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सैयद खालिक अहमद

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नई दिल्ली | शनिवार | 22 नवम्बर 2025

भारत में जाति व्यवस्था का ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और समकालीन संदर्भ: दलित समुदाय के संदर्भ में” विषय पर आयोजित एक सेमिनार में समाजशास्त्रियों और विद्वानों ने इस बात पर चर्चा की कि किस प्रकार जाति आज भी भारतीय समाज को प्रभावित करती है। विशेषज्ञों का मानना था कि शिक्षा और कानून ने कुछ बदलाव किए हैं, लेकिन जाति व्यवस्था अब भी सामाजिक सोच में गहराई से जड़ें जमाए हुए है। यह कार्यक्रम इंस्टीट्यूट ऑफ स्टडी ऐंड रिसर्च, दिल्ली (ISRD) द्वारा अपनी नई लेक्चर सीरीज़ के तहत आयोजित किया गया।

मुख्य वक्तव्य देते हुए जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के डॉ. प्रदीप कुमार शिंदे ने कहा, “भारत में जाति को खत्म करना बेहद कठिन है।” उन्होंने बताया कि जाति प्रथा औपनिवेशिक काल से पहले भी थी, लेकिन ब्रिटिश जनगणना ने इसे संस्थागत बना दिया। जो पहले एक स्थानीय पहचान थी, वह धीरे-धीरे भोजन की आदतों, विवाह संबंधों और सामाजिक व्यवहार को निर्धारित करने वाली स्थायी पहचान बन गई।

ऐतिहासिक तथ्यों का जिक्र करते हुए डॉ. शिंदे ने बताया कि डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने अपनी प्रसिद्ध रचना Annihilation of Caste में स्पष्ट किया था कि जाति की उत्पत्ति हिंदू धार्मिक ग्रंथों में है — जो इस्लाम या ईसाई धर्म में नहीं मिलती। उन्होंने कहा कि भले कुछ समाजशास्त्री अस्पृश्यता कम होने की बात करते हैं, लेकिन वास्तविकता इसके विपरीत है। “आज भी दलितों को मंदिर प्रवेश नहीं मिलता, शादियों में घोड़ी चढ़ने पर हमला होता है और उन्हें अपमानित किया जाता है,” उन्होंने कहा।

राजस्थान, दिल्ली और उत्तर प्रदेश की ताज़ा घटनाओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि पुलिस और न्यायपालिका जैसे तटस्थ संस्थान भी कई बार जातिगत पक्षपात दिखाते हैं। “हाथरस कांड ने साबित कर दिया कि दलितों के लिए FIR दर्ज कराना तक कितना मुश्किल है।” राजनीति में भी जाति की गहरी पकड़ दिखाई देती है।

डॉ. शिंदे ने कहा कि जातिगत भेदभाव अब केवल भारत का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि एक वैश्विक चिंता बन गया है। ब्रिटेन में दलित समूहों और अमेरिका में दायर शिकायतों ने इसे अंतरराष्ट्रीय ध्यान तक पहुंचा दिया है। “यह दावा करना कि हिंदू होने से जाति भेदभाव खत्म हो जाएगा, एक राजनीतिक भ्रम है,” उन्होंने कहा।

दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर शशि शेखर ने कहा कि जाति आज भी कठोर सच्चाई है। “भारत में आप धर्म बदल सकते हैं, लेकिन जाति नहीं,” उन्होंने कहा। आज भी जाति विवाह, अधिकार और सामाजिक स्थिति का निर्धारण करती है। उप-जातियां मौजूद हैं और भेदभाव कानूनी सुधारों के बावजूद बना हुआ है।

उन्होंने कहा कि शिक्षा और शहरीकरण ने कुछ हद तक जाति व्यवस्था को कमजोर किया है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों और विश्वविद्यालयों में छात्र राजनीति में जाति का प्रभाव बहुत मजबूत है। “क्लासरूम भले जाति-निरपेक्ष दिखें, लेकिन चुनाव आते ही जाति की राजनीति खुलकर सामने आ जाती है।”

अपने अध्यक्षीय संबोधन में जमात-ए-इस्लामी हिंद के सचिव डॉ. मोहम्मद राज़ीउल इस्लाम नदवी ने कहा कि जातिगत भेदभाव को समाप्त करने के लिए मानसिकता में बुनियादी परिवर्तन जरूरी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय मुस्लिम समाज में जातिगत चेतना इस्लाम की शिक्षाओं पर आधारित नहीं, बल्कि भारतीय सामाजिक वातावरण से ग्रहण की गई है। “जहां हिंदू धर्म में जाति धार्मिक आधार रखती है, वहीं इस्लाम में इसका कोई स्थान नहीं।”

उन्होंने इस्लाम में समानता के सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा कि पैगंबर मुहम्मद ने कहा कि न कोई अरब गैर-अरब से श्रेष्ठ है, न गोरा काले से — श्रेष्ठता केवल ईश्वर-भक्ति में है।

उन्होंने चेतावनी दी कि केवल कानूनी सुधार से सामाजिक पूर्वाग्रह समाप्त नहीं होते। “बिना सोच बदले कानून बनाना ऐसे है जैसे कैंसर के मरीज को दर्द निवारक देना — दर्द तो कम होगा लेकिन बीमारी नहीं जाएगी।” कई दलित आर्थिक रूप से सक्षम होने के बाद भी सामाजिक बहिष्कार झेलते हैं क्योंकि लोगों के मन में जातिगत पूर्वाग्रह बरकरार हैं।

ब्रिटिशों द्वारा जाति व्यवस्था बनाए जाने के दावे को खारिज करते हुए डॉ. नदवी ने कहा, “ब्रिटिशों ने जाति नहीं बनाई, उन्होंने सिर्फ जो पहले से था, उसे बनाए रखा। जाति हजारों साल पुरानी है।” प्रोफेसर शशि शेखर से सहमत होते हुए उन्होंने कहा कि जाति आज भी शिक्षित शहरी वर्ग में सामाजिक वास्तविकता है। उन्होंने यह भी कहा कि धार्मिक अंतर-विवाह भी जातिगत पूर्वाग्रह को खत्म नहीं कर सकते।

अपने शुरुआती वक्तव्य में जमात-ए-इस्लामी हिंद दिल्ली के अध्यक्ष सलीमुल्लाह खान ने कहा कि समाज में आपसी सम्मान तभी संभव है जब लोग एक-दूसरे को सही मायने में समझें, क्योंकि अज्ञानता ही विभाजन को जन्म देती है।

ISRD के सचिव आसिफ इक़बाल ने बताया कि इस कार्यक्रम का उद्देश्य समाज के साथ सार्थक संवाद स्थापित करना है। “हमारा लक्ष्य दिल्ली जैसे विविध शहर के सामाजिक ढांचे का अध्ययन कर सकारात्मक योगदान देना है,” उन्होंने कहा।

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