प्रो शिवाजी सरकार
नई दिल्ली | शनिवार | 29 नवंबर 2025
बिहार विधानसभा चुनाव ने स्पष्ट जनादेश दिया है, लेकिन इस विजय के उत्सव के पीछे एक सख़्त सच्चाई छिपी है—राज्य अब भारी कल्याणकारी वादों के कारण गहरे राजकोषीय दबाव के दौर में प्रवेश कर रहा है। राजनीति अपना काम कर चुकी है; अब इसकी आर्थिक कीमत चुकानी शुरू होगी।
लाभार्थियों तक लक्षित लाभ और नकद हस्तांतरण के तत्काल राजनीतिक फायदे निर्विवाद हैं। ये योजनाएँ तेज़ असर दिखाती हैं, लाखों लोगों तक पहुँचती हैं और चुनावी goodwill पैदा करती हैं। लेकिन इन वादों को निभाने की आर्थिक कीमत अब स्पष्ट रूप से सामने आने लगी है।
एक महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रश्न भी है। विशाल बहुमत होने के बावजूद इसमें कई विसंगतियाँ हैं—विपक्ष के कुछ दल अधिक वोट पाकर भी कम सीटें पाए। जिनके पास सत्ता थी, वे आश्चर्यजनक रूप से लगभग बिना नुकसान के जीतकर लौटे। असदुद्दीन ओवैसी की एमआईएम के छह में से पाँच प्रत्याशी जीतकर आए। एलजेपी-आरवी ने पिछले विधानसभा की एक सीट से उछलकर 19 सीटें जीत लीं—यह किसी चमत्कार से कम नहीं।
अब देखने की बात यह है कि इतना भारी जनादेश बिहार की अर्थव्यवस्था को कैसे प्रभावित या पुनर्गठित करेगा। शुरुआती आकलन बताते हैं कि एनडीए के नए कल्याणकारी वादों से वित्त वर्ष 2025–26 में 40,000 करोड़ रुपये से अधिक का खर्च आएगा—जो बिहार के जीडीपी का लगभग 4 प्रतिशत है, और पाँच साल में करीब 2 लाख करोड़ रुपये। पहले से ही सीमित वित्तीय संसाधनों के साथ काम कर रहे बिहार के लिए यह सिर्फ बजट की चुनौती नहीं, बल्कि विकास के वित्तपोषण के स्वरूप में संरचनात्मक बदलाव का संकेत भी है।
राज्य का सार्वजनिक कर्ज बढ़कर 4.06 लाख करोड़ रुपये पर पहुँच गया है। प्रतिदिन 63 करोड़ रुपये या 2025–26 में 23,014 करोड़ रुपये सिर्फ ब्याज चुकाने में जाएंगे। राज्य 32,918 करोड़ रुपये की नई उधारी लेने की योजना बना रहा है, जिससे कर्ज-से-जीडीपी अनुपात बढ़कर लगभग 40 प्रतिशत हो जाएगा—जो देश में सबसे अधिक में से एक है। बिहार की अधिकांश पूंजीगत प्राप्तियाँ अब कर्ज से ही आती हैं।
यह स्थिति तब है जब राज्य ने पिछले एक दशक में लगभग 11 प्रतिशत की मजबूत नाममात्र जीडीपी वृद्धि दर्ज की है। साथ ही माइक्रोफाइनेंस ऋण भी बढ़ा है, और मार्च 2025 तक बकाया ऋण 57,712 करोड़ रुपये पहुंच गया है।
उभरता राजकोषीय लोकलुभावनवाद
बिहार अकेला राज्य नहीं है जिसने व्यापक कल्याणकारी वादों को अपनाया है। पूरे देश में चुनाव अभियान का केंद्र बिंदु कल्याणकारी खर्च बन चुका है। लेकिन बिहार की परिस्थिति इसलिए अलग है क्योंकि इसकी आर्थिक आधारशिला कमज़ोर है—कम प्रति व्यक्ति आय, सीमित औद्योगीकरण, केंद्र पर भारी निर्भरता और प्रवासी श्रमबल पर आधारित अर्थव्यवस्था। ऐसे परिदृश्य में कल्याण का राजनीतिक उपयोग एक क्षतिपूरक तंत्र बन जाता है।
चुनाव ने इसे स्पष्ट किया। महिलाओं के लिए नकद सहायता, मुफ्त बिजली यूनिट, रोजगार भत्ता और विस्तारित सामाजिक सुरक्षा योजनाओं ने मतदाता भागीदारी को बढ़ाया। बड़ी आबादी के लिए ये लाभ विलासिता नहीं—अनुपस्थित आय, अस्थिर रोज़गार और विफल सार्वजनिक सेवाओं की जगह भरने वाले साधन हैं।
ऐसी कल्याणकारी नीतियों को वापस लेना मुश्किल, राजनीतिक रूप से जोखिमभरा और आर्थिक रूप से महंगा होता है।
दबाव में बजट
बिहार की राजकोषीय संरचना सामान्य परिस्थितियों में भी कम लचीली रहती है। राजस्व समर्थन घट रहा है। पूंजीगत व्यय—सड़क, बिजली, सिंचाई, आधारभूत ढाँचे—मुख्यतः केंद्र के आवंटन या बाहरी उधारी पर निर्भर होते हैं। और अधिक पूंजीगत व्यय के साथ अधिक “अनौपचारिक” व अदृश्य व्यय भी बढ़ते हैं।
पिछले एक दशक में बिहार को एनडीए सरकार के दौरान केंद्र से कहीं अधिक वित्तीय सहायता मिली है। 2004–2014 में जहाँ यह लगभग 2.8 लाख करोड़ रुपये थी, वहीं 2014–2024 में यह बढ़कर लगभग 9.23 लाख करोड़ रुपये हो गई—तीन गुना वृद्धि।
अब 40,000 करोड़ रुपये से अधिक के नए कल्याणकारी commitments ने राज्य की राजकोषीय लचीलापन को बेहद सीमित कर दिया है। इन योजनाओं को वित्तपोषित करने के लिए बिहार को तीन में से एक कदम उठाना होगा—
1. और अधिक उधार लेना,
2. पूंजीगत व्यय में कटौती करना,
3. केंद्र पर निर्भरता बढ़ाना।
अधिक उधार से ब्याज बोझ बढ़ता है, कम पूंजीगत व्यय से विकास और रोजगार घटते हैं, जबकि केंद्र पर निर्भरता बढ़ने से राज्य की नीतिगत स्वायत्तता कम होती है।
फ्रीबी जाल: राजनीतिक खपत
अर्थशास्त्री कल्याण के दो प्रकार अलग करते हैं—क्षमता निर्माण करने वाला कल्याण और राजनीतिक निष्ठा खरीदने वाला कल्याण। पहला, स्कूल भोजन, स्वास्थ्य, शिक्षा और कौशल निर्माण जैसी योजनाएँ हैं। दूसरा, बिना शर्त नकद हस्तांतरण, उपभोग सब्सिडी या चुनाव-समय giveaways।
बिहार का नया कल्याण पैकेज क्षमता निर्माण के कुछ संकेत देता है, लेकिन यह मुख्यतः राजनीतिक उपभोग की ओर झुका है। जब कल्याण स्थायी हो जाए और उत्पादकता न बढ़े, तो राज्य फ्रीबी जाल में फँस जाता है—जहाँ राजकोषीय प्रतिबद्धताएँ बढ़ती हैं पर आर्थिक उत्पादन नहीं।
इससे श्रम भागीदारी घटती है, निजी निवेश रुकता है और दीर्घकालिक राजकोषीय घाटे बढ़ते हैं।
अवसर लागत
बिहार की समस्या हमेशा संरचनात्मक रही है—राज्य के भीतर रोजगार कैसे पैदा हों ताकि लोग पलायन न करें। एनडीए का एक करोड़ नौकरियों का वादा महत्वाकांक्षी है, लेकिन इसके लिए भूमि, बिजली, नियमन, कृषि–प्रसंस्करण और साझेदारी जैसे गहरे सुधार ज़रूरी हैं।
हर वह रुपया जो स्थायी कल्याण पर खर्च होता है, वह इन सुधारों से हट जाता है।
बड़े कल्याणकारी कार्यक्रम प्रगति का भ्रम पैदा करते हैं और दीर्घकालिक सुधारों की अनुपस्थिति को ढक देते हैं।
व्यापक असर: भारत पर प्रभाव
बिहार की राजकोषीय समस्या सिर्फ राज्य की नहीं, देश की व्यापक अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकती है। देश के सबसे जनसंख्या-बहुल राज्य की आर्थिक दिशा प्रवासन, श्रम बाज़ार, उपभोग और कल्याण पैटर्न को प्रभावित करती है।
यदि बिहार राजकोषीय दबाव के कारण धीमा पड़ता है, तो तीन राष्ट्रीय प्रभाव संभव हैं—
* केंद्र पर वित्तीय बोझ बढ़ना,
* युवा आबादी का अधूरा उपयोग,
* और राज्यों में प्रतिस्पर्धी लोकलुभावनवाद बढ़ना।
बिहार को क्या करना चाहिए
बिहार को कल्याण का विवेकीकरण, राजस्व बढ़ाना और विकास-केन्द्रित पूंजी निवेश को प्राथमिकता देनी होगी, ताकि वादों को स्थायी विकास में बदला जा सके।
वरना, राज्य अपने ही वादों के बोझ तले दब सकता है।
बिहार चुनाव ने नया राजनीतिक परिदृश्य बनाया है, लेकिन इसके साथ-साथ राज्य के भविष्य पर भारी आर्थिक बोझ भी डाल दिया है। कल्याण-चालित राजनीति वोट ला सकती है, पर विकास नहीं ला पाती—और बिहार को विकास की ही सबसे अधिक आवश्यकता है।
अगले पाँच वर्ष तय करेंगे कि बिहार इस फ्रीबी जाल से बाहर निकलता है या इसमें और गहराई तक धँस जाता है। राज्य की राजकोषीय दिशा अब सिर्फ स्थानीय मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आर्थिक चर है, जिसके प्रभाव पटना से कहीं आगे तक जाएंगे।
(सीनियर पत्रकार और मीडिया कार्यकर्ता, प्रो. शिवाजी सरकार वित्तीय रिपोर्टिंग में विशेषज्ञ हैं।)
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