शिवाजी सरकार
नई दिल्ली I रविवार I 10 मई 2026
असम, पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी के हालिया विधानसभा चुनाव परिणामों ने एक बार फिर भारतीय लोकतंत्र की जीवंतता को साबित किया है। लेकिन इन चुनावों ने एक गहरी और चिंाजनक सच्चाई भी उजागर की है — चुनावी प्रक्रिया, राज्यपालों और संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता को लेकर बढ़ता संकट।
असम, बंगाल और पुडुचेरी में भाजपा को बढ़त मिली, केरल में कांग्रेस नीत यूडीएफ को समर्थन मिला, जबकि तमिलनाडु में खंडित जनादेश ने एक बार फिर राज्यपाल की भूमिका को विवादों के केंद्र में ला खड़ा किया। इन परिणामों के पीछे एक बड़ी कहानी छिपी है — उन संस्थाओं पर जनता का घटता विश्वास, जिनसे निष्पक्ष और संवैधानिक बने रहने की अपेक्षा की जाती है।
आज बहस केवल इस बात तक सीमित नहीं रह गई है कि कौन जीता और कौन हारा। सवाल राज्यपालों की कार्यप्रणाली, चुनाव आयोग की भूमिका, न्यायपालिका के रवैये, मतदाता सूचियों में हेरफेर और संस्थाओं के बढ़ते राजनीतिकरण पर उठ रहे हैं। इन चुनावों ने किसी एक दल नहीं, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक ढांचे की कमजोरियों को उजागर किया है।
विशेष रूप से मतदाता सूचियों के “स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन” (एसआईआर) को लेकर भारी विवाद सामने आया। आलोचकों का कहना है कि इस प्रक्रिया ने भारत की वर्षों पुरानी वार्षिक मतदाता सूची संशोधन प्रणाली को बाधित कर दिया और बड़े पैमाने पर नाम काटे जाने तथा तथाकथित “तार्किक विसंगतियों” के जरिए भ्रम की स्थिति पैदा की। इनमें वर्तनी की गलतियां और लिपिकीय त्रुटियां प्रमुख थीं।
लोकतांत्रिक निष्पक्षता की अंतिम संरक्षक मानी जाने वाली न्यायपालिका भी आलोचनाओं से अछूती नहीं रही। मतदाता सूची और एसआईआर से जुड़े मामलों में निर्णायक हस्तक्षेप से उसकी हिचकिचाहट ने अनेक पर्यवेक्षकों को हैरान किया। अदालतों ने चुनाव आयोग की स्वायत्तता पर जोर दिया, लेकिन विश्वविद्यालयों और नियामक संस्थाओं से जुड़े मामलों में वे सक्रिय हस्तक्षेप करती रही हैं। इस चयनात्मक संयम ने स्वाभाविक रूप से पारदर्शिता और निष्पक्षता पर सवाल खड़े किए हैं।
केवल पश्चिम बंगाल में ही लगभग 91 लाख नाम मतदाता सूची से हटाए जाने की खबरें सामने आईं, जिनमें से 27 लाख से अधिक नाम “तार्किक विसंगतियों” के आधार पर हटाए गए बताए गए। आलोचकों का तर्क है कि इनमें से अनेक त्रुटियां मतदाताओं की नहीं, बल्कि गणना प्रक्रिया की थीं। इतने बड़े पैमाने पर मताधिकार से वंचित किए जाने की आशंका ने चुनावी निष्पक्षता को लेकर संदेह गहरा दिया।
स्थिति तब और संवेदनशील हो जाती है जब “घुसपैठिया” जैसे शब्द बिना स्पष्ट कानूनी परिभाषा के इस्तेमाल किए जाते हैं। बंगाल, असम या बिहार — हर जगह मतदाता सूची से बाहर कर दिए जाने का भय राजनीतिक विमर्श और सामाजिक मनोविज्ञान को प्रभावित कर रहा है।
दिलचस्प बात यह है कि चुनाव बाद के विश्लेषण बताते हैं कि एसआईआर का असर मतदान रुझानों पर पड़ सकता है। रिपोर्टों के अनुसार जिन क्षेत्रों में मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम हटाए गए, वहां तृणमूल कांग्रेस को अधिक नुकसान हुआ। ऐसे निर्वाचन क्षेत्रों में भाजपा की बढ़त और तृणमूल की गिरावट राज्य के औसत से कहीं अधिक थी।
और भी महत्वपूर्ण तथ्य यह रहा कि अनेक सीटों पर तीसरे स्थान पर रहने वाले उम्मीदवारों को मिले वोट, विजेता और उपविजेता के बीच के अंतर से अधिक थे। एसआईआर से जुड़ी सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने भी कथित तौर पर इस संभावना की ओर संकेत किया था। इससे यह तर्क और मजबूत होता है कि सीमित प्रशासनिक हेरफेर भी चुनावी नतीजों को निर्णायक रूप से प्रभावित कर सकता है।
हालांकि ममता बनर्जी की चुनौतियों के लिए केवल एसआईआर को जिम्मेदार ठहराना भी उचित नहीं होगा। तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ सत्ता विरोधी माहौल वर्षों से बन रहा था। भ्रष्टाचार के आरोप, अभिषेक बनर्जी की बढ़ती भूमिका और राजनीतिक पुलिसिंग के आरोपों ने मतदाताओं के एक हिस्से को दूर कर दिया। मतदाता सूची विवाद के बिना भी तृणमूल कमजोर दिखाई दे रही थी।
दूसरी ओर भाजपा की आक्रामक चुनावी रणनीति भी जोखिमों से भरी थी। उसकी तीखी राजनीतिक भाषा ने समर्थकों को उत्साहित किया, लेकिन विरोधियों के बीच यह धारणा भी मजबूत हुई कि बंगाल की राजनीति अत्यधिक ध्रुवीकृत हो गई है और व्यक्तिगत रूप से ममता बनर्जी को निशाना बनाया जा रहा है।
तमिलनाडु ने इस संस्थागत संकट का एक और पहलू उजागर किया। टीवीके नेता विजय का एक बड़े राजनीतिक खिलाड़ी के रूप में उभरना कई लोगों के लिए अप्रत्याशित था। लेकिन सरकार गठन के दावे से पहले विधायकों के समर्थन का प्रमाण मांगने पर राज्यपाल की जिद ने एक बार फिर राज्यपालों की अति सक्रियता पर बहस छेड़ दी।
सुप्रीम कोर्ट के एस.आर. बोम्मई फैसले ने स्पष्ट रूप से राज्यपालों की मनमानी शक्तियों को सीमित किया था और यह सिद्धांत स्थापित किया था कि बहुमत का परीक्षण सदन के भीतर होना चाहिए। फिर भी 1996 की 13 दिन की वाजपेयी सरकार से लेकर महाराष्ट्र और अन्य राज्यों के हालिया घटनाक्रम तक, राजभवनों से जुड़े विवाद लगातार जारी हैं।
तमिलनाडु में आलोचकों का कहना है कि राज्यपाल की कार्यप्रणाली संवैधानिक स्पष्टता देने के बजाय राजनीतिक अस्थिरता और खरीद-फरोख्त को बढ़ावा दे सकती है। न डीएमके और न ही एआईएडीएमके स्पष्ट बहुमत की स्थिति में हैं। ऐसे में टीवीके को कांग्रेस का समर्थन सत्ता संतुलन बदल सकता है, लेकिन निर्णय में देरी ने बाहरी राजनीतिक प्रभाव की आशंकाओं को और बढ़ा दिया है।
इसी बीच आरएसएस की भूमिका भी चर्चा में रही। औपचारिक रूप से सांस्कृतिक संगठन होने के बावजूद उसने बंगाल, असम और दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में व्यापक बैठकों, जनसंपर्क अभियानों और जमीनी लामबंदी के जरिए प्रभाव डाला। कुछ पर्यवेक्षकों का आरोप है कि एसआईआर को लेकर जनमत निर्माण में भी उसकी अनौपचारिक भूमिका रही।
इतने व्यापक सामाजिक प्रभाव वाले संगठन पर अतिरिक्त जिम्मेदारी भी आती है। कई लोगों का मानना है कि विवादास्पद संशोधनों का बिना सवाल समर्थन करने के बजाय उसे अधिक सावधानी बरतनी चाहिए थी और व्यापक सहमति बनाने की कोशिश करनी चाहिए थी। आरएसएस लंबे समय से स्वयं को संकीर्ण चुनावी राजनीति से ऊपर बताता रहा है, इसलिए उससे अपेक्षाएं भी अधिक हैं।
भारत का लोकतांत्रिक इतिहास संस्थागत विकृतियों से बार-बार प्रभावित हुआ है — 1959 में अनुच्छेद 356 के तहत केरल की ईएमएस नंबूदरीपाद सरकार की बर्खास्तगी से लेकर आज के राज्यपाल और चुनाव आयोग संबंधी विवादों तक। एस.आर. बोम्मई फैसला एक महत्वपूर्ण सुधार था, लेकिन अब उसकी भावना को व्यापक रूप से लागू करने की आवश्यकता है।
आज भारत को केवल किसी एक दल की चुनावी जीत नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं में जनता के भरोसे की पुनर्स्थापना की जरूरत है। राज्यपालों को संवैधानिक मर्यादा में काम करना होगा, चुनावी संस्थाओं को पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करनी होगी और वैचारिक स्पेक्ट्रम की प्रभावशाली संस्थाओं को दलगत हितों से ऊपर उठना होगा।
भारतीय लोकतंत्र अब भी मजबूत है, लेकिन केवल मजबूती पर्याप्त नहीं। संस्थाओं को केवल जीवित नहीं रहना चाहिए, बल्कि जनता में विश्वास भी पैदा करना चाहिए। तभी देश अधिक स्वच्छ, निष्पक्ष और वास्तविक जनभागीदारी वाले राजनीतिक व्यवस्था की ओर बढ़ सकेगा।
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