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मीडिया मैप न्यूज़ नेटवर्क

नई दिल्ली | शनिवार | 25 अक्टूबर 2025  

बिहार की राजनीति इन दिनों उत्सव और अनिश्चितता, दोनों का संगम बनी हुई है। दीपावली की रौशनी के बीच जब सारा राज्य उत्सव में डूबा है, तब सियासत के गलियारे अंदर ही अंदर उबल रहे हैं। जनता के बीच यह सवाल लगातार गूंज रहा है—क्या नीतीश कुमार एक बार फिर करवट लेंगे? क्या भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और जनता दल (यूनाइटेड) का रिश्ता अंतिम मोड़ पर है?

मुद्दाविहीन एनडीए और बढ़ता भ्रम

राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के पास इस चुनाव में कोई ठोस मुद्दा नहीं दिख रहा। भाजपा नेताओं का पूरा जोर ‘घुसपैठिया’ जैसे भावनात्मक विषयों पर है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर मतदाता इस बहस से ऊब चुके हैं। बेरोजगारी, शिक्षा, महंगाई और प्रवास जैसे बुनियादी सवालों पर एनडीए की चुप्पी जनता को खटक रही है।

बीजेपी के भीतर नीतीश कुमार को लेकर असमंजस बना हुआ है। अमित शाह ने यह स्पष्ट कर दिया है कि गठबंधन ने अब तक नीतीश को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं किया है। इससे संकेत साफ हैं—भाजपा नीतीश पर कैंची चला सकती है। लेकिन नीतीश कुमार का राजनीतिक इतिहास बताता है कि वे भी समय आने पर बीजेपी के पर कतरने में देर नहीं करेंगे। यानी, बिहार की राजनीति का लावा फिलहाल भीतर ही भीतर धधक रहा है।

लेख एक नज़र में
बिहार की राजनीति इस समय उत्सव और उथल-पुथल के बीच झूल रही है। दीपावली की रौनक के बीच राजनीतिक गलियारों में यह सवाल गूंज रहा है—क्या नीतीश कुमार फिर पलटी मारेंगे? एनडीए में मुद्दों की कमी और अंदरूनी असंतोष बढ़ता दिख रहा है।
भाजपा ‘घुसपैठिया’ जैसे भावनात्मक मुद्दों पर टिकी है, जबकि जनता बेरोजगारी, शिक्षा और महंगाई जैसे वास्तविक सवालों के जवाब चाहती है। नीतीश कुमार की चुप्पी और राहुल-तेजस्वी से संभावित नजदीकी सियासी अनिश्चितता बढ़ा रही है। उधर महागठबंधन एकजुट नजर आ रहा है और तेजस्वी यादव युवाओं में लोकप्रिय हो रहे हैं।
भाजपा के पास मुख्यमंत्री का चेहरा नहीं है, जबकि “डबल इंजन सरकार” पर सवाल उठ रहे हैं। इस चुनाव में जनता जाति या धर्म नहीं, बल्कि रोजगार, विकास और आत्मसम्मान के आधार पर फैसला करने को तैयार दिख रही है — जिससे बदलाव की हवा स्पष्ट झलक रही है।

नीतीश का रहस्य: राहुल और लालू से नजदीकी?

राजनीतिक हलकों में इन दिनों यह चर्चा ज़ोरों पर है कि क्या नीतीश कुमार राहुल गांधी और लालू-तेजस्वी यादव से संपर्क में हैं? यह सवाल कल्पना नहीं, बल्कि उस राजनैतिक परंपरा की याद दिलाता है जहाँ "कोई स्थायी मित्र या दुश्मन नहीं" होता। नीतीश का अतीत बताता है कि उन्होंने हमेशा अपनी राजनीतिक दिशा समय के हिसाब से तय की है। इस बार भी उनके ‘मौन’ में कुछ न कुछ संकेत छिपे हैं।

दीपावली की राजनीति और मीडिया का धुआँ

इन दिनों ‘दीपावली पॉलिटिक्स’ का प्रदूषण भी बिहार की हवा में घुला हुआ है। मीडिया का बड़ा हिस्सा महागठबंधन में मतभेद की खबरें उछाल रहा है—जैसे कांग्रेस और राजद के बीच टिकट बंटवारे को लेकर भारी खींचतान है। लेकिन ज़मीनी हकीकत उतनी गंभीर नहीं है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि “जहाँ धुआँ है, वहाँ आग जरूरी नहीं होती”—अक्सर यह धुआँ कुछ मीडिया घरानों द्वारा फैलाया गया भ्रम भी होता है।

वास्तव में, कांग्रेस और राजद के बीच सीटों पर मामूली मतभेद जरूर रहे हैं, लेकिन दोनों दलों के शीर्ष नेतृत्व ने स्पष्ट किया है कि अंततः लड़ाई ‘इंडिया गठबंधन’ के साझा उम्मीदवारों के साथ ही लड़ी जाएगी। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम ने कहा है कि “हमारा नेता तेजस्वी यादव हैं, और जो निर्णय वे लेंगे, वही अंतिम होगा।” यह बयान गठबंधन की एकता का सबसे ठोस संदेश है।

एनडीए में घमासान और छिपा असंतोष

उधर, एनडीए में बगावत थमने का नाम नहीं ले रही। भाजपा और उसके सहयोगी दलों में टिकट वितरण को लेकर असंतोष फैला है। चिराग पासवान को 29 सीटें देने के फैसले ने कई पुराने चेहरों को नाराज़ कर दिया है। जेडीयू के भीतर भी दबाव की राजनीति और डील की संस्कृति को लेकर असंतोष पनप रहा है।

बीजेपी का सबसे बड़ा संकट यह है कि उसके पास मुख्यमंत्री पद का कोई चेहरा नहीं है। पहले कहा जाता था कि "लोकसभा में मोदी का चेहरा है", लेकिन बिहार विधानसभा चुनाव में ‘चेहरा कौन?’ यह सवाल बीजेपी से पीछा नहीं छोड़ रहा। महागठबंधन के पास जहाँ तेजस्वी यादव एक लोकप्रिय, युवा और साफ चेहरा हैं, वहीं एनडीए अब तक अपना उम्मीदवार घोषित नहीं कर पाया है।

यह असमंजस बिहार के मतदाताओं के बीच भ्रम फैला रहा है। जनमत सर्वेक्षणों में भी देखा जा रहा है कि तेजस्वी यादव की स्वीकार्यता पिछले दो वर्षों में लगातार बढ़ी है, जबकि एनडीए के नेताओं की लोकप्रियता में गिरावट आई है।

एनडीए की डबल इंजन सरकार पर सवाल

अमित शाह और बीजेपी नेता बार-बार “डबल इंजन सरकार” का दावा करते हैं। लेकिन 20 साल की सत्ता के बाद भी बिहार आज भी औद्योगिक रूप से पिछड़ा हुआ है, बेरोजगारी चरम पर है, और बाढ़ की समस्या जस की तस बनी हुई है। अब भाजपा कह रही है कि अगले दस साल में बिहार को “बाढ़ मुक्त और औद्योगिक राज्य” बना देंगे। सवाल यह है—जो काम 20 साल में नहीं हुआ, वह अब कैसे होगा?

बिहार के लोग यह भी पूछ रहे हैं कि जब पिछले दो दशकों में राज्य में उद्योग, शिक्षा या रोज़गार के क्षेत्र में कोई ठोस सुधार नहीं हुआ, तो "विकसित बिहार 2035" का सपना कितना यथार्थवादी है? दरअसल, यह स्वीकारोक्ति है कि एनडीए के 20 वर्षों का शासन जनता की आकांक्षाओं को पूरा नहीं कर पाया।

“जंगलराज” का डर बनाम “बुलडोज़र राज” का खतरा

एनडीए नेताओं ने एक बार फिर ‘जंगलराज’ का डर दिखाना शुरू कर दिया है। अमित शाह कहते हैं कि “हम जंगलराज को दोबारा नहीं आने देंगे।” लेकिन यह बयान अपने आप में विडंबनापूर्ण है, क्योंकि जिस ‘जंगलराज’ को वे 20 साल पहले खत्म बता चुके थे, वह अब अचानक कैसे लौट सकता है?

महागठबंधन ने इसका करारा जवाब दिया है। राजद नेताओं का कहना है कि “आज का बिहार कानून-व्यवस्था में कहीं बेहतर है, लेकिन अगर खतरा है, तो वह ‘बुलडोज़र राज’ का है।” उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की रैलियों के बाद यह बयान और अर्थपूर्ण हो गया है। तेजस्वी यादव का कहना है—“बिहार में बुलडोज़र राज की कोई जगह नहीं है। यहाँ न्याय और रोजगार की राजनीति चलेगी, डर की नहीं।”

घुसपैठिया बनाम बिहारी-अब बाहरी की बहस

भाजपा का चुनावी एजेंडा एक बार फिर “घुसपैठियों” की बहस पर टिका है। लेकिन महागठबंधन ने इस पर पलटवार करते हुए नारा दिया है—“हम बिहारी हैं, घुसपैठिये नहीं।” अब चुनावी विमर्श में नया द्वंद उभर आया है—‘बिहारी बनाम बाहरी’। तेजस्वी यादव बार-बार यह कहते सुने जा रहे हैं कि “बिहार का मुख्यमंत्री बिहारी होगा, किसी बाहरी के इशारे पर चलने वाला नहीं।”

यह संदेश आम मतदाताओं के बीच गूंज रहा है और भाजपा के ‘घुसपैठिया’ नैरेटिव को कमजोर करता दिखाई दे रहा है।

पीके और चिराग का नया समीकरण

राजनीति के मैदान में प्रशांत किशोर (पीके) और चिराग पासवान दोनों की भूमिका को लेकर भी चर्चा गर्म है। पिछली बार चिराग पासवान ने जेडीयू उम्मीदवारों को नुकसान पहुँचाकर एनडीए को भीतर से कमजोर किया था। अब वे एनडीए में लौट आए हैं—लेकिन 29 सीटें मिलने के बावजूद असंतोष शांत नहीं हुआ।

दूसरी ओर, प्रशांत किशोर की ‘जन सुराज’ यात्रा ने बीजेपी को असमंजस में डाल दिया है। बीजेपी नेताओं के मुताबिक असली मुकाबला अब “महागठबंधन से नहीं, बल्कि पीके से” है। यह बयान खुद बताता है कि एनडीए की रणनीति कितनी बिखरी हुई है।

अमित शाह की दुविधा और बिहार की नई राजनीति

अमित शाह की चुनावी सभाओं में अब एक अजीब-सी झिझक दिखाई देती है। वे कहते हैं कि "हम हिंदू-मुसलमान की राजनीति नहीं करते," लेकिन हर भाषण में घुसपैठिया, सीमा सुरक्षा, और धर्मांतरण जैसे शब्द गूंजते हैं। यह वही दोहरापन है जो जनता को खटक रहा है।

अब जनता पूछ रही है—“अगर आप हिंदू-मुसलमान की राजनीति नहीं करते, तो करते क्या हैं?”

दूसरी ओर, महागठबंधन ने इस चुनाव को "जनता बनाम सत्ता" का रूप देने की कोशिश की है। बेरोजगारी, परीक्षा में घोटाले, शिक्षक भर्ती, और महंगाई जैसे मसलों पर युवा वर्ग का झुकाव तेजस्वी यादव की ओर बढ़ता दिख रहा है।

बिहार की जनता का मूड: बदलाव की चाह

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बिहार की जनता इस बार भावनात्मक नारों से ज़्यादा ठोस काम का हिसाब मांग रही है। ‘वोट चोर गद्दी छोड़’ और ‘रोजगार दो’ जैसे नारे सड़कों पर गूंज रहे हैं। गाँवों में किसानों के बीच यह चर्चा है कि 20 साल की सत्ता के बाद भी अगर एनडीए को “विकास का रोडमैप” दिखाना पड़ रहा है, तो यह उसके असफल शासन की गवाही है।

तेजस्वी यादव ने इस चुनाव को युवाओं और बेरोजगारों की उम्मीदों से जोड़ने की कोशिश की है। उनके “10 लाख नौकरियों” के वादे को भाजपा ने भले ही अव्यावहारिक कहा था, लेकिन जनता के एक बड़े हिस्से को यह भरोसा है कि कम से कम कोई तो रोजगार की बात कर रहा है।

मीडिया और ट्रोल राजनीति

एनडीए के प्रचारतंत्र ने सोशल मीडिया पर भारी निवेश किया है। ट्रोल सेनाओं को सक्रिय कर “महागठबंधन में दरार” का नैरेटिव गढ़ा जा रहा है। सोशल मीडिया पर ‘रेट बढ़ने’ की चर्चा मजाक नहीं, हकीकत है—कई डिजिटल प्रचारक ‘डबल पेमेंट’ पर गठबंधन के खिलाफ टिप्पणियाँ कर रहे हैं।

लेकिन डिजिटल दुनिया से बाहर ज़मीन पर माहौल उतना एकतरफा नहीं है। ग्रामीण इलाकों में मतदाता अब अपने मुद्दों पर चर्चा करते दिखते हैं, न कि धर्म और जाति की बहस पर।

बिहार बनाम दिल्ली: आत्मसम्मान की लड़ाई

यह चुनाव अब धीरे-धीरे ‘बिहार बनाम दिल्ली’ का रूप लेता जा रहा है। महागठबंधन इसे "बिहारी आत्मसम्मान की लड़ाई" बता रहा है। यह भावनात्मक टोन खासतौर पर युवा और प्रवासी वर्ग को आकर्षित कर रहा है।

राजद नेताओं का कहना है कि “अब बिहार किसी बाहरी के इशारे पर नहीं चलेगा। मुख्यमंत्री वही होगा, जिसे बिहार का दिल चुनेगा।”

निष्कर्ष: सत्ता का समीकरण और जनमत का संकेत

सियासत के इस शोर में एक बात स्पष्ट दिखती है—एनडीए के भीतर गहरी बेचैनी है।

नीतीश कुमार को लेकर बीजेपी की असमंजस, चिराग पासवान और पीके की समानांतर राजनीति, और 20 वर्षों के शासन की थकान—ये सब मिलकर बिहार में सत्ता विरोधी माहौल तैयार कर रहे हैं।

वहीं, महागठबंधन एक स्पष्ट चेहरा, एक साझा नैरेटिव और जनता से जुड़ी भाषा के साथ मैदान में है।

बिहार की राजनीति हमेशा अप्रत्याशित मोड़ लेती रही है। लेकिन इस बार के चुनाव में रुझान साफ है—जनता विकास, रोजगार और आत्मसम्मान के मुद्दे पर निर्णय लेगी, न कि जाति या धर्म के ध्रुवीकरण पर।

एनडीए का भविष्य इस पर निर्भर करेगा कि वह अपने भीतर के बिखराव को कितनी जल्दी संभाल पाती है।

और महागठबंधन की संभावनाएँ इस पर कि वह अपने वादों को जनता के भरोसे में कैसे बदल पाता है।

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