पंजाब की सरज़मीं ने एक बार फिर “पंजाबियत” की मिसाल पेश की है। अमृतसर ज़िले के अजनाला तहसील के रईजादा गाँव में सिख, हिंदू, मुस्लिम, ईसाई और दलित समुदाय के लोगों ने मिलकर 77 साल से बंद पड़ी एक पुरानी मस्जिद को पुनर्जीवित किया और मुसलमानों को सौंप दिया। गाँव के सरपंच सरदार ओंकार सिंह के नेतृत्व में हुआ यह कदम धार्मिक एकता और भाईचारे का प्रतीक बन गया। दशकों बाद इस मस्जिद में जुमे की नमाज़ अदा की गई, जिसमें सभी धर्मों के लोग शामिल हुए।
रावी नदी के किनारे, भारत-पाक सीमा से सटे इस गाँव की यह मस्जिद विभाजन के बाद खंडहर में तब्दील हो गई थी। इसके पास का स्कूल भी वर्षों से बंद था। अब गाँववालों ने एक स्वर में इसे मुस्लिम भाइयों को सौंपते हुए कहा—“यह हमारी साझा विरासत है।” सरपंच ओंकार सिंह बोले, “पंजाब में हम साथ चलते हैं, अलग नहीं।”
समारोह की अध्यक्षता करते हुए पंजाब के शाही इमाम मौलाना मोहम्मद उस्मान रहमानी लुधियानवी ने कहा कि यह पहल गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं की याद दिलाती है, जिन्हें मुस्लिम ‘पीर बाबा नानक साहिब’ के नाम से सम्मान देते हैं। उन्होंने कहा, “गुरु गोबिंद सिंह जी को जब युद्ध के समय मुस्लिम भाई नबी खान और गनी खान ने पालकी में सुरक्षित पहुँचाया था, तब भी यही भाईचारा था। हिन्दू दीवान टोडरमल ने गुरु के साहिबजादों के अंतिम संस्कार के लिए अपनी दौलत लुटा दी थी। यही पंजाबियत है—अनेकता में एकता।”
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बाढ़ राहत के शहीदों को समर्पित
इस मस्जिद का पुनर्निर्माण दो मुस्लिम स्वयंसेवकों—उत्तराखंड के शमशाद भगवनपुरी और राजस्थान के जकरिया मेवाती—की याद में किया जा रहा है, जिन्होंने 2025 की पंजाब बाढ़ राहत के दौरान जान गंवाई। उस वर्ष भारी बारिश और बांधों से निकले पानी ने अमृतसर, गुरदासपुर, फिरोजपुर और पठानकोट में तबाही मचाई थी। लगभग 55 लोगों की मौत और हजारों के बेघर होने पर देशभर की करीब 3,000 मस्जिदों ने शाही इमाम के नेतृत्व में राहत के लिए दो करोड़ रुपये से अधिक एकत्र किए।
शमशाद हफ़्तेभर राहत कार्य के बाद यमुनानगर के पास सड़क हादसे में शहीद हुए। जकरिया की मृत्यु खडर–पटियाला हाईवे पर लौटते समय हुई। शाही इमाम ने कहा, “वे सिर्फ राशन नहीं लाए, मोहब्बत लाए थे। इंसानियत की सेवा में उन्होंने जान दी, पंजाब उनका कर्ज़दार रहेगा।”
रईजादा मस्जिद अब ‘मस्जिद शमशाद भगवनपुरी’ के नाम से पुनर्निर्मित की जाएगी। पुरानी दीवारों की ईंटें ही नई नींव में लगेंगी और एक स्मृति-फलक पर उनका नाम अंकित होगा। इसी तरह पटियाला ज़िले के फगन माजरा में ‘मस्जिद जकरिया मेवाती’ बनेगी, जिसकी नींव शहीदों के परिजन रखेंगे।
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पंथों के संगम की गूंज
समारोह के अंत में जब पास के गुरुद्वारे से शाम की गुरबानी और मस्जिद से मगरिब की अज़ान एक साथ गूंजी, तो पूरा माहौल भाईचारे से भर उठा। गाँववालों ने मिलकर मिठाइयाँ बाँटीं। यह दृश्य उन अन्य गाँवों की याद दिलाता है जहाँ गैर-मुस्लिमों ने पुरानी मस्जिदें बहाल कीं—जैसे भलूर (मोगा) और शेरपुर सोधियां (संगरूर)। हाल ही में एक सिख परिवार ने नई मस्जिद के लिए ज़मीन दान की, जिसकी नींव खुद शाही इमाम ने रखी।
बाढ़ के दौरान भी यही सहयोग देखने को मिला—हरियाणा के मेवात से सैकड़ों ट्रक राहत सामग्री पंजाब, हिमाचल और जम्मू-कश्मीर भेजी गई। खालसा ऐड जैसे संगठनों ने भी मिलकर बचाव कार्य किया। एक स्वयंसेवक ने कहा, “हमारी सेवा का कोई धर्म नहीं—हम सब इंसानियत के बच्चे हैं।”
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जीवित है पंजाबियत की परंपरा
पिछले कुछ वर्षों में पंजाब में लगभग 30 मस्जिदें आपसी सहयोग से पुनर्निर्मित हुई हैं। कई जगह सिख दानदाताओं ने ज़मीन या धन दिया। बरनाला के मूम गाँव में 2018 में सिखों ने मस्जिद बनवाई जो गुरुद्वारे की दीवार से सटी है—भूमि ब्राह्मण परिवार ने दी। 2022 में बखतगढ़ में सिख किसान अमनदीप सिंह ने मस्जिद के लिए ज़मीन दी और हिंदू-सिखों ने मिलकर 12 लाख रुपये जुटाए।
मलेरकोटला के उमरपुरा में सरपंच सुखजिंदर सिंह नोनी ने 8 लाख की ज़मीन दान दी और सिख श्रद्धालुओं ने सहयोग किया। संगरूर के नथोवाल में 2015 में गैर-मुस्लिमों ने 25 लाख की मरम्मत लागत का दो-तिहाई हिस्सा उठाया।
ऐतिहासिक उदाहरण भी यही बताते हैं—श्री हरगोबिंदपुर की 17वीं सदी की “गुरु की मस्जिद” को 2022 में सिखों ने पुनर्जीवित किया, जिसे यूनेस्को ने मान्यता दी।
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यह सब पंजाब की आत्मा—सेवा और ‘सरबत दा भला’—का जीवंत प्रमाण है।
रावी के किनारे जैसे-जैसे सूरज ढला, शाही इमाम ने दुआ की:
“यह मोहब्बत पूरे भारत में फैले, और हर दिल भाईचारे का उजाला बने।”
रईजादा में यह सपना पहले ही हक़ीक़त बन चुका है—एक ईंट, एक बंधन के साथ। (Sabhar: India Tomorrow)
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