भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री द्वारा दिया गया लोकप्रिय नारा — “जय जवान, जय किसान” — आज के बदले हुए राजनीतिक माहौल में अधूरा प्रतीत होता है। यही कारण है कि उनके पुत्र और पूर्व राज्यसभा सांसद सुनील शास्त्री ने इसमें “जय इंसान” जोड़ते हुए इसे “जय जवान, जय किसान, जय इंसान” बना दिया।
उन्होंने यह घोषणा सोमवार (16 फरवरी) को नई दिल्ली स्थित संविधान क्लब ऑफ इंडिया में न्यू थिंकर मीडिया ट्रस्ट द्वारा आयोजित एक पुस्तक-विमोचन समारोह में बड़ी सभा को संबोधित करते हुए की।
शास्त्री ने आशा व्यक्त की कि यह नया नारा 2014 में देश में उभरी नई राजनीतिक व्यवस्था के कारण पैदा हुई पीड़ादायक परिस्थितियों को बदलने के लिए एक सशक्त आंदोलन का रूप ले सकता है।
‘द ट्रिब्यून’ के पूर्व उप-संपादक सैयद नूरुज़्ज़मान की 21 वर्षों के अनुभव पर आधारित पुस्तक — “Opinions, Welcome and Unwelcome: Impressions of an Edit Page Editor” — शीर्ष स्तर पर कार्यरत मीडिया पेशेवरों के सामने आने वाली चुनौतियों पर केंद्रित है। पुस्तक में वर्णित एक पत्रकार की सशक्त यात्रा ने शास्त्री को यह याद दिलाने पर मजबूर किया कि भारतीय राजनीति एक खतरनाक सोच से संक्रमित हो चुकी है, जो देश को भीतर से कमजोर कर रही है। उन्होंने कहा कि “भारतीयों को केवल हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, सिख आदि के रूप में देखने” की सोच से ऊपर उठकर हमें उन्हें सिर्फ भारतीय मानना चाहिए, तभी देश हर दृष्टि से मजबूत होगा।
नारे के पीछे के विचार को स्पष्ट करते हुए शास्त्री ने बताया कि उनके पिता ने किशोरावस्था में उनसे कहा था कि सीमा पर देश की रक्षा करते हुए शहीद होने वाला सैनिक सबसे पहले एक भारतीय है। उसी प्रकार अन्न उत्पादन करने वाले किसान को भी केवल भारतीय के रूप में देखना चाहिए।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि और पूर्व लोकसभा सांसद हरिकेश बहादुर ने पुस्तक में उद्धृत एक उर्दू शेर का उल्लेख किया —
“तुन्दी-ए-बादे मुखालिफ से न घबरा ऐ उक़ाब,
यह तो चलती है तुझे ऊँचा उड़ाने के लिए।”
उन्होंने कहा कि वर्तमान कठिन परिस्थितियाँ हमें बेहतर भारतीय और बेहतर लोकतंत्रवादी बनने के लिए प्रेरित करेंगी।
पुस्तक-विमोचन समारोह की अध्यक्षता कर रहे सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता अतीकुर रहमान ने पुस्तक के विचारों की सराहना की और कहा कि देशहित में सकारात्मक वातावरण बनाकर वर्तमान कठिनाइयों को दूर किया जा सकता है।
नूरुज़्ज़मान ने बताया कि ‘द ट्रिब्यून’ में 34 वर्षों के अपने लंबे कार्यकाल में, जिनमें से 21 वर्ष उन्होंने संपादकीय पृष्ठ पर बिताए, उन्हें विचारात्मक पत्रकारिता को नजदीक से समझने का अवसर मिला। उन्होंने बताया कि शुरुआती दौर में ‘न्यूज़पेग’ नामक साप्ताहिक स्तंभ वरिष्ठ पत्रकारों को संपादकीय लेखन का प्रशिक्षण देने के लिए था।
जयपुर स्थित राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईटी) से हाल ही में सेवानिवृत्त प्रो. मोहम्मद सलीम इंजीनियर ने आज के मीडिया परिदृश्य पर चिंता जताते हुए कहा कि पहले अखबार छपने के बाद बिकते थे, अब वे छपने से पहले ही बिक जाते हैं।
‘रेडियंस व्यूज़वीकली’ के संपादक-इन-चीफ एजाज़ अहमद असलम ने स्वतंत्र विचारों के महत्व पर बल दिया। प्रदीप माथुर ने कहा कि मीडिया की मौजूदा स्थिति के लिए पत्रकार कम और मालिक अधिक जिम्मेदार हैं, जो अधिक लाभ के लिए सत्ता के आगे झुक जाते हैं।
वरिष्ठ पत्रकार और लेखक अश्वनी भटनागर ने ‘द ट्रिब्यून’ में अपने अनुभव साझा किए और कहा कि वहां बिना भय या पक्षपात के विचार रखने का अवसर मिलता था। ‘दैनिक ट्रिब्यून’ के पूर्व संपादक राज कुमार सिंह ने भी बताया कि भिन्न मत होने के बावजूद वरिष्ठ पत्रकार आपस में संवाद करते थे।
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ के पूर्व विशेष संवाददाता सैयद खालिक अहमद ने आशा व्यक्त की कि वर्तमान निराशाजनक माहौल स्थायी नहीं रहेगा। उन्होंने उत्तराखंड के कोटद्वार निवासी दीपक कुमार का उदाहरण दिया, जिन्होंने कट्टरपंथियों का विरोध करते हुए खुद को ‘मोहम्मद दीपक’ कहा।
पुस्तक-विमोचन समारोह में 50 से अधिक लोग उपस्थित रहे। आयोजकों ने दिल्ली जैसे व्यस्त महानगर में इतनी बड़ी संख्या में लोगों की उपस्थिति पर संतोष व्यक्त किया।
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