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प्रो. प्रदीप माथुर

नई दिल्ली | शनिवार | 20 दिसंबर 2025

व्यापार और शुल्क (टैरिफ) वार्ताओं से अलग देखें, तो आज दुनिया जिस संयुक्त राज्य अमेरिका से रू-बरू है, वह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद वाला अमेरिका नहीं रहा। उसकी वैश्विक दृष्टि अब सहज रूप से उदार, समावेशी या उदारता-पूर्ण नहीं रह गई है। यह परिवर्तन केवल वॉशिंगटन तक सीमित नहीं है; पश्चिमी यूरोप के बड़े हिस्से में भी इसी प्रकार का अंतर्मुखी रुझान स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। ये प्रवृत्तियाँ मिलकर पश्चिमी विश्व के भीतर घटित हो रहे एक व्यापक और गहरे रूपांतरण की ओर संकेत करती हैं।

इस बदलाव के केंद्र में असुरक्षा की गहरी भावना निहित है। पश्चिम के श्वेत, ईसाई-बहुल समाजों के बड़े वर्ग स्वयं को आर्थिक, जनसांख्यिकीय और सांस्कृतिक स्तर पर उन लोगों और देशों से चुनौतीग्रस्त मानने लगे हैं, जिन पर वे कभी प्रभुत्व रखते थे। यह चिंता नई नहीं है, लेकिन अब इसे स्पष्ट राजनीतिक अभिव्यक्ति मिल चुकी है। जिस प्रकार भारत में बहुसंख्यक हिंदू समाज के कुछ वर्ग समय-समय पर मुसलमानों को लेकर असहजता व्यक्त करते हैं, उसी तरह पश्चिम में भी गैर-श्वेत शक्तियों—जैसे चीन, भारत और अनेक अफ्रीकी देशों—के उभार से बेचैनी दिखाई देती है।

डोनाल्ड ट्रंप की राजनीतिक अपील को इसी पृष्ठभूमि में समझा जाना चाहिए। वे उस वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसे बदलती लोकतांत्रिक और वैश्विक व्यवस्था में अपने पारंपरिक विशेषाधिकार खिसकते हुए प्रतीत होते हैं। उनके वक्तव्यों में आत्मविश्वास और असुरक्षा का विचित्र मिश्रण दिखता है—अमेरिकी श्रेष्ठता पर विश्वास, लेकिन घटते वर्चस्व का भय। यही विरोधाभास भारत सहित मित्र देशों के प्रति उनके रवैये में भी झलकता है। भारतीय अर्थव्यवस्था पर तंज, पुनर्निर्वाचन के बाद भारत के प्रधानमंत्री के साथ अनौपचारिक व्यवहार और भारतीय वस्तुओं पर दंडात्मक शुल्क—ये अलग-थलग घटनाएँ नहीं, बल्कि एक व्यापक विश्वदृष्टि का हिस्सा हैं।

आज रूस और भारत के बीच 90 प्रतिशत से अधिक व्यापार गैर-डॉलर शर्तों पर हो रहा है। चीन के साथ भी इसी दिशा में प्रयास जारी हैं। डॉलर के हाशिये पर जाते ही अमेरिकी वर्चस्व व्यावहारिक रूप से कमजोर पड़ सकता है, क्योंकि उन्नत तकनीक और सैन्य क्षमता के क्षेत्र में चीन लगभग अमेरिका के समकक्ष पहुँच चुका है। ऐतिहासिक रूप से अमेरिका ने यहूदी उद्यमियों और भारतीय पेशेवरों का स्वागत तब तक किया, जब तक वे व्यवस्था को सुदृढ़ करते रहे। जैसे ही उनकी सफलता स्थापित पदानुक्रम को चुनौती देने लगी, असहजता बढ़ने लगी। आव्रजन, वर्क-वीज़ा और आउटसोर्सिंग को लेकर तीखी बहसें इसी प्रवृत्ति का परिणाम हैं।

आने वाले वर्षों में बराक ओबामा या कमला हैरिस जैसे नेताओं का सर्वोच्च पदों तक पहुँचना कठिन होता दिखता है। ब्रिटेन में हिंदू मूल के प्रधानमंत्री ऋषि सुनक का अल्पकालिक कार्यकाल भी इसी व्यापक संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

भारत के कई विश्लेषक इन संकेतों को सही ढंग से पढ़ने में चूक जाते हैं। कूटनीतिक चैनलों से प्राप्त जानकारियाँ उपयोगी अवश्य हैं, लेकिन उन्हें अमेरिकी राजनीति की वस्तुनिष्ठ व्याख्या नहीं माना जा सकता। भारत को वॉशिंगटन का स्वतंत्र और यथार्थवादी विश्लेषण करना होगा तथा यह समझना होगा कि अमेरिकी नीति भावनात्मक गठबंधनों से अधिक घरेलू राजनीतिक मजबूरियों से संचालित होती है।

आज अमेरिका में भारतीय और यहूदी मूल के नागरिकों का आर्थिक और पेशेवर प्रभाव अत्यंत उल्लेखनीय है। तकनीक, चिकित्सा, वित्त, शिक्षा और प्रशासन जैसे क्षेत्रों में उनकी उपस्थिति जनसंख्या अनुपात से कहीं अधिक है। किंतु यही सफलता राजनीतिक तनाव का कारण भी बनती है। अधिकांश भारतीय-अमेरिकी डेमोक्रेटिक पार्टी के समर्थक हैं, जिससे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप के बीच व्यक्तिगत तालमेल में ठंडक आई है। मौजूदा “वीज़ा ड्रामा” को महज प्रशासनिक समस्या नहीं, बल्कि इसी राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। आम धारणा के विपरीत, वॉशिंगटन में भारतीय राजनयिकों का निर्णायक प्रभाव—यहाँ तक कि भारतीय प्रवासी समुदाय के भीतर भी—सीमित है।

इसी सामाजिक-राजनीतिक उथल-पुथल के बीच 5 दिसंबर को जारी अमेरिकी सुरक्षा दस्तावेज़ विदेश नीति के पुनर्संतुलन का संकेत देता है। यह पारंपरिक भू-राजनीति से हटकर भू-अर्थशास्त्र पर केंद्रित “अमेरिकन ड्रीम” को पुनर्परिभाषित करने का प्रयास है। युद्धोत्तर दशकों की सैन्य दखलअंदाज़ी और शासन-परिवर्तन की नीति के स्थान पर अब संघर्षों को सीमित करने तथा घरेलू विनिर्माण, व्यापार और आर्थिक पुनरुत्थान पर बल दिया जा रहा है।

यह दस्तावेज़ राष्ट्रपति जो बाइडेन की 2022 की सुरक्षा नीति से भिन्न है, क्योंकि इसमें किसी देश को सीधे शत्रु के रूप में नामित नहीं किया गया। जहाँ बाइडेन ने चीन को प्रमुख रणनीतिक खतरे के रूप में चिह्नित किया था, वहीं नया दस्तावेज़ उन्नीसवीं सदी के मुनरो सिद्धांत की भावना की याद दिलाते हुए अपने क्षेत्र में अमेरिकी प्रभुत्व को रेखांकित करता है—चयनात्मक हस्तक्षेप, सार्वभौमिक दखल नहीं।

यह दस्तावेज़ अमेरिकी धारणाओं की पुनर्समीक्षा भी करता है। सस्ते श्रम और त्वरित लाभ की चाह में चीन में दशकों तक किया गया निवेश इस उम्मीद पर आधारित था कि आर्थिक जुड़ाव राजनीतिक उदारीकरण को जन्म देगा। यह धारणा गलत सिद्ध हुई। चीन ने वैश्विक पूँजी का उपयोग बुनियादी ढाँचे, तकनीक और सैन्य शक्ति के निर्माण में किया और आज वह अमेरिकी वर्चस्व का एक मजबूत प्रतिस्पर्धी बनकर उभरा है।

इस नए ढाँचे में रूस की भूमिका जटिल है। वॉशिंगटन अब यह मानने लगा है कि यूरेशिया में मास्को, बीजिंग के संतुलनकर्ता की भूमिका निभा सकता है—यह शीतयुद्धकालीन रणनीति का उलट है। यही कारण है कि राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की हालिया भारत यात्रा पर अमेरिका की प्रतिक्रिया संयमित रही। अतिरंजित आकलनों के विपरीत, भारत–रूस निकटता को तत्काल खतरे के रूप में नहीं देखा जा रहा। कुछ अमेरिकी रणनीतिकार तो यह भी मानते हैं कि इससे रूस की चीन पर निर्भरता कम हो सकती है।

अब अमेरिकी वैश्विक जुड़ाव का केंद्र व्यापार कूटनीति बन चुका है। विनिर्माण का झुकाव वियतनाम, मलेशिया और भारत की ओर—जो ट्रंप के पहले कार्यकाल में शुरू हुआ था—आगे भी जारी रहने की संभावना है। ताइवान को लेकर चीन के प्रति सख्त रुख बनाए रखते हुए भी अमेरिका संतुलित व्यापार संबंध चाहता है, न कि अंतहीन टकराव।

भारत के लिए इस बदले हुए अमेरिकी दृष्टिकोण में अपना रास्ता निकालना एक नाजुक कूटनीतिक चुनौती है। उसे अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी, रूस के साथ ऐतिहासिक संबंध और अपनी रणनीतिक स्वायत्तता—तीनों के बीच संतुलन साधना होगा। आज का अमेरिका विचारधारा से अधिक आर्थिक स्वार्थ और घरेलू राजनीति से संचालित है—इस सच्चाई को समझना आवश्यक है।

नए अमेरिका से निपटने के लिए यथार्थवाद जरूरी है, न कि अतीत की स्मृतियों पर टिके रहना। नैतिक नेतृत्व और उदार गठबंधनों का दौर अब लेन-देन आधारित कूटनीति में बदल रहा है। भारत की सफलता भावनात्मक अपेक्षाओं पर नहीं, बल्कि ठोस आकलन, नीतिगत लचीलेपन और वैश्विक मंच पर अपनी उभरती क्षमता पर भरोसे से तय होगी।

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