणराज्य को कमजोर किया जा सके। इस अनुभव ने ईरानी समाज में यह धारणा और गहरी कर दी कि बाहरी शक्तियां उसकी संप्रभुता को स्वीकार नहीं करना चाहतीं।

विडंबना यह है कि जिस परमाणु कार्यक्रम को आज ईरान के खिलाफ दबाव का सबसे बड़ा कारण बताया जाता है, उसकी शुरुआत भी अमेरिकी सहयोग से ही हुई थी। 1950 के दशक में राष्ट्रपति आइजनहावर की “एटम्स फॉर पीस” पहल के तहत ईरान को परमाणु तकनीक प्रदान की गई। समय के साथ वही कार्यक्रम संदेह और भय का केंद्र बन गया और 2000 के दशक में उस पर कड़े अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध लगाए गए। इन प्रतिबंधों ने ईरान को वैश्विक वित्तीय व्यवस्था से अलग-थलग कर दिया और आम जनता की रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर गहरा असर डाला।

2015 में लंबे कूटनीतिक प्रयासों के बाद संयुक्त व्यापक कार्य योजना (जेसीपीओए) पर हस्ताक्षर हुए। इसके तहत ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम पर सख्त सीमाएं स्वीकार कीं और बदले में प्रतिबंधों में राहत मिली। यह समझौता क्षेत्रीय स्थिरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना गया। लेकिन 2018 में अमेरिका के एकतरफा रूप से इस समझौते से हटने और “अधिकतम दबाव” की नीति अपनाने से यह संतुलन टूट गया। तेल निर्यात में गिरावट, मुद्रा का अवमूल्यन और बढ़ती महंगाई ने आम ईरानियों की आर्थिक परेशानियों को कई गुना बढ़ा दिया।

आज जो विरोध प्रदर्शन और असंतोष दिखाई दे रहा है, उसकी पृष्ठभूमि में यही लंबा आर्थिक और राजनीतिक दबाव है। हालांकि शुरुआत में आंदोलन आर्थिक मुद्दों पर केंद्रित थे, लेकिन जब अमेरिका और इज़राइल के नेताओं ने खुलकर उनका समर्थन किया, तो तेहरान ने इसे बाहरी साज़िश के रूप में देखना शुरू कर दिया। ईरानी अधिकारियों का आरोप है कि विदेशी खुफिया एजेंसियां और नेटवर्क अशांति को बढ़ावा देने के लिए सक्रिय हैं। चाहे इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि हो या न हो, यह स्पष्ट है कि इतिहास ने ईरान को हर बाहरी हस्तक्षेप के प्रति अत्यंत संवेदनशील बना दिया है।

इस पूरी प्रक्रिया का सबसे बड़ा बोझ आम जनता ने उठाया है। प्रतिबंधों ने दवाइयों, खाद्य पदार्थों और रोज़मर्रा की ज़रूरतों को महंगा कर दिया है। यदि वास्तव में अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंता ईरानी नागरिकों की भलाई है, तो केवल बयानबाज़ी नहीं, बल्कि ऐसे कदम ज़रूरी हैं जो उनके जीवन को आसान बनाएं। इतिहास यह सिखाता है कि तख्तापलट, युद्ध और आर्थिक घेराबंदी से स्थिरता नहीं आती, बल्कि अविश्वास और पीड़ा ही बढ़ती है।

मध्य पूर्व का अनुभव बताता है कि दीर्घकालिक शांति दबाव और अलगाव से नहीं, बल्कि संवाद, कूटनीति और आर्थिक सहयोग से आती है। ईरान की मौजूदा अशांति को समझने के लिए उसके इतिहास की इस लंबी परछाईं को देखना आवश्यक है—एक ऐसी परछाईं, जिसमें विदेशी हस्तक्षेप, प्रतिबंध और सत्ता संघर्ष बार-बार उसकी राजनीति और समाज को आकार देते रहे हैं।

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