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पूनम आई. कौशिश

नई दिल्ली | शनिवार | 13 दिसंबर 2025

हुत शोर-शराबा, पर मुद्दा कुछ नहीं! लोकसभा में कल वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूरे होने पर हुई बहस का सार यही था। कहने को तो यह सरकार द्वारा 1875 में बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित इस देशभक्ति पूर्ण कविता के वर्षभर चलने वाले समारोह का हिस्सा है, ताकि इससे जुड़े महत्वपूर्ण और अनजाने पहलुओं को सामने लाया जा सके। “ताकि वर्तमान को आत्मविश्वास से भर सकें और भारतीयों को यह साहस मिले कि कोई लक्ष्य उनके लिए असंभव नहीं।” ऐसा कहा गया।

लेकिन सवाल उठता है—अभी, संसद में ही क्यों? इसका जवाब राजनीति, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और सत्तारूढ़ दल के लिए इनके लाभों में छिपा है, जिसे वे “नेहरू की विभाजनकारी सोच और मुस्लिम तुष्टिकरण के पैटर्न” के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं।

मामला 1937 के उस विवादास्पद दौर से जुड़ा है जब प्रधानमंत्री मोदी के अनुसार कांग्रेस ने, नेहरू के नेतृत्व में, जिन्ना के इस विचार से सहमति जताई कि “वंदे मातरम् के कुछ हिस्से मुसलमानों को चिढ़ा सकते हैं” और इस आधार पर गीत के दो महत्वपूर्ण अंतरे हटा दिए गए—जो “उसकी आत्मा और दासता के दौर में आशा का शक्तिशाली उद्घोष थे।” मोदी के शब्दों में, “यही विभाजन के बीज थे। आज की पीढ़ी को यह जानना चाहिए कि राष्ट्र निर्माण के इस ‘महामंत्र’ के साथ अन्याय क्यों हुआ।”

इसका जवाब देते हुए कांग्रेस की प्रियंका गांधी ने सरकार पर “एक बड़ी गलती” का आरोप लगाया—सांस्कृतिक प्रतीक को हथियार बनाकर वर्तमान समस्याओं से ध्यान भटकाने का। उनका कहना था कि वंदे मातरम् पर बहस को चुनिंदा रूप से राजनीतिक अंक बटोरने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है और “नेहरू को चुनकर उद्धृत” किया जा रहा है, जबकि यह गीत पूरे देश में जीवित है। इससे भी आगे, इसे 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों की पृष्ठभूमि में माहौल गरमाने और स्वतंत्रता आंदोलन में आरएसएस की सीमित भूमिका को उभारने के प्रयास के रूप में भी देखा जा रहा है।

उन्होंने घटनाक्रम स्पष्ट करते हुए कहा कि 1937 में नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस कार्यसमिति ने रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह पर केवल दो अंतरों को गाने का निर्णय लिया, ताकि राष्ट्रीय आंदोलन में एकता बनी रहे। साथ ही आयोजकों को यह स्वतंत्रता दी गई कि वे वंदे मातरम् के अतिरिक्त या उसके स्थान पर कोई भी आपत्तिहीन गीत गा सकते हैं।

इसमें उनका तर्क उचित लगता है। 2021 के विधानसभा चुनाव में हार के बाद भाजपा वंदे मातरम् को बंगाली सांस्कृतिक अस्मिता के रक्षक के रूप में पेश कर रही है, ताकि ममता बनर्जी की टीएमसी को रक्षात्मक स्थिति में लाया जा सके। बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष लगातार टीएमसी पर आरोप लगा रहे हैं कि कोलकाता के उस पार्क को बंद किया गया है जहाँ “बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की प्रतिमा बिना माला के पड़ी है।”

भाजपा का आरोप है, “टीएमसी देशभक्त पार्टी नहीं है। वह पूरे राज्य के स्कूलों में टैगोर का गीत अनिवार्य कर सकती है, पर राष्ट्रीय गीत नहीं।” इसके उत्तर में हिंदुत्व समूह बंगाल में 1500 से अधिक स्थानों पर समारोह कर रहे हैं। इस पर ममता बनर्जी ने भाजपा पर पलटवार करते हुए कहा कि “यह पार्टी विभाजन फैलाने वाली है, जो दो महान बंगालियों—चट्टोपाध्याय (वंदे मातरम्) और रवींद्रनाथ टैगोर (जन गण मन)—को आमने-सामने खड़ा करना चाहती है।”

उधर कई विपक्षी नेताओं का कहना है कि राष्ट्रीय गीत एक प्रतीक मात्र है और इसे अनावश्यक महत्व न दिया जाए। वे भाजपा पर राष्ट्रीय प्रतीकों पर “स्वामित्व” जताने का आरोप लगाते हैं। उनकी राय में वंदे मातरम् गाना देशभक्ति की कसौटी नहीं होना चाहिए, न ही इसे न गाने पर जिद ठानी जानी चाहिए। हालांकि हर संसद सत्र के अंत में इसे अनिवार्य रूप से बजाया जाता है।

जो भी हो, गीत की उत्पत्ति चाहे जैसी हो, वंदे मातरम् बंगाल में हिंदुओं और मुसलमानों—दोनों के लिए—विभाजन काल में एक शक्तिशाली युद्धघोष था। यह एक औपनिवेशिक-विरोधी पुकार थी। 7 सितंबर 1905 को कांग्रेस ने वाराणसी अधिवेशन में इसे औपचारिक तौर पर राष्ट्रीय गीत के रूप में अपनाया।

परंतु अक्टूबर 1937 में कुछ मुस्लिम नेताओं ने आपत्ति जताई कि गीत के कुछ हिस्से इस्लाम की शिक्षाओं के विपरीत हैं और मातृभूमि की आराधना करने जैसा है, जो तौहीद (ईश्वर की एकता) के खिलाफ है। साथ ही भारत को देवी दुर्गा के रूप में दर्शाया जाना भी उन्हें आपत्तिजनक लगा। यह भी कहा गया कि यह आनंदमठ का हिस्सा है, जिसमें मुस्लिम-विरोधी संदेश है।

नेहरू ने उनकी धार्मिक चिंताओं को समझते हुए राष्ट्रीय आंदोलन में गीत की महत्ता को भी रेखांकित किया। इसी के बाद कांग्रेस ने दो अंतरों को ही अपनाने का निर्णय लिया। आयोजकों को अन्य उपयुक्त गीत चुनने की आज़ादी भी दी गई।

दिलचस्प बात यह है कि लंबे समय तक वंदे मातरम् को राष्ट्रीय गान की तरह माना जाता रहा, पर 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने जन गण मन को राष्ट्रीय गान घोषित किया, जबकि वंदे मातरम् को समान सम्मान प्रदान किया।

स्पष्ट है—वंदे मातरम् और जन गण मन, दोनों पवित्र, कर्णप्रिय और समान गौरव वाले गीत हैं। दोनों ने देशभक्ति जगाई, भारतीयों को संगठित किया और आज़ादी की लड़ाई में ऊर्जा भरी। समय आ गया है कि हमारे नेता इन पर राजनीति करना छोड़ें।

यह गीत इतिहास, पहचान और समकालीन राजनीति के संगम पर खड़ा है। यह राष्ट्रीय प्रतीकों के माध्यम से विविधता में एकता को मजबूत करेगा या फिर राजनीतिक टकराव का नया मैदान बनेगा—यह इस बात पर निर्भर करता है कि हमारे नेता इसे कैसे लेते हैं।

जैसे-जैसे वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूरे हो रहे हैं, चुनौती यह है कि इसके बहुआयामी उत्तराधिकार को स्वीकार करते हुए इस पर बातचीत देश की साझा राष्ट्रीय भावना को मजबूत करे, न कि कमजोर।

अंततः हमें समझना होगा कि भारत का बहुलतावादी चरित्र और जीवंत लोकतंत्र ठहरा हुआ नहीं है—यह निरंतर विकसित हो रहा है। सच है, दो गीत किसी राष्ट्र का भविष्य नहीं बनाते या बिगाड़ते। तभी बेहतर होगा कि हम वंदे मातरम् को जन गण मन के समान राष्ट्रीय सम्मान देते हुए इस अनावश्यक विवाद को हमेशा के लिए समाप्त करें। हमारे नेताओं और न्यायपालिका का ध्यान कहीं और—अधिक गंभीर मुद्दों पर—होना चाहिए। आप क्या कहते हैं? — आईएनएफए

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