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डॉ. सतीश मिश्रा

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नई दिल्ली | शनिवार | 20 दिसंबर 2025

मोदी–शाह की भारतीय जनता पार्टी पर कसती जा रही शिकंजानुमा पकड़ को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ओर से चुनौती मिलती दिख रही है। उत्तर प्रदेश में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के बाद चार करोड़ मतदाताओं के “गायब” होने का उनका दावा, निर्वाचन आयोग के समर्थन में और विपक्ष के ‘वोट चोरी’ के आरोपों के खिलाफ शीर्ष भाजपा नेतृत्व द्वारा दिए जा रहे बयानों से पूरी तरह विपरीत है।

पिछले सोमवार लखनऊ में आयोजित एक कार्यक्रम में—जहां पंकज चौधरी को औपचारिक रूप से प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बनाया गया—मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने नई प्रदेश टीम की प्राथमिक जिम्मेदारी मतदाताओं के गणना और पंजीकरण को बताया। उन्होंने कहा कि पिछले चुनाव में उत्तर प्रदेश में 15.60 करोड़ मतदाता थे और यह संख्या बढ़कर 16 करोड़ होनी चाहिए थी, लेकिन एसआईआर के बाद राज्य में मतदाताओं की संख्या घटकर 12 करोड़ रह गई।

योगी ने साफ शब्दों में कहा,
“चार करोड़ का गैप मिसिंग है… और ये आपके विरोधी नहीं हैं, इनमें से 85 प्रतिशत आपके (भाजपा के) मतदाता हैं।”

पार्टी कार्यकर्ताओं से कही गई यह बात कांग्रेस नेता राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं—जैसे समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव—द्वारा पिछले कुछ महीनों से उठाए जा रहे सवालों से अलग नहीं है। इस बयान से यह आभास मिलता है कि स्वयं योगी आदित्यनाथ भी निर्वाचन आयोग द्वारा चलाए जा रहे एसआईआर अभ्यास को संदेह की निगाह से देख रहे हैं। अप्रत्यक्ष रूप से यह विपक्ष के उन आरोपों की पुष्टि करता है, जिनमें कहा जा रहा है कि आयोग केंद्र सरकार और विशेष रूप से केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के प्रभाव में काम कर रहा है।

यहां यह याद करना जरूरी है कि 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की ऐतिहासिक जीत के बावजूद योगी आदित्यनाथ न तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहली पसंद थे और न ही तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की। दोनों मनोज सिन्हा के नाम पर सहमत थे, जो वर्तमान में जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल हैं। गोरखपुर के प्रभावशाली गोरखनाथ मंदिर के महंत और हिंदू युवा वाहिनी के संस्थापक के रूप में अपनी स्वतंत्र पहचान रखने वाले योगी ने मुख्यमंत्री पद तक पहुंचने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का सहारा लिया।

बताया जाता है कि 2017 में योगी ने स्पष्ट संकेत दिया था कि यदि उन्हें मुख्यमंत्री नहीं बनाया गया, तो वे अलग राह भी चुन सकते हैं। उस समय आरएसएस का समर्थन उनके साथ खड़ा हुआ और मोदी–शाह की जोड़ी को अनिच्छा से ही सही, उन्हें स्वीकार करना पड़ा। हालांकि इसके बाद भी दोनों पक्षों के बीच तनाव लगातार बना रहा। उन्हें हटाने के प्रयास हुए, लेकिन योगी ने—वसुंधरा राजे, राजनाथ सिंह या शिवराज सिंह चौहान की तरह—पीछे हटने के बजाय मोर्चा संभाले रखा।

आज स्थिति यह है कि मोदी–शाह की जोड़ी पार्टी और सरकार—दोनों में सत्ता के लगभग हर लीवर को नियंत्रित कर रही है। संस्थागत स्वायत्तता पर सवाल उठ रहे हैं और पार्टी के भीतर दमघोंटू माहौल बन चुका है। आंतरिक लोकतंत्र कमजोर पड़ चुका है और मार्गदर्शक की भूमिका निभाने वाला आरएसएस भी पहले जैसी निर्णायक स्थिति में नहीं दिखता।

मुख्यमंत्री और पार्टी पदों पर नियुक्तियों में वफादारी को योग्यता और वैचारिक प्रतिबद्धता से ऊपर रखा जा रहा है। इससे पार्टी के भीतर बेचैनी और असंतोष गहराता जा रहा है। आधिकारिक रूप से कहा जाता है कि पद उन्हीं को मिलते हैं जिन्होंने कड़ी मेहनत की है, लेकिन 2014 से पहले का दौर बताता है कि तब अनुभव, वरिष्ठता और सामाजिक प्रतिष्ठा को अधिक महत्व दिया जाता था। 45 वर्षीय नितिन नवीन को कार्यकारी अध्यक्ष बनाना इसी बदलते मानदंड का उदाहरण है, जिसे पीढ़ीगत बदलाव के नाम पर पेश किया गया, जबकि इससे कई वरिष्ठ नेताओं में नाराज़गी फैली।

पार्टी और सरकार पर गुजरात लॉबी के कथित प्रभाव को लेकर भीतरखाने चर्चाएं आम हैं। असंतोष और हताशा की यह अंतर्धारा नेता निजी बातचीत में स्वीकार करते हैं, लेकिन खुलकर सामने आने का साहस कम ही दिखता है।

योगी आदित्यनाथ स्वयं को देश के भावी प्रधानमंत्री के रूप में देखते हैं और अमित शाह के लिए एक संभावित चुनौती बनकर उभर रहे हैं—जबकि शाह भी अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर महत्वाकांक्षी माने जाते हैं। इस सत्ता-संघर्ष में मोदी–शाह की जोड़ी योगी को मुख्यमंत्री पद से हटाने के प्रयास कर सकती है, लेकिन मौजूदा संकेत बताते हैं कि भगवाधारी नेता ने अपनी जमीन मजबूत कर ली है और पीछे हटने के मूड में नहीं हैं।

भाजपा पर वर्षों की राजनीतिक रिपोर्टिंग के आधार पर यह कहा जा सकता है कि परिस्थितियां धीरे-धीरे योगी के पक्ष में जाती दिख रही हैं। प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता में आई गिरावट और करिश्मे की फीकी पड़ती चमक, अमित शाह की स्थिति को भी कमजोर करती है। शाह की शक्ति काफी हद तक मोदी की लोकप्रियता पर निर्भर रही है; अपने दम पर उनके पास न तो व्यापक जनसमर्थन है और न ही वैसी स्वीकृति।

आने वाले दिनों में भारतीय राजनीति की शतरंज पर योगी आदित्यनाथ और मोदी–शाह की जोड़ी के बीच चालों और जवाबी चालों का रोमांचक राजनीतिक थ्रिलर खुलता नजर आ सकता है।

(डॉ. सतीश मिश्रा वरिष्ठ पत्रकार और अनुभवी राजनीतिक विश्लेषक हैं। वे ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन में सीनियर फेलो रह चुके हैं।)

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