उत्तराखंड के शायद सबसे बड़े क्रांतिकारी नेता दिवाकर भट्ट जिन्हें आंदोलन के समय फील्ड मार्शल कहा जाता था आखिर अपनी शारीरिक कमजोरी से हार गये।
बीमारी से एक लम्बी लड़ाई के बाद दो दिन पहले उन्होंने अन्तिम सांस ली और समय के दस्तावेज पर अपने मजबूत हस्ताक्षर छोड़ कर २५ वर्षीय राज्य को मझधार में छोड़ कर चले गए।
मुझे आज भी दिवाकर भट्ट से अपनी पहली मुलाकात याद है जो उत्तराखंड क्रांति दल के संस्थापक नेताओं में से एक शिवानंद चमोली के घर पर हुई थी।
मैं हिन्दुस्तान टाइम्स का देहरादून में पहला संवाददाता था और तब राज्य नहीं बना था।
इस पार्टी के नेताओं को राष्ट्रीय अखबारों से शिक़ायत थी कि वो उत्तराखंड की खबरें नहीं छापते।
मैं उनके साथ लगभग एक घंटा बैठा और उनकी बातों में पहाड़ के लोगों का सदियों का दर्द महसूस किया जिसे मैंने अपने देहरादून प्रवास के दौरान अपनी कवरेज में ईमानदारी से निभाने का प्रयास किया।
उस मुलाकात के बाद के बाद मैं उनसे दोबारा तब मिला जब उनके पहले चुनाव में हारने की ख़बर टीवी पर देख कर उनकी पत्नी ने आत्महत्या कर ली थी।
वो साक्षात्कार मुझे कभी नहीं भूलेगा।
जब मैंने उनसे आगे की जिंदगी के बारे में पूछा तो उन्होने कहा "सबसे पहले मैंअपने बेटे से संवाद स्थापित करूंगा। अभी तक मैं आंदोलन में व्यस्त रहता था और बच्चों से मिलने का समय ही नहीं मिलता था।सब मेरी पत्नी संभालती थी"!
इससे ज्यादा सच्चा और ईमानदार संवाद मैंने आज तक नहीं सुना।
ये हमारी चुनाव प्रणाली की भारी कमी है कि उक्रांद को अपने काम के बल पर राज्य बनने के बाद उसका कभी श्रेय नहीं मिला और बड़ी पार्टियां उनके नेताओं को निगल गयीं।
पहले उक्रांद वाले राष्ट्रीय चुनाव लड़ने के खिलाफ थे क्योंकि उनके पास संसाधनों की कभी थी।
पता नहीं यह रणनीति ठीक थी या नहीं पर कालान्तर में देश में लगभग सभी क्षेत्रीय दलों को राष्ट्रीय दलों द्वारा निगलने के बाद (बिहार इसका ताज़ा उदाहरण है) ऐसा लगता है क्षेत्रीय दलों को अपनी पहचान बनाये रखने के लिए संसद में जरूर होना चाहिए।
जो भी हो ऐसे योद्धाओं को हमारा भावपूर्ण नमन।
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