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जॉन दयाल 


नई दिल्ली I रविवार I 10 मई 2026

जीविका योग्य वेतन की मांग को लेकर शुरू हुआ एक श्रमिक आंदोलन उत्तर प्रदेश के औद्योगिक केंद्र नोएडा में बड़े पुलिस दमन में बदल गया, जिसकी गूंज हरियाणा के मानेसर तक सुनाई दी। इस कार्रवाई और उसके बाद हुए पर्दादारी ने भारतीय राज्य की उस सच्चाई को उजागर कर दिया, जिसे वह दुनिया से छिपाना चाहता है—कि न केवल उत्तर प्रदेश, बल्कि दिल्ली में भी पुलिस द्वारा कार्यकर्ताओं को उठाया गया, जहां पुलिस सीधे केंद्र सरकार के अधीन है।

इस घटना ने “मेक इन इंडिया” के चमकदार वादों के पीछे छिपे सड़ांध भरे सच को भी सामने रखा। यहां मजदूरों को न्यूनतम वेतन से भी कम पर काम करना पड़ रहा था, जबरन ओवरटाइम कराया जा रहा था और वर्षों से संस्थागत उपेक्षा जारी थी। 13 अप्रैल को जब यह असंतोष सड़कों पर उतरा, तो जवाब में आंसू गैस, सामूहिक गिरफ्तारियां, हिरासत में यातना, यौन हिंसा और “पाकिस्तानी साजिश” जैसे मनगढ़ंत आरोप लगाए गए।

नोएडा का औद्योगिक क्षेत्र—जहां परिधान, ऑटो पार्ट्स, इलेक्ट्रॉनिक्स और बीपीओ इकाइयों का विशाल जाल फैला है—करीब 45,000 पंजीकृत और उससे कहीं अधिक असंगठित मजदूरों पर निर्भर है। इनमें अधिकांश बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और झारखंड से आए प्रवासी हैं, जो महज 10,000 से 12,000 रुपये मासिक पर काम करते हैं। कागजों में कटौती दिखाकर वेतन बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जाता है, जबकि वास्तविक आय लगभग 300 रुपये प्रतिदिन रह जाती है।

2014 के बाद से उत्तर प्रदेश में वेतन बोर्ड का गठन नहीं हुआ, जिससे महंगाई—विशेषकर भोजन, ईंधन और किराए—ने मजदूरों की क्रय शक्ति को बुरी तरह खत्म कर दिया है। 2025 के अंत से बढ़ी वैश्विक तेल कीमतों ने स्थिति और बदतर कर दी। मजदूरों ने बताया कि वे पेट भर खाना भी नहीं खा पा रहे थे।

9 अप्रैल 2026 को हरियाणा सरकार ने न्यूनतम वेतन में 35 प्रतिशत वृद्धि की घोषणा की, जिससे असंगठित मजदूरों का वेतन 15,220 रुपये मासिक हो गया। मानेसर के मजदूर पहले ही आंदोलनरत थे। यह खबर नोएडा तक पहुंची और समान काम करने वाले मजदूरों में असमानता को लेकर असंतोष फैल गया।

9 से 11 अप्रैल के बीच नोएडा के मजदूर समूहों में काम छोड़कर बाहर आने लगे और हजारों की संख्या में फैक्ट्री गेटों पर जुट गए। उत्तर प्रदेश सरकार ने ओवरटाइम का दोगुना भुगतान और समय पर वेतन जैसे आंशिक उपाय सुझाए, लेकिन मजदूरों ने 26,000 रुपये न्यूनतम वेतन, आठ घंटे का कार्यदिवस और ठेका श्रम प्रणाली खत्म करने की मांग की।

13 अप्रैल को पुलिस ने भारी बल तैनात कर दिया। जब मजदूरों ने सेक्टर 62 और चिल्ला बॉर्डर सड़क को जाम किया, तो उन पर लाठीचार्ज और आंसू गैस का इस्तेमाल हुआ। महिला मजदूरों पर भी पुरुष पुलिसकर्मियों द्वारा बल प्रयोग की खबरें आईं, जो कानूनी प्रावधानों का उल्लंघन था।

दो दिनों में 400 से अधिक मजदूर गिरफ्तार किए गए और कई एफआईआर दर्ज हुईं। पत्रकारों को भी नहीं बख्शा गया—एक रिपोर्टर को कवरेज के दौरान पीटा गया और बाद में मीडिया को बंदियों से मिलने से रोका गया।

गिरफ्तारी के बाद की घटनाएं और भी चिंताजनक रहीं। कुछ मजदूरों और कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया कि उन्हें अज्ञात स्थानों पर ले जाकर यातनाएं दी गईं। कई को बिना वारंट उठाया गया। दिल्ली में भी श्रमिक अधिकार कार्यकर्ताओं और छात्रों को इसी तरह हिरासत में लिया गया और कथित रूप से शारीरिक व यौन उत्पीड़न का सामना करना पड़ा।

इस पूरे आंदोलन को दबाने के लिए सरकार ने इसे “नक्सली साजिश” करार देने की कोशिश की। पुलिस ने दावा किया कि कुछ कार्यकर्ताओं के सोशल मीडिया अकाउंट पाकिस्तान से संचालित हो रहे थे और उन्होंने ही 45,000 मजदूरों को भड़काया। लेकिन कार्यकर्ताओं ने इसे सिरे से खारिज करते हुए कहा कि आंदोलन पूरी तरह शांतिपूर्ण था।

इस संकट की जड़ में वर्षों की नीतिगत विफलता है। 2014 के बाद वेतन संशोधन न होना और निवेश आकर्षित करने के नाम पर मजदूरी को दबाए रखना इस असंतोष का कारण बना। केंद्र सरकार के नए श्रम कानूनों को भी ट्रेड यूनियनों ने मजदूर विरोधी बताते हुए देशव्यापी विरोध किया था।

नोएडा का यह आंदोलन अपने आप में अनोखा है—यह स्वतःस्फूर्त है, किसी एक नेतृत्व पर निर्भर नहीं और तेजी से फैलने वाला है। यही बात सरकार और उद्योग दोनों को चिंतित कर रही है।

इसका असर अब नोएडा से आगे मानेसर, गुरुग्राम, फरीदाबाद, यहां तक कि अन्य राज्यों के औद्योगिक क्षेत्रों तक फैल चुका है। 1 मई को देशव्यापी विरोध का आह्वान किया गया है। वाम दलों ने इसे राष्ट्रीय स्तर पर उभरते श्रमिक असंतोष का प्रतीक बताया है।

यह घटनाक्रम केवल एक औद्योगिक विवाद नहीं, बल्कि उस गहरे संकट का संकेत है जिसमें भारत का श्रमिक वर्ग फंसा हुआ है—जहां विकास के दावे हैं, लेकिन मजदूरों के हिस्से में असुरक्षा, शोषण और दमन ही आता है।

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