आधुनिक लोकतांत्रिक राजनीति में भ्रष्टाचार को खत्म करने का वादा अक्सर सबसे प्रभावशाली चुनावी नारों में से एक बन जाता है। भारत में 2014 में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का राष्ट्रीय स्तर पर उदय भी इसी वादे से गहराई से जुड़ा हुआ था। भाजपा ने खुद को ऐसी राजनीतिक शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया जो संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार के दौरान सामने आए कथित “घोटालों के दौर” का अंत करेगी और पारदर्शी तथा जवाबदेह शासन स्थापित करेगी।
हालांकि, एक दशक से अधिक समय बाद भ्रष्टाचार-मुक्त शासन की यह कहानी अब विवादों के घेरे में दिखाई देती है। आलोचकों का तर्क है कि “भ्रष्टाचार के प्रति शून्य सहिष्णुता” का नारा कई बार एक राजनीतिक संदेश अधिक लगता है, जबकि वास्तविकता कहीं अधिक जटिल और बहुआयामी है।
भारत में भ्रष्टाचार के खिलाफ राजनीतिक विमर्श को निर्णायक रूप से आकार देने वाला क्षण 2011 का व्यापक जन आंदोलन था, जिसे आमतौर पर इंडिया अगेंस्ट करप्शन आंदोलन के रूप में जाना जाता है। सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे के नेतृत्व में शुरू हुए इस आंदोलन ने लाखों लोगों को सड़कों पर ला दिया। उस समय 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन, राष्ट्रमंडल खेल और अन्य मामलों से जुड़े आरोपों ने सरकार की विश्वसनीयता को गंभीर रूप से प्रभावित किया था। आंदोलन की केंद्रीय मांग जन लोकपाल विधेयक के माध्यम से एक शक्तिशाली और स्वतंत्र लोकपाल संस्था की स्थापना थी, जो उच्च स्तर के भ्रष्टाचार की निष्पक्ष जांच कर सके।
शुरुआत में यह आंदोलन नागरिक समाज के विरोध के रूप में उभरा, लेकिन जल्द ही इसका प्रभाव भारत की राजनीति पर गहराई से पड़ने लगा। इसने न केवल भ्रष्टाचार को राष्ट्रीय राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया, बल्कि उस समय सत्तारूढ़ सरकार के प्रति व्यापक असंतोष को भी राजनीतिक अभिव्यक्ति दी। आंदोलन से जुड़े कुछ नेताओं ने बाद में आम आदमी पार्टी (आप) का गठन किया, जिसने विशेष रूप से दिल्ली की राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान हासिल किया।
फिर भी, एक दशक बाद इस आंदोलन की विरासत को लेकर मतभेद बने हुए हैं। कुछ विश्लेषकों का कहना है कि उस समय लगाए गए कई बड़े आरोप अदालतों में दोषसिद्धि तक नहीं पहुंच पाए, जिससे यह सवाल उठता है कि क्या भ्रष्टाचार के मुद्दे को राजनीतिक रूप से बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया था। दूसरी ओर, आंदोलन के समर्थकों का मानना है कि यह व्यापक जन असंतोष का वास्तविक प्रतिबिंब था और इसने राजनीतिक व्यवस्था को जवाबदेही के लिए मजबूर किया।
इतिहासकारों और राजनीतिक विश्लेषकों के बीच व्यापक सहमति है कि इस आंदोलन से बने राजनीतिक माहौल ने 2014 के आम चुनावों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने खुद को एक ऐसे विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया जो निर्णायक नेतृत्व, प्रशासनिक दक्षता और पारदर्शिता का नया अध्याय शुरू करेगा।
हालांकि, आलोचक आज यह सवाल उठाते हैं कि क्या भ्रष्टाचार-मुक्त शासन का वादा पूरी तरह साकार हुआ है। इस संदर्भ में सबसे अधिक चर्चा राजनीतिक फंडिंग के मुद्दे पर हुई है। 2017 में शुरू की गई चुनावी बांड योजना को राजनीतिक चंदे में पारदर्शिता बढ़ाने के उद्देश्य से पेश किया गया था। लेकिन आलोचकों ने इसे इसलिए विवादास्पद बताया क्योंकि इससे दानदाताओं की पहचान सार्वजनिक नहीं होती थी।
2024 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने इस योजना को असंवैधानिक घोषित करते हुए रद्द कर दिया और कहा कि यह नागरिकों के सूचना के अधिकार का उल्लंघन करती है। इस फैसले के बाद राजनीतिक वित्तपोषण की पारदर्शिता और लोकतांत्रिक जवाबदेही को लेकर नई बहस शुरू हो गई।
लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता को लेकर भी समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। चुनाव आयोग जैसे संवैधानिक निकायों की भूमिका और उनकी स्वायत्तता को लेकर विपक्षी दलों तथा कई संवैधानिक विशेषज्ञों ने चिंता व्यक्त की है। विशेष रूप से 2023 में पारित मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम ने नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव किया, जिसे लेकर आलोचकों ने आशंका जताई कि इससे कार्यपालिका का प्रभाव बढ़ सकता है। हालांकि सरकार का कहना है कि यह व्यवस्था संस्थागत दक्षता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से बनाई गई है।
संस्थागत जवाबदेही से जुड़ी बहस वित्तीय संस्थानों तक भी फैली है। उदाहरण के तौर पर, प्रधानमंत्री नागरिक सहायता और राहत कोष (पीएम केयर्स फंड) को लेकर पारदर्शिता के सवाल उठाए गए हैं। आलोचकों का कहना है कि यह फंड पारंपरिक संसदीय निगरानी और नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की लेखा-जांच के दायरे से बाहर है। दूसरी ओर, सरकार का तर्क है कि यह फंड कानूनी प्रावधानों के भीतर संचालित होता है और इसका स्वतंत्र ऑडिट कराया जाता है।
आर्थिक नीतियों को लेकर भी राजनीतिक विमर्श में भ्रष्टाचार और शासन की गुणवत्ता का प्रश्न जुड़ता रहा है। कोविड-19 महामारी के बाद सरकार को अर्थव्यवस्था को सहारा देने और सामाजिक योजनाओं को बनाए रखने के लिए सार्वजनिक खर्च बढ़ाना पड़ा, जिससे सार्वजनिक ऋण में वृद्धि हुई। आलोचक इसे आर्थिक प्रबंधन की चुनौती के रूप में देखते हैं, जबकि सरकार के समर्थक इस बात पर जोर देते हैं कि भारत आज भी दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक है और कई संरचनात्मक सुधारों ने दीर्घकालिक विकास की संभावनाओं को मजबूत किया है।
सामाजिक कल्याण योजनाओं को लेकर भी मतभेद दिखाई देते हैं। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के दौरान शुरू किया गया महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) ग्रामीण परिवारों को वर्ष में 100 दिन का रोजगार सुनिश्चित करने का प्रावधान देता है। कुछ आलोचकों का कहना है कि हाल के वर्षों में बजटीय आवंटन और क्रियान्वयन के पैटर्न ने इस योजना को कमजोर किया है। वहीं सरकार का कहना है कि मनरेगा पर पर्याप्त खर्च जारी है और प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना तथा प्रत्यक्ष लाभ अंतरण जैसी पहलों ने सामाजिक सुरक्षा को और मजबूत किया है।
इन नीतिगत बहसों से परे एक व्यापक चिंता लोकतांत्रिक विमर्श की स्थिति को लेकर भी सामने आती है। मीडिया संस्थानों पर दबाव, नागरिक समाज संगठनों पर नियामकीय कार्रवाई और विपक्षी नेताओं के खिलाफ जांच एजेंसियों की सक्रियता को लेकर आरोप-प्रत्यारोप होते रहे हैं। विपक्ष का कहना है कि इससे राजनीतिक प्रतिस्पर्धा असमान हो सकती है, जबकि सरकार का तर्क है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई कानून के अनुसार और संस्थागत प्रक्रियाओं के तहत की जाती है।
दरअसल, व्यापक सवाल केवल यह नहीं है कि किसी एक सरकार के दौरान भ्रष्टाचार मौजूद है या नहीं। भ्रष्टाचार ऐतिहासिक रूप से लगभग सभी राजनीतिक व्यवस्थाओं के सामने एक चुनौती रहा है। असली प्रश्न यह है कि क्या लोकतांत्रिक संस्थान इतने मजबूत हैं कि वे सत्ता में बैठे किसी भी दल को जवाबदेह ठहरा सकें।
भारत का लोकतंत्र अपने इतिहास में कई उतार-चढ़ावों के बावजूद उल्लेखनीय लचीलापन दिखाता रहा है। न्यायपालिका, स्वतंत्र चुनाव और सार्वजनिक बहस जैसे तंत्र नागरिकों को सत्ता से जवाबदेही मांगने का अवसर प्रदान करते हैं। इसलिए “भ्रष्टाचार के खिलाफ” होने के दावे का मूल्यांकन केवल राजनीतिक भाषणों से नहीं, बल्कि संस्थानों की मजबूती, शासन की पारदर्शिता और नागरिकों के अनुभवों के आधार पर किया जाना चाहिए।
आज भारत के सामने चुनौती यह है कि स्वच्छ शासन का वादा केवल चुनावी नारा बनकर न रह जाए। इसे संस्थागत अखंडता, पारदर्शी नीतियों और समान जवाबदेही की स्थायी प्रतिबद्धता में बदलना होगा—ऐसी प्रतिबद्धता जो किसी भी दल, विचारधारा या सत्ता के केंद्र से परे हो।
(जगदीश गौतम मीडियामैप न्यूज नेटवर्क के कार्यकारी संपादक हैं।)
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