(वरिष्ठ मीडिया व्यक्तित्व के.बी. माथुर इलाहाबाद के पत्रिका समूह में मुख्य कार्यकारी के रूप में कार्य कर चुके हैं। बाद में उन्होंने कॉरपोरेट जगत में मीडिया व नीति सलाहकार की भूमिका निभाई। अब सेवानिवृत्ति के बाद वे कनाडा के टारंटो में अपने पुत्र और परिवार के साथ रहते हैं। वे अक्सर भारत आते हैं और ‘‘मीडियामैप’’ के लिए यह विशेष लेख लिखने के लिए सहर्ष तैयार हुए हैं, जिसे भारत में उनके मित्रों और प्रशंसकों द्वारा पढ़ा जाएगा — संपादक)
मैं भारतीय मीडिया की वर्तमान स्थिति—इसके लगभग पतन—पर अपनी पीड़ा व्यक्त करने से अब तक बचता रहा हूँ। किंतु मेरे पुराने सहयोगी तथा द पायनियर के पूर्व संपादक प्रदीप माथुर द्वारा अच्छी पत्रकारिता के उदाहरण के रूप में एक समाचार पत्रिका प्रारंभ करने की पहल ने मुझे दस वर्षों की स्वैच्छिक निष्क्रियता से बाहर निकलने के लिए प्रेरित किया।
यह सत्य है कि भारतीय पत्रकारिता का पतन हाल के वर्षों में अधिक स्पष्ट दिखाई देता है, किंतु इसकी पटकथा 1990 के दशक में ही लिखी जा चुकी थी, जब टाइम्स ऑफ इंडिया जैसे प्रमुख प्रकाशनों ने पत्रकारों की नियुक्ति अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट) के आधार पर शुरू की। बीते तीन दशकों में संपादक की भूमिका को जानबूझकर कमजोर किया गया—विशेषकर तब, जब मालिक अशोक जैन के पुत्र समीर और विनीत जैन ने कार्यभार संभाला। उन्होंने पत्रकारिता की सामग्री को विज्ञापन राजस्व बढ़ाने के अनुरूप ढालने के निर्देश दिए।
तत्कालीन संपादक गिरीलाल जैन ने इसका खुलकर विरोध किया और स्पष्ट कहा कि पत्रकारों का काम श्रेष्ठ अखबार तैयार करना है, न कि विज्ञापन के लिए सामग्री गढ़ना। परिणामस्वरूप, ऐसे दिग्गज संपादकों को हटाया गया और दिलीप पडगांवकर को नियुक्त किया गया, जो तुलनात्मक रूप से मृदुभाषी थे। अंततः उन्हें भी बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।
आज स्थिति यह है कि दैनिक अखबारों का पारंपरिक पाठक वर्ग लगभग समाप्त हो चुका है और उनकी अधिकांश प्रतियाँ मुफ्त में वितरित की जा रही हैं। सामग्री की गुणवत्ता में भारी गिरावट के कारण इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की विश्वसनीयता भी क्षीण हुई है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा वायु-तरंगों को राज्य का एकाधिकार न मानने के बाद मीडिया से जिम्मेदारी की अपेक्षा की गई थी, किंतु अधिकांश चैनल शोरगुल और सनसनी तक सिमट कर रह गए हैं।
वर्तमान मीडिया कथानकों में इतनी कमजोरी है कि वे एक कार्यक्रम भर भी दर्शकों को बाँधे नहीं रख पाते।
हाल में दिल्ली प्रवास के दौरान कई मित्रों ने मुझसे पूछा कि देश के सामाजिक और राजनीतिक वातावरण की इस दलदल से बाहर निकलने का रास्ता क्या है। मेरा उत्तर स्पष्ट है—कृत्रिम आवरण उतार दीजिए। अल्पकालिक लाभ के लिए सत्य से समझौता करने का खेल अब समाप्त हो चुका है।
यह प्रवृत्ति सत्ताधारी अभिजात वर्ग में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। यदि मीडिया में आवश्यक सुधार नहीं किए गए, तो भारतीय लोकतंत्र और राष्ट्र—दोनों—मीडिया मालिकों की चालाकी और गैर-जिम्मेदार राजनीतिक नेतृत्व की वजह से गंभीर क्षति के शिकार होंगे, चाहे उनकी घोषित राजनीतिक विचारधारा कुछ भी क्यों न हो।
वैश्विक परिदृश्य में भारतीय मीडिया का कोई प्रभावी स्थान नहीं रह गया है। न तो इसकी सामग्री को सम्मान मिलता है और न ही इसकी निष्पक्षता को।
हालिया प्रवास के दौरान कई मीडिया साथियों से संवाद के बाद मैंने पुनः सक्रिय होकर मीडिया सामग्री की वैधता और विश्वसनीयता पुनर्स्थापित करने के प्रयासों से जुड़ने की अपनी हिचक त्याग दी है।
सत्तर और अस्सी के दशक में पत्रकारों की आर्थिक स्थिति में उल्लेखनीय सुधार हुआ। मैं भी इसी दौर का हिस्सा रहा और अमृत बाजार पत्रिका समूह में समाचार संपादक की जिम्मेदारी मिली। इस समूह ने लखनऊ और इलाहाबाद से हिंदी दैनिक अमृत प्रभात की शुरुआत की थी। स्वतंत्र भारत छोड़ना मेरे लिए एक कठिन निर्णय था, क्योंकि वहीं से मैंने अपनी पत्रकारिता यात्रा आरंभ की थी।
स्वतंत्र भारत उस समय उत्तर भारत का एक प्रतिष्ठित प्रकाशन बन चुका था। 15 अगस्त 1947 को इसके युवा संपादक अशोकजी के नेतृत्व में इसका प्रकाशन प्रारंभ हुआ। इससे पहले वे काशी से प्रकाशित आज में बाबूराव विष्णु पराड़कर के संपादन में कार्य कर चुके थे। पराड़करजी के नेतृत्व में आज स्वतंत्रता आंदोलन की सशक्त आवाज बना था।
अशोकजी इलाहाबाद विश्वविद्यालय के टॉपर थे और द्वितीय विश्वयुद्ध से कुछ वर्ष पूर्व आईसीएस की लिखित परीक्षा उत्तीर्ण कर चुके थे, किंतु महात्मा गांधी के प्रभाव से उन्होंने आईसीएस सेवा स्वीकार नहीं की। वे साक्षात्कार में जानबूझकर पारंपरिक भारतीय वेश—कुर्ता-पायजामा—में उपस्थित हुए, जिससे बोर्ड अप्रसन्न हुआ और उनका चयन नहीं हुआ।
पचास के दशक में उन्हें नवगठित सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में एक वरिष्ठ पद के लिए आमंत्रित किया गया।
अशोकजी के बाद पंडित योगीन्द्रपति त्रिपाठी स्वतंत्र भारत के संपादक बने। साठ के दशक के अंत में वे स्ट्रोक से ग्रसित हुए और उपचार से पूर्व ही उनका निधन हो गया। उन्होंने सत्यनिष्ठ ‘क्लासिकल पत्रकारिता’ की सुदृढ़ नींव रखी। उनकी लोकप्रियता किसी भी राजनीतिक नेता से कम नहीं थी। उनकी अंतिम यात्रा का नेतृत्व तत्कालीन मेयर दाऊजी गुप्ता ने किया।
रिक्ति भरने के लिए अशोकजी ने पुनः स्वतंत्र भारत का कार्यभार संभाला। उनके दूसरे कार्यकाल में मैंने कुछ वर्षों तक उनके अधीन कार्य किया, किंतु बाद में पत्रिका समूह में जाकर अमृत प्रभात की स्थापना से जुड़ गया।
मैंने इस समूह में विभिन्न भूमिकाओं में कार्य किया, किंतु संस्थापक तुषारकांति घोष के निधन के बाद उत्तराधिकारियों द्वारा प्रबंधन संभाला नहीं जा सका और अंततः मुझे भी अलग होना पड़ा।
यह कहना अनुचित नहीं होगा कि वर्तमान भाजपा-नीत एनडीए सरकार में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मीडिया के प्रति उपेक्षा एक स्थापित तथ्य बन चुकी है। वे संभवतः पहले ऐसे प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने बारह वर्षों में एक भी औपचारिक प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की। किंतु मीडिया मालिक भी इस गिरावट के लिए समान रूप से जिम्मेदार हैं।
टाइम्स ऑफ इंडिया, द हिंदू और हिंदुस्तान टाइम्स जैसे बड़े समूहों ने कार्यरत पत्रकारों के लिए कॉन्ट्रैक्ट प्रणाली लागू की। मेरे वरिष्ठ सहयोगी गोपाल मिश्रा बताते हैं कि हिंदी के कई प्रमुख दैनिकों—दैनिक जागरण सहित—में नौकरी से पहले त्यागपत्र लिखवाया जाता है। इस संबंध में श्रम मंत्रालय के संयुक्त सचिव को दस्तावेज सौंपे गए, किंतु कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। उलटे, वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट को नए श्रम कानूनों के माध्यम से लगभग निष्प्रभावी बना दिया गया।
इससे यह धारणा मजबूत हुई कि सरकार मीडिया को कमजोर, निर्जीव और मात्र ‘प्रचार माध्यम’ बनाना चाहती है। हालांकि हाल के संकेत बताते हैं कि सरकार भी यह समझने लगी है कि एक विश्वसनीय मीडिया किसी भी शासन व्यवस्था के लिए संपत्ति होती है।
भारत में मीडिया की विश्वसनीयता अब उन पड़ोसी देशों के समान आँकी जाने लगी है, जहाँ सत्ता प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सेना के नियंत्रण में रहती है—जैसे पाकिस्तान और बांग्लादेश के तथाकथित ‘हाइब्रिड शासन’। भारतीय मीडिया भी धीरे-धीरे वहाँ की तरह सत्ताधारी वर्ग का सहयोगी बनता जा रहा है, जिसका प्रतिकूल प्रभाव सामाजिक और धार्मिक सौहार्द पर पड़ रहा है।
यह सर्वविदित तथ्य है कि कनाडा के ब्रैम्पटन स्थित हिंदू मंदिर में मूर्तियाँ नहीं तोड़ी गई थीं। वहाँ केवल भारतीय उच्चायोग के अधिकारी—जो प्रमाणपत्र जारी करने के लिए मंदिर परिसर में उपस्थित थे—खालिस्तानी तत्वों के हमले का शिकार हुए थे। किंतु भारत में मीडिया ने इसे मंदिर पर हमला बताकर प्रस्तुत किया। इसी प्रकार की भ्रामक रिपोर्टिंग ने मुझे समकालीन भारतीय पत्रकारिता के विरुद्ध आवाज उठाने को विवश किया।
फिर भी, अनेक पत्रकार इस गैर-पेशेवर प्रवृत्ति को स्वीकार नहीं करते। मेरा संकल्प उन वरिष्ठों और समकालीन साथियों से प्रेरित है, जिन्होंने पत्रकारिता को सदैव आम जनता के हित में प्रयोग करने का धर्म निभाया।
भारत में निष्पक्षता और नैतिकता सदैव पत्रकारिता की आधारशिला रही है। न्यायपालिका की भाँति यहाँ भी दोनों पक्षों को समान रूप से स्थान देना अनिवार्य माना जाता था। किसी निर्दोष व्यक्ति को गलत प्रस्तुति के माध्यम से अपमानित करना अक्षम्य अपराध समझा जाता था।
चार दशकों की सक्रिय पत्रकारिता में मैंने कभी यह नहीं देखा कि समाचार सामग्री को किसी विशेष एजेंडे के लिए तोड़ा-मरोड़ा जाए।
मैं अपने युवा पत्रकार मित्रों से कहना चाहता हूँ कि पश्चिमी देशों में मीडिया सामाजिक और आर्थिक मुद्दों पर केंद्रित रहता है, जबकि भारत में अंतरराष्ट्रीय समाचारों तक का उपयोग कुछ राजनीतिक नेताओं—विशेषकर सत्ताधारियों—को प्रसन्न करने के लिए किया जाने लगा है।
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