भारत के संवैधानिक मूल्यों के भविष्य को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच शनिवार को कॉन्स्टीट्यूशन क्लब ऑफ़ इंडिया में पत्रकारों, वकीलों, राजनीतिक विश्लेषकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की एक महत्वपूर्ण सभा हुई। “रीबिल्डिंग द रिपब्लिक: रिस्टोरिंग कॉन्स्टीट्यूशनल मोरैलिटी इन इंडिया” शीर्षक से आयोजित इस सार्वजनिक संवाद का उद्देश्य संविधान की प्रस्तावना में ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘समाजवादी’ शब्दों के शामिल किए जाने की वर्षगांठ को स्मरण करना था।
‘हम भारत के लोग’ नामक समूह द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में वक्ताओं ने कानूनी और संस्थागत तरीकों से संवैधानिक मूल्यों के कथित क्षरण पर गंभीर चिंता जताई और सतर्कता का आह्वान किया। वरिष्ठ पत्रकार क़ुर्बान अली ने भारत की बहुलतावादी परंपरा की याद दिलाते हुए कहा, “भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम बहादुर शाह ज़फ़र के नेतृत्व में और अंतिम चरण महात्मा गांधी के नेतृत्व में हुआ। यह निरंतरता हमारे देश की समावेशी प्रकृति को दर्शाती है।” उन्होंने ज़ोर दिया कि स्कूलों में बच्चों को संविधान की प्रस्तावना पढ़ाई जानी चाहिए ताकि वे संवैधानिक मूल्यों से जुड़े जिम्मेदार नागरिक बन सकें। “यह देश धर्मनिरपेक्ष था, है और रहेगा,” उन्होंने दृढ़ता से कहा।
सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता अवनी बंसल ने चेताया कि तानाशाही कभी खुले तौर पर संविधान बदलने की घोषणा नहीं करती। “तानाशाह संविधान को धीरे-धीरे क़ानूनों के ज़रिये बदलते हैं,” उन्होंने कहा। उन्होंने नागरिकों से सतर्क रहने और यह न मानने की अपील की कि खतरा केवल औपचारिक संशोधन के समय ही आएगा।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता और टिप्पणीकार शहनवाज़ आलम ने सरकार पर संवैधानिक जागरूकता फैलाने में उदासीनता का आरोप लगाया। उन्होंने इंदिरा गांधी का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने अपने जीवन की कीमत पर भी धर्मनिरपेक्षता की रक्षा की और कभी धार्मिक आधार पर भेदभाव स्वीकार नहीं किया।
वरिष्ठ पत्रकार पंकज श्रीवास्तव ने संविधान की समानतावादी भावना पर ज़ोर देते हुए कहा कि वह सभी को पहले नागरिक के रूप में देखता है। वहीं पत्रकार प्रशांत टंडन ने चेतावनी दी कि प्रस्तावना से ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘समाजवादी’ शब्द हटाने के प्रयास लगातार हो रहे हैं, जिनका विरोध आवश्यक है।
नेशनल फेडरेशन ऑफ़ यूथ मूवमेंट के अध्यक्ष मसीहउज़्ज़मा अंसारी ने विपक्ष की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब नागरिकों पर अत्याचार हो रहा हो तो लोकतंत्र में विपक्ष की सक्रियता अनिवार्य है।
अन्य वक्ताओं—हेमंत प्रधान, मुदस्सिर शम्स, रूबी अरुण, शरद जायसवाल, तमीज़ अहमद, शिवराम वाल्मीकि, शोएब ख़ान, दीपक छोटीवाला, आरिफ़ अली तुर्क, मसूद ख़ान, शहनवाज़ ख़ान, शम्सुल हसन और मिसबहुल हक़—ने भी सामाजिक न्याय, समावेशन और लोकतांत्रिक ज़िम्मेदारी पर अपने विचार रखे।
कार्यक्रम में कई प्रतिष्ठित पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को उनके योगदान के लिए सम्मानित किया गया। संवाद का संचालन डॉ. मोहम्मद ख़ालिद ख़ान ने किया। कार्यक्रम की शुरुआत राष्ट्रगान से हुई और समापन संविधान की प्रस्तावना के सामूहिक पाठ के साथ हुआ, जिसमें न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के प्रति प्रतिबद्धता को दोहराया गया—जो भारतीय गणराज्य की आधारशिला हैं।
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