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अनिल जौहरी


नई दिल्ली | शनिवार | 3 जनवरी 2026

स्तुओं या सेवाओं—दोनों से संबंधित विनियमों (रेगुलेशन्स) का मूल उद्देश्य जनहित की रक्षा करना होता है। ये विनियम स्वास्थ्य, सुरक्षा, पर्यावरण, भ्रामक व्यापारिक प्रथाओं, डेटा गोपनीयता, सार्वजनिक व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे आधारों पर बनाए जाते हैं। इन सिद्धांतों को विश्व व्यापार संगठन (WTO) के विभिन्न समझौतों में विधिवत संहिताबद्ध किया गया है, जैसे—तकनीकी बाधाओं पर समझौता (TBT), स्वच्छता एवं पादप-स्वच्छता उपायों पर समझौता (SPS) तथा सेवाओं के व्यापार पर सामान्य समझौता (GATS)।

स्वतंत्रता (Independence) का अर्थ है—किसी व्यक्ति या संगठन का किसी अन्य व्यक्ति या संगठन के नियंत्रण, अधिकार या प्रभाव से मुक्त होना।

निष्पक्षता (Impartiality) का अर्थ है—वास्तविक और प्रतीत होने वाली वस्तुनिष्ठता की उपस्थिति।

ये परिभाषाएँ ISO 17000:2020 Conformity Assessment — Vocabulary and General Principles से ली गई हैं, जिनमें तिरछे अक्षरों में कुछ परिवर्तन किए गए हैं।

नियामकों की निष्पक्षता को क्या प्रभावित कर सकता है?

यदि नियामकों से यह अपेक्षा की जाए कि वे आत्मनिर्भर हों—अर्थात जिस उद्योग को वे नियंत्रित करते हैं, उसी से शुल्क वसूल कर अपने खर्च पूरे करें—तो इससे एक गंभीर जोखिम पैदा होता है। ऐसी स्थिति में यह आशंका रहती है कि राजस्व खोने के डर से वे कठोर कार्रवाई करने से हिचकिचाएँ। यही कारण है कि विश्व स्तर पर नियामक संस्थाएँ सार्वजनिक सेवाओं के रूप में कार्य करती हैं और उन्हें राज्य द्वारा वित्तपोषित किया जाता है। वे या तो बहुत नाममात्र शुल्क लेते हैं या बिल्कुल नहीं लेते, ताकि उन पर स्वयं कमाई का दबाव न हो। इस सिद्धांत से कोई भी विचलन स्वयं नियमन के उद्देश्य को कमजोर कर सकता है।

नियामक सरकार के दबाव के प्रति भी संवेदनशील हो सकते हैं। इसी कारण उन्हें सरकार से एक निश्चित दूरी पर स्वतंत्र निकाय के रूप में स्थापित किया जाता है—एक प्रवृत्ति जिसे भारत में भी अपनाया गया है। एफएसएसएआई (FSSAI), ट्राई (TRAI) और आईआरडीए (IRDA) इसके स्पष्ट उदाहरण हैं।

एक और महत्वपूर्ण प्रश्न है—नियामक किस मंत्रालय के अंतर्गत रखे जाएँ?

आइए भारत में विनियमन के इतिहास को देखें।

कारखाना अधिनियम (Factories Act) कार्यस्थल सुरक्षा से जुड़ा है, लेकिन इसका संरक्षक उद्योग मंत्रालय नहीं बल्कि श्रम मंत्रालय है।
औषधि नियमन वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य मंत्रालयों के अधीन होता है, न कि फार्मास्यूटिकल उद्योग से जुड़े मंत्रालयों के।
खाद्य नियमन भी विश्व भर में स्वास्थ्य मंत्रालयों के अंतर्गत आता है, न कि खाद्य उद्योग मंत्रालयों के।
इसी तरह रासायनिक और पर्यावरणीय नियमन पर्यावरण मंत्रालयों के अधीन होते हैं, न कि उद्योग या रसायन मंत्रालयों के।
कीटनाशकों का नियमन भी कृषि मंत्रालय द्वारा किया जाता है, न कि रसायन मंत्रालय द्वारा।

इसका कारण स्पष्ट है—किसी उद्योग से संबंधित मंत्रालय का मुख्य दायित्व उस उद्योग के हितों की रक्षा करना और उसके विकास को बढ़ावा देना होता है। ऐसे में वही मंत्रालय यदि नियामक की भूमिका निभाए, तो हितों के टकराव (Conflict of Interest) की आशंका रहती है।

इसी तर्क के आधार पर, बीआईएस अधिनियम (BIS Act) के तहत जहाँ लाइन मंत्रालय गुणवत्ता नियंत्रण आदेश (QCOs) जारी कर रहे हैं, वह पारंपरिक और वैश्विक दृष्टिकोण के विपरीत है और हितों के टकराव का जोखिम पैदा करता है। क्या हमें इस दृष्टिकोण पर पुनर्विचार करना चाहिए? संभवतः हाँ।

एक अन्य क्षेत्र में भी यही तर्क लागू होता है।

भारत निर्यात का भी नियमन करता है। इसके लिए निर्यात (गुणवत्ता नियंत्रण एवं निरीक्षण) अधिनियम मौजूद है और इसके अंतर्गत समुद्री खाद्य, दुग्ध उत्पाद, शहद आदि का नियमन निर्यात निरीक्षण परिषद (EIC) द्वारा किया जाता है। किंतु कुछ विनियम ऐसे भी हैं, जिन्हें वस्तु बोर्डों (Commodity Boards) या निर्यात संवर्धन परिषदों के अधीन रखा गया है, जिनका मुख्य उद्देश्य निर्यात को बढ़ावा देना है। यह भी हितों के टकराव का मामला हो सकता है। क्या कोई वस्तु बोर्ड निर्यात घटने के जोखिम पर निर्यातकों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करेगा? यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है।

नियामकों को क्या करना चाहिए और क्या नहीं?

नियामकों का मुख्य दायित्व उनके द्वारा निर्धारित नियमों के अनुपालन की जाँच करना है—चाहे यह उनके अपने तंत्र के माध्यम से हो या तीसरे पक्ष की एजेंसियों (जैसे FSSAI द्वारा प्रयुक्त खाद्य सुरक्षा एजेंसियाँ) के माध्यम से।

इस पृष्ठभूमि में, जिस उद्योग को वे नियंत्रित करते हैं, उसी का ‘हैंडहोल्डिंग’ करना स्पष्ट रूप से हितों के टकराव की स्थिति पैदा करता है। यहाँ तक कि कार्यान्वयन संसाधनों या प्रशिक्षण प्रदाताओं को प्रमाणित करना भी निष्पक्षता पर सवाल खड़े करता है। कल्पना कीजिए—यदि कोई तृतीय-पक्ष खाद्य सुरक्षा ऑडिट एजेंसी किसी ऐसे खाद्य व्यवसाय का ऑडिट कर रही हो, जिसने स्वच्छता मानकों के लिए एफएसएसएआई-प्रमाणित सलाहकार की सेवाएँ ली हों या एफएसएसएआई-स्वीकृत प्रशिक्षण प्रदाता से प्रशिक्षण प्राप्त किया हो—तो नियामक कितनी आसानी से गंभीर आपत्तियाँ उठा पाएगा? कहीं ऐसा न हो कि उसकी अपनी स्वीकृति प्रणाली ही संदिग्ध लगने लगे।

हालाँकि यह भी सच है कि नियामक अपने नियमों को सबसे बेहतर जानते हैं और जब कोई नया विनियमन लागू किया जाता है, तो उद्योग और संबंधित हितधारकों को जागरूक करने के लिए वे सबसे उपयुक्त होते हैं। वैश्विक स्तर पर सामान्य और सार्वजनिक प्रशिक्षण को हितों का टकराव नहीं माना जाता। लेकिन समस्या तब आती है जब नियामक स्वयं प्रशिक्षित तकनीकी कर्मियों वाले उद्योग का निरीक्षण करता है—ऐसे में गंभीर कमियों की ओर संकेत करना कठिन हो जाता है। संगठन के भीतर दिया गया प्रशिक्षण तो और भी अधिक समस्याग्रस्त है और इसे पूरी तरह निषिद्ध होना चाहिए।

इसलिए अपेक्षा यही होनी चाहिए कि नियामक अपने नियमों की व्याख्या और समझ के लिए कार्यक्रम आयोजित करें—बस इससे अधिक नहीं। यही सिद्धांत प्रमाणन योजनाओं और प्रत्यायन निकायों पर भी लागू होता है।

इसी कारण क्वालिटी काउंसिल ऑफ इंडिया के अंतर्गत कार्यरत नेशनल एक्रिडिटेशन बोर्ड फॉर सर्टिफिकेशन बॉडीज़ (NABCB) ने 2000 में स्थापना के बाद से कभी प्रमाणन या निरीक्षण निकायों का प्रशिक्षण नहीं किया—हालाँकि हाल के वर्षों में इस मानक से कुछ समझौते हुए हैं।

यदि नियामक या प्रत्यायन निकाय प्रशिक्षण प्रदाताओं या सलाहकारों को स्वीकृत करें, तो निष्पक्षता और भी अधिक प्रभावित होती है। किसी ऐसे उद्योग के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई करना कितना संभव होगा, जिसने नियामक द्वारा स्वीकृत सलाहकार से परामर्श लिया हो? ऐसी स्थिति में कार्रवाई स्वयं नियामक की निर्णय क्षमता पर प्रश्नचिह्न लगा देती है।

भारत में अधिकांश विनियमों की स्थिति को देखते हुए, नियामकों को चाहिए कि वे केवल मजबूत और प्रभावी नियमन प्रदान करने पर ध्यान केंद्रित करें और ऐसे कार्यों में न उलझें, जिन्हें अन्य हितधारकों पर छोड़ा जाना बेहतर है—खासकर तब, जब इसके लिए व्यवहार्य तंत्र पहले से मौजूद हों।

यह एक स्थायी समस्या रही है। जब भी कोई नया विनियमन, प्रत्यायन या प्रमाणन कार्यक्रम लागू होता है, तो दो प्रकार के संसाधनों की आवश्यकता होती है—एक, अनुपालन की जाँच के लिए और दूसरा, उद्योग में मानकों के कार्यान्वयन के लिए। दोनों जिम्मेदारियाँ एक ही संस्था को सौंपना हितों के टकराव के कारण न तो उचित है और न ही वांछनीय।

इस संदर्भ में भारत के पास एक बड़ा लाभ है—क्षेत्र-विशिष्ट सेक्टर स्किल काउंसिल के रूप में विकसित कौशल पारिस्थितिकी तंत्र। इनका मुख्य उद्देश्य उद्योग की आवश्यकताओं को पूरा करना और पेशेवरों व प्रशिक्षकों को प्रमाणित करना है। दुर्भाग्यवश, नियामकों और स्किल काउंसिलों के बीच अब तक पर्याप्त समन्वय नहीं रहा है, जबकि हाल के वर्षों में बीआईएस अधिनियम के तहत कई क्षेत्रों में गुणवत्ता नियंत्रण आदेश जारी किए गए हैं। इसमें तत्काल सुधार की आवश्यकता है। हेल्थकेयर सेक्टर स्किल काउंसिल और लाइफ साइंसेज़ सेक्टर स्किल डेवलपमेंट काउंसिल ने इस दिशा में पहल की है और उम्मीद है कि अन्य काउंसिल भी इसका अनुसरण करेंगी।

अंततः, निष्पक्षता और स्वतंत्रता के सर्वोच्च मानकों को बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि नियामक अपने नियमों की व्याख्या तक ही सीमित रहें। उद्योग के लिए दक्ष संसाधन विकसित करने का कार्य सेक्टर स्किल काउंसिलों या अन्य उपयुक्त हितधारकों पर छोड़ा जाना चाहिए, जिनके साथ नियामक सहयोग कर सकते हैं।

(अनिल जौहरी, नेशनल एक्रिडिटेशन बोर्ड फॉर सर्टिफिकेशन बॉडीज़ के पूर्व सीईओ और मानकीकरण के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय प्राधिकृत विशेषज्ञ हैं।)

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