क्या बिहार चुनाव आयोग को बदल रहा है — या चुनाव आयोग खुद को बदल रहा है? यह सवाल 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव के बीच तेजी से उभर रहा है। आज का चुनाव आयोग पहले से कहीं अधिक संयमित, सहिष्णु और राजनीतिक मामलों में कम टकराव वाला दिख रहा है — वह क्षेत्र, जिसमें उसे मूलतः नहीं पड़ना चाहिए था।
यह परिवर्तन अचानक नहीं आया है। वर्षों तक आयोग एक आक्रामक संस्था के रूप में देखा गया। इसके प्रमुख — राजीव कुमार हों या ज्ञानेश कुमार — अक्सर ऐसे तेवर में बोलते दिखे जो राजनेताओं से मेल खाते थे। कभी विपक्ष को नकारते, तो कभी नेता प्रतिपक्ष (LoP) को चुनौती देते कि वे अपने आरोपों को शपथपत्र के जरिए साबित करें। फिर भी, अपने अपेक्षाकृत नरम रुख के बावजूद, मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार मतदान दिवस के आंकड़ों पर दृढ़ बने हुए हैं। उन्होंने मतदाता उपस्थिति के आंकड़ों में अस्वाभाविकता के आरोपों को खारिज किया, लेकिन यह सुनिश्चित करने की बात मानी कि फॉर्म 17 — जो मतदान अधिकारी द्वारा हस्ताक्षरित होता है और मतपेटियों के साथ सीलबंद रहता है — जाँच के लिए उपलब्ध कराया जाएगा।
यह बदलाव देश के व्यापक राजनीतिक वातावरण का प्रतिबिंब है। स्वयं संसद में टकराव की प्रवृत्ति बढ़ी है — 2024 में एक ही दिन में 146 सांसदों का निलंबन और एक कांग्रेस नेता की सदस्यता रद्द होना इसका उदाहरण है। वही माहौल शायद चुनाव आयोग की भाषा और रुख पर भी असर डाल गया। जब नेता प्रतिपक्ष ने 2024 के आम चुनाव में मतगणना में हेराफेरी के आरोप लगाए, तो मुख्य चुनाव आयुक्त का जवाब — शपथपत्र मांगना और आगे टिप्पणी से इनकार करना — उस पद के प्रति असम्मानजनक लगा, जिसे मंत्रिमंडल के दर्जे का अधिकार प्राप्त है।
लेकिन नेता प्रतिपक्ष पीछे नहीं हटे। उन्होंने 2024 में पूरे देश में 4,000 किलोमीटर की पदयात्रा की, और फिर बिहार में 1,300 किलोमीटर लंबी दूसरी यात्रा शुरू की। उनका उद्देश्य था — विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची की सफाई में हुई कथित गड़बड़ियों को ठीक कराना। उनके आंदोलन और जनसभाओं के दबाव में आयोग ने 65 लाख हटाए गए नामों में से अधिकांश बहाल कर दिए, हालांकि लगभग 3.36 लाख नाम अब भी सूची से बाहर हैं।
SIR विवाद ने कई गंभीर सवाल उठाए हैं। आयोग ने 2024 के अक्टूबर-दिसंबर के बीच नियमित वार्षिक पुनरीक्षण क्यों नहीं किया? फिर अचानक जून 2025 में — मतदान से चार महीने पहले — “घुसपैठियों” को हटाने के नाम पर विशेष अभियान क्यों चलाया गया? और आखिर ऐसे कितने “घुसपैठिए” पाए गए? 6 अक्टूबर को बिहार चुनाव तिथियों की घोषणा करते समय प्रेस कॉन्फ्रेंस में मुख्य चुनाव आयुक्त ने इन सवालों के सीधे उत्तर देने से परहेज़ किया और घुसपैठिए शब्द के इस्तेमाल पर भी सफाई नहीं दी।
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप से बचते हुए भी प्रक्रिया पर सवाल उठाए — खासकर मतदाता सत्यापन में आधार कार्ड के प्रयोग को लेकर। स्वयं मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा था कि “आधार न तो पहचान पत्र है, न निवास का प्रमाण, न ही नागरिकता का।” यदि ऐसा है, तो फिर सरकारी एजेंसियां — बैंकों से लेकर विभागों तक — इसे सर्वमान्य दस्तावेज़ की तरह क्यों मानती हैं? और यदि आयोग का यह मत सही था, तो बाद में उसने बिहार SIR के लिए आधार को पहचान प्रमाण के रूप में मानने की सुप्रीम कोर्ट की सलाह क्यों स्वीकार कर ली?
यह विरोधाभास संस्थागत असमंजस की ओर इशारा करता है। शायद ही किसी संस्था ने इतनी जल्दी इतने परस्पर विरोधी रुख दिखाए हों। 6 जुलाई 2025 की प्रेस कॉन्फ्रेंस में आयोग ने बताया था कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद हटाए गए मतदाताओं की संख्या घटाकर 3.36 लाख कर दी गई। लेकिन 8 अक्टूबर को उसी आयोग ने अदालत में कहा कि आधार को पहचान प्रमाण के रूप में स्वीकार किया गया है — जो पहले दिए गए बयान का उलट था।
फिलहाल, आयोग का रवैया तो बदला है। 6 अक्टूबर की प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक संयम झलक रहा था जो हाल के वर्षों में नहीं देखा गया था। राहुल गांधी के “वोट चोरी” के आरोपों और आयोग की विश्वसनीयता पर सवालों पर ज्ञानेश कुमार ने शांत स्वर में कहा, “राजनीतिक प्रक्रिया को सवाल उठाने का अधिकार है।” यह संस्थागत गरिमा का दुर्लभ क्षण था — संभवतः बिहार में विपक्ष की रैलियों से उपजे जनदबाव का परिणाम।
शायद आयोग ने समझ लिया है कि राजनीतिक ताकतों से टकराव उसकी विश्वसनीयता को कमजोर करता है। जनता का मूड — जैसा कि बिहार की रैलियों में दिखा — आयोग को अपनी कार्यशैली पर पुनर्विचार के लिए बाध्य कर सकता है। आखिरकार, संवैधानिक पदाधिकारी से अपेक्षा की जाती है कि वह निष्पक्ष रहे और सभी राजनीतिक पक्षों के प्रति सम्मान बनाए रखे।
फिर भी, संवैधानिक स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि संस्था सीमाओं से परे हो जाए। सुप्रीम कोर्ट बार-बार कह चुका है कि आयोग से लेकर पुरातत्व विभाग तक — स्वायत्तता को जवाबदेही के साथ संतुलित रहना चाहिए। हाल ही में चुनाव आयुक्तों को हटाने पर राष्ट्रपति की अनुमति अनिवार्य करने वाला संशोधन भी लोकतांत्रिक परंपरा के अनुकूल नहीं माना जा रहा।
अक्सर जनमत ही संस्थागत विचलन को सुधारता है। किसी संवैधानिक निकाय की चुप्पी को उसकी सहमति नहीं समझा जा सकता, न ही वह जनता के भरोसे की अनदेखी कर सकती है। चुनाव आयोग का यह नया संयम शायद इस स्वीकारोक्ति का प्रतीक है कि लोकतंत्र में अंतिम संप्रभु जनता ही है।
फिर भी कुछ सवाल बाकी हैं। क्या आयोग को “रेवड़ी संस्कृति” — यानी चुनाव से ठीक पहले सरकारी नकद योजनाओं और मुफ्त सौगातों — पर चुप रहना चाहिए? क्या उसे यह सुनिश्चित नहीं करना चाहिए कि ऐसी घोषणाएँ चुनावी निष्पक्षता को प्रभावित न करें?
उधर, बिहार की ज़मीनी हकीकतें भी कम गंभीर नहीं हैं। स्टेट वाइब सर्वे (सितंबर 2025) के अनुसार, बेरोज़गारी और पलायन मतदाताओं की सबसे बड़ी चिंता हैं — 38.4 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने इसे अपनी प्राथमिक समस्या बताया। शिक्षा और स्वास्थ्य, खासकर महिलाओं के बीच, इसके बाद आते हैं। उल्लेखनीय है कि लगभग एक-तिहाई उत्तरदाताओं (33.4 प्रतिशत) ने “वोट चोरी” की आशंका को भी बड़ा मुद्दा बताया — जिससे स्पष्ट है कि विपक्ष का SIR विरोध अभियान जनभावना से जुड़ गया है।
इस प्रकार बिहार एक चौराहे पर खड़ा है। बेरोज़गारी, पलायन और गरीबी से जूझता यह राज्य अब पारदर्शी चुनाव और संस्थागत जवाबदेही पर राष्ट्रीय बहस का केंद्र बन सकता है। आयोग का हालिया रूपांतरण — टकराव से संवाद की ओर, कठोरता से संयम की ओर — शायद उस लोकतंत्र की परिपक्वता का संकेत है जो नागरिक दबाव से संचालित होता है, न कि राजनीतिक निर्देशों से।
अगर बिहार की चुनावी उथल-पुथल से आयोग अधिक पारदर्शी, निष्पक्ष और आत्मसुधार की ओर बढ़ता है, तो यह सिर्फ एक चुनाव नहीं बदलेगा — यह भारत में चुनावी आचरण की परिभाषा ही बदल सकता है। शायद सुधार की बयार बिहार से ही चल पड़ी है। देश को अपना परिवर्तन यहीं से शुरू करना पड़ सकता है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और मीडिया विश्लेषक हैं, वित्तीय रिपोर्टिंग में विशेषज्ञता रखते हैं।)
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