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डॉ. एम. इक़बाल सिद्दीकी

नई दिल्ली I सोमवार I 18 मई 2026

लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति इस बात से नहीं मापी जाती कि सत्ता कितनी ऊँची आवाज़ में बोलती है, बल्कि इस बात से मापी जाती है कि वह कितने धैर्य से सुनती है। भारत का संवैधानिक गणराज्य एक गहरे नैतिक वचन पर आधारित है—कि हर नागरिक, चाहे उसकी सामाजिक स्थिति या वैचारिक पहचान कुछ भी हो, सम्मान और गरिमा का अधिकारी है। हमारे लोकतांत्रिक संस्थान केवल शासन चलाने के लिए नहीं बनाए गए, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति की मानवीय गरिमा की रक्षा के लिए निर्मित किए गए हैं।

इसी कारण संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाते हैं। वे केवल अदालतों या समाचार सुर्खियों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि सार्वजनिक संस्कृति, सामाजिक सोच और लोकतांत्रिक संवाद की सीमाओं को प्रभावित करते हैं।

इसी संदर्भ में भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की हालिया टिप्पणियों ने व्यापक असहजता उत्पन्न की है। वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में नामित किए जाने की मांग करने वाले एक वकील की याचिका पर सुनवाई के दौरान उन्होंने कथित रूप से कहा कि “कॉकरोच जैसे युवा” रोजगार न मिलने पर “मीडिया”, “सोशल मीडिया”, “आरटीआई कार्यकर्ता” और “अन्य एक्टिविस्ट” बन जाते हैं तथा “सब पर हमला करने लगते हैं।” उन्होंने कुछ आलोचकों को “परजीवी” भी बताया।

विवाद केवल एक उपमा तक सीमित नहीं है। लोकतंत्र में असहमति स्वाभाविक है। अदालतों की आलोचना होती है, पत्रकार सरकारों पर प्रश्न उठाते हैं, कार्यकर्ता संस्थाओं को चुनौती देते हैं। यह सब एक खुले समाज का हिस्सा है। लेकिन चिंता का विषय वह भाषा है जो असहमति को अमानवीय रूप में प्रस्तुत करती है।

इतिहास गवाह है कि जब नागरिकों को इंसान के बजाय कीड़े-मकोड़े, परजीवी या प्रदूषण के रूप में चित्रित किया जाने लगता है, तब लोकतंत्र अपनी नैतिक संवेदनशीलता खोने लगता है।

संवैधानिक भाषा की मर्यादा

न्यायाधीश सामान्य सार्वजनिक टिप्पणीकार नहीं होते। उनके शब्द संस्थागत अधिकार रखते हैं। मुख्य न्यायाधीश का पद केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि संवैधानिक संतुलन, न्यायिक विवेक और लोकतांत्रिक संयम का प्रतीक है। लोग न्यायालयों के निर्णयों से असहमत हो सकते हैं, परंतु वे फिर भी न्यायपालिका को अधिकारों और गरिमा का अंतिम संरक्षक मानते हैं।

इसीलिए संवैधानिक पदों से आने वाली अतिशयोक्तिपूर्ण टिप्पणियाँ भी महत्वपूर्ण हो जाती हैं। सामान्य बातचीत में लोग भावनात्मक या असावधान भाषा का प्रयोग कर सकते हैं, पर संवैधानिक पदाधिकारियों से उच्च स्तर की मर्यादा अपेक्षित होती है।

यह नहीं कहा जा रहा कि संस्थाएँ आलोचना का जवाब न दें। न्यायपालिका भी दुष्प्रचार और संगठित हमलों का सामना करती है। लेकिन आलोचकों की आलोचना भी संवैधानिक शिष्टता के दायरे में रहनी चाहिए।

भारतीय संविधान बार-बार मानवीय गरिमा की बात करता है। अनुच्छेद 21 को मानव गरिमा के अधिकार के रूप में विकसित किया गया है। प्रस्तावना “बंधुत्व” की बात करती है, जो व्यक्ति की गरिमा सुनिश्चित करता है। ऐसे संवैधानिक परिवेश में बेरोजगार या आलोचनात्मक युवाओं को “कॉकरोच” कहना नैतिक और लोकतांत्रिक दोनों दृष्टियों से चिंताजनक प्रतीत होता है।

अमानवीकरण का खतरनाक इतिहास

इतिहास बताता है कि अमानवीय भाषा कभी निरापद नहीं होती। किसी भी समाज में उत्पीड़न शुरू होने से पहले घृणा को सामान्य बनाया जाता है। लोगों को कीट, परजीवी या राष्ट्र के दुश्मन के रूप में चित्रित किया जाता है।

नाज़ी प्रचार तंत्र ने यहूदियों को समाज को प्रदूषित करने वाले जीवों की तरह प्रस्तुत किया। रवांडा नरसंहार से पहले तुत्सी समुदाय को “कॉकरोच” कहा गया। दुनिया भर की कई तानाशाही व्यवस्थाओं ने असहमत लोगों को “राष्ट्रविरोधी” या “आंतरिक शत्रु” बताकर हाशिये पर धकेला।

भारत ऐसी भयावहताओं से बहुत दूर है, पर इतिहास की चेतावनी यही है कि खतरनाक प्रवृत्तियों को शुरुआती स्तर पर पहचाना जाए। लोकतंत्र अचानक नहीं टूटते; वे धीरे-धीरे असहिष्णु भाषा और नैतिक असंवेदनशीलता के कारण कमजोर होते हैं।

आज सार्वजनिक जीवन में अपमानजनक भाषा का सामान्य होना ही सबसे बड़ी चिंता है। टीवी बहसें विरोधियों को दुश्मन में बदल देती हैं। सोशल मीडिया संवाद से अधिक अपमान को पुरस्कृत करता है। आलोचकों को “राष्ट्रविरोधी”, “अर्बन नक्सल”, “टुकड़े-टुकड़े गैंग” या “विदेशी एजेंट” कहकर खारिज करना आम होता जा रहा है।

ऐसे समय में संवैधानिक संस्थाओं की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है कि वे संयम और सभ्यता का उदाहरण प्रस्तुत करें—विशेषकर न्यायपालिका की।

युवा असहमति कोई बीमारी नहीं

इस टिप्पणी का सबसे चिंताजनक पक्ष युवाओं और कार्यकर्ताओं के प्रति उपेक्षापूर्ण दृष्टिकोण है। भारत आज एक युवा देश है जो बेरोजगारी, असुरक्षा और सीमित अवसरों जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है। अनेक शिक्षित युवा पत्रकारिता, सामाजिक सक्रियता या सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी आवाज़ उठाते हैं क्योंकि उन्हें औपचारिक संस्थाएँ दूर और बंद प्रतीत होती हैं।

निश्चित रूप से सोशल मीडिया पर अतिशयोक्ति, झूठे आरोप और प्रदर्शनकारी आक्रोश जैसी समस्याएँ मौजूद हैं। लेकिन आलोचनात्मक युवाओं को सामूहिक रूप से “कॉकरोच” कहना लोकतांत्रिक भागीदारी को सामाजिक उपद्रव समझने जैसा है।

भारत का इतिहास कुछ और कहता है। स्वतंत्रता आंदोलन में युवाओं ने अग्रिम भूमिका निभाई। आपातकाल के विरोध में छात्रों ने संघर्ष किया। सूचना के अधिकार आंदोलन ने भ्रष्टाचार उजागर किया और लोकतंत्र को मजबूत किया। अनेक आरटीआई कार्यकर्ताओं ने इसके लिए हिंसा और उत्पीड़न तक सहा। ऐसे आंदोलनों को “परजीवी व्यवहार” से जोड़ना स्वतंत्र भारत के सबसे परिवर्तनकारी लोकतांत्रिक प्रयासों में से एक का अवमूल्यन करना है।

लोकतंत्र तब कमजोर नहीं होता जब नागरिक कठिन प्रश्न पूछते हैं; वह तब कमजोर होता है जब संस्थाएँ सुनना बंद कर देती हैं।

न्यायपालिका और आलोचना का अधिकार

भारतीय न्यायपालिका ने ऐतिहासिक रूप से असहमति के अधिकार की रक्षा की है। सर्वोच्च न्यायालय ने अनेक फैसलों में कहा है कि आलोचना राजद्रोह नहीं है और असहमति लोकतंत्र का “सेफ्टी वाल्व” है।

परंतु जब आलोचकों को ही अमानवीय भाषा में चित्रित किया जाए, तब इस परंपरा को बनाए रखना कठिन हो जाता है। एक परिपक्व न्यायपालिका भय से नहीं, बल्कि विश्वसनीयता से शक्ति प्राप्त करती है। संस्थागत सम्मान निष्पक्षता, संयम और संवाद से अर्जित होता है।

आज भारत में संस्थाओं और नागरिकों के बीच भावनात्मक दूरी बढ़ती दिख रही है। युवा स्वयं को अनसुना महसूस करते हैं, जबकि संस्थाएँ स्वयं को निरंतर हमले का शिकार मानती हैं। यह केवल कानूनी नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संकट है।

लोकतांत्रिक संयम की आवश्यकता

यह विवाद किसी दलगत शोर-शराबे में बदलना नहीं चाहिए। आज यदि एक पक्ष ऐसी भाषा का समर्थन करता है, तो कल दूसरा पक्ष भी किसी अन्य समूह के खिलाफ इसी प्रकार की भाषा को उचित ठहरा सकता है। लोकतांत्रिक मूल्यों का अस्तित्व चयनात्मक नैतिकता पर नहीं टिक सकता।

भारत के सार्वजनिक जीवन को अमानवीकरण की संस्कृति से बाहर निकलने की आवश्यकता है। राजनेताओं, पत्रकारों, न्यायाधीशों, कार्यकर्ताओं और नागरिकों—सभी को सम्मानजनक असहमति की संस्कृति पुनर्जीवित करनी होगी।

लोकतंत्र केवल संविधान और संस्थाओं से नहीं चलता। वह पारस्परिक सम्मान और इस क्षमता से जीवित रहता है कि हम अपने सबसे तीखे आलोचक को भी पूर्ण मानव के रूप में देखें।

युवा आलोचक कुचले जाने वाले कीट नहीं, बल्कि सुने जाने वाले नागरिक हैं। कोई भी गणराज्य यदि अपने प्रश्न पूछने वाले युवाओं से डरने लगे, तो वह केवल आलोचना ही नहीं, अपनी लोकतांत्रिक आत्मा भी खोने लगता है।
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