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डॉ. सतीश मिश्रा

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नई दिल्ली | शनिवार | 29 नवंबर 2025

कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने एक बार फिर राजनीतिक बहस को गरमा दिया है — इस बार अमेरिकी लोकतंत्र के तथाकथित “शिष्टाचार” से भारतीय नेताओं को सीख लेने की सलाह देकर। न्यूयॉर्क सिटी के महापौर-चुनित ज़ोहरान ममदानी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच कटु चुनावी अभियान के बाद हुई अप्रत्याशित रूप से स्नेहपूर्ण मुलाक़ात से प्रेरित यह टिप्पणी भारत में आलोचना का विषय बन गई है और थरूर के राजनीतिक इरादों पर पुराने सवाल फिर उठ खड़े हुए हैं।

22 नवंबर को थरूर ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा कि भारतीय नेताओं को ट्रंप–ममदानी क्षण से सीखना चाहिए, जहाँ महीनों तक चले आक्रमक चुनावी अभियान के बावजूद दोनों नेता व्हाइट हाउस में गर्मजोशी से मिले।

“लोकतंत्र को इसी तरह काम करना चाहिए,” थरूर ने लिखा। “चुनाव में जुनून से लड़ो, लेकिन नतीजे आने के बाद जनता के फैसले का सम्मान करो और सहयोग करना सीखो… काश भारत में भी ऐसा ज़्यादा देखने को मिले — मैं अपनी ओर से कोशिश कर रहा हूँ।”

लेख एक नज़र में
कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने अमेरिकी लोकतंत्र के “सिविलिटी मॉडल” की प्रशंसा करते हुए सुझाव दिया कि भारतीय नेता भी चुनाव बाद ट्रंप–ममदानी जैसी सौहार्दपूर्ण राजनीति से सीखें। उन्होंने लिखा कि चुनाव लड़ो जुनून से, लेकिन नतीजों के बाद सहयोग करना सीखो। भारत में इस टिप्पणी ने आलोचना भड़का दी।
आलोचकों का कहना है कि थरूर अमेरिकी उदाहरण देकर भारतीय लोकतंत्र की जमीनी सच्चाइयों—स्वतंत्र संस्थाओं की कमी, चुनावी निष्पक्षता पर सवाल, जांच एजेंसियों के दुरुपयोग और घटती संघीय भावना—को नज़रअंदाज़ करते हैं।
कई लोग यह भी आरोप लगाते हैं कि थरूर अपनी ही पार्टी की तुलना में अक्सर BJP नेतृत्व की अधिक प्रशंसा करते हैं, जिससे उनके राजनीतिक इरादों पर संदेह बढ़ता है। विश्लेषकों के अनुसार, लोकतांत्रिक शिष्टाचार तभी सार्थक है जब संस्थाएँ मज़बूत और निष्पक्ष हों; अन्यथा यह केवल प्रतीकात्मक सौहार्द बनकर रह जाता है।

लेकिन आलोचकों का कहना है कि थरूर की तुलना दोनों लोकतांत्रिक प्रणालियों के बुनियादी अंतर को नज़रअंदाज़ करती है — और विडंबना यह है कि इससे भारत की घटती लोकतांत्रिक गुणवत्ता और स्पष्ट हो जाती है।

ट्रंप–ममदानी मुलाक़ात का संदर्भ

जिस मुलाक़ात ने थरूर को प्रभावित किया, उसने वैश्विक ध्यान आकर्षित किया। ट्रंप, जिन्होंने पहले ममदानी को “पागल”, “कम्युनिस्ट” और “तानाशाह” कहा था, 21 नवंबर की ओवल ऑफिस बैठक के बाद उनके प्रति आश्चर्यजनक रूप से सौम्य दिखे।

“मैं एक बहुत समझदार व्यक्ति से मिला, जो न्यूयॉर्क को फिर महान बनाना चाहता है,” ट्रंप ने कहा। “उसने अद्भुत चुनाव लड़ा… और मैंने उसे बधाई दी।”

ममदानी ने बैठक को “उत्पादक” बताया और कहा कि चर्चा आवास, affordability और साझा मुद्दों पर केंद्रित रही।

एक हल्का-फुल्का क्षण तब आया जब एक पत्रकार ने पूछा कि क्या वे अब भी ट्रंप को “फासीवादी” मानते हैं। इससे पहले कि ममदानी जवाब दे पाते, ट्रंप बोले — “हाँ ही कह दो, ठीक है? आसान रहेगा।” ममदानी ने मुस्कराकर “हाँ” कहा और कमरे में ठहाके गूंजे।

इसी चुनावोत्तर सौहार्द की थरूर ने प्रशंसा की — लेकिन भारत में इसका स्वागत नहीं हुआ।

‘चयनात्मक दृष्टि’, आलोचकों का आरोप

पूर्व IIMC प्रोफेसर प्रदीप माथुर का कहना है कि थरूर का संदेश भारतीय राजनीतिक वास्तविकताओं से उनकी दूरी को उजागर करता है।

“हर जगह चुनाव कठिन होते हैं,” माथुर कहते हैं। “लेकिन थरूर को बताना चाहिए कि क्या भारत में आज चुनाव वास्तव में स्वतंत्र और निष्पक्ष हैं, या चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं के कारण समझौता किए हुए? वे नैतिक उपदेश देते समय जमीनी सच्चाइयों से कटी हुई प्रतीत होते हैं।”

कई आलोचक यह भी कहते हैं कि थरूर अक्सर अपने दल की तुलना में RSS–BJP नेतृत्व की अधिक तारीफ करते दिखते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रामनाथ गोयनका व्याख्यान की उनकी प्रशंसा — जिसे उन्होंने आर्थिक दृष्टि-रोडमैप और सांस्कृतिक उद्घोष दोनों बताया — कांग्रेस में कई भौंहें उठ गईं। इससे पहले भी वे भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी के जन्मदिन पर उनकी खुलकर सराहना कर चुके हैं।

इसके बावजूद कांग्रेस नेतृत्व ने उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की है, जो पार्टी के भीतर कई लोगों के लिए रहस्य बना हुआ है।

क्या शिष्टाचार बिना लोकतांत्रिक निष्पक्षता संभव है?

आलोचकों का कहना है कि थरूर का “सिविलिटी” का आग्रह भारतीय लोकतंत्र की बुनियादी समस्याओं को नज़रअंदाज़ करता है।

एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता पूछते हैं — “प्रधानमंत्री विपक्ष के नेता के बारे में कितने ‘सभ्य’ होते हैं? क्या थरूर राहुल गांधी या सोनिया गांधी के खिलाफ इस्तेमाल की गई भाषा भूल गए हैं?”

थरूर भी विवादों से अछूते नहीं रहे। 2009 में उनका “कैटल क्लास” ट्वीट — जिसे व्यापक रूप से अभिजात्य मानसिकता का संकेत माना गया — अभी भी याद किया जाता है।

महत्वपूर्ण यह कि अमेरिका और भारत की तुलना करते वक्त वे संस्थागत अंतर को नज़रअंदाज़ कर देते हैं। अमेरिका में संस्थाएं तुलनात्मक रूप से स्वतंत्र हैं; संघीय ढांचा वास्तविक है; और जांच एजेंसियां सत्ता पक्ष के राजनीतिक औज़ार के रूप में काम नहीं करतीं। आलोचक पूछते हैं — क्या 2014 के बाद भारत में ऐसा कहा जा सकता है?

चुनाव आयोग, CBI, ED और राज्यपालों की भूमिका क्या निष्पक्ष बनी हुई है? मीडिया स्वतंत्र है? संघीय सिद्धांत सुरक्षित हैं? थरूर की इन सवालों पर चुप्पी, आलोचकों के अनुसार, उनके “सिविलिटी” संदेश से कहीं अधिक अर्थपूर्ण है।

रणनीतिक विचलन या संभावित पुनर्स्थापन?

69 वर्ष की आयु में, संयुक्त राष्ट्र, केंद्र सरकार, साहित्य और सांसद के रूप में लंबा करियर रखने वाले थरूर से स्थिर राजनीतिक रुख की अपेक्षा की जाती है। लेकिन कांग्रेस नेतृत्व की उनकी समय-समय पर की गई आलोचना ने उनके इरादों पर अटकलों को हवा दी है।

कुछ कांग्रेसी नेताओं का मानना है कि थरूर जानबूझकर अनुशासनात्मक कार्रवाई को उकसाना चाहते हैं, ताकि वे संसद सदस्यता बनाए रखते हुए पार्टी छोड़ सकें — या भविष्य में भाजपा में जाने की संभावनाएँ खुली रखें।

आलोचकों का कहना है कि उनके हाल के वक्तव्य भाजपा की राजनीतिक कथा से सहज रूप से मेल खाते हैं। उनका तर्क सरल है — यदि थरूर को कांग्रेस नेतृत्व से इतनी असहमति है, तो वे इस्तीफ़ा देकर दोबारा जनता का जनादेश क्यों नहीं लेते?

मूल प्रश्न: शिष्टाचार बनाम लोकतांत्रिक सेहत

कई विश्लेषकों का कहना है कि थरूर यह समझने में चूक जाते हैं कि राजनीतिक शिष्टाचार कोई स्वतःसिद्ध मूल्य नहीं है। यह मजबूत संस्थाओं, लोकतांत्रिक वैधता और राजनीतिक निष्पक्षता की उपज है। इनके बिना चुनावोत्तर शिष्टाचार सिर्फ़ राजनीतिक अभिनय बनकर रह जाता है।

अमेरिका और भारत की तुलना को आलोचक “सेब और संतरे” की तुलना बताते हैं।

थरूर कहते हैं कि वे “अपनी ओर से” शिष्टाचार बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। मगर आलोचकों को यह दावा खोखला लगता है, खासकर उस पृष्ठभूमि में जिसमें वे मोदी सरकार पर शक्ति के केंद्रीकरण और उस “इंडिया की अवधारणा” के क्षरण का आरोप लगाते हैं, जिसे कभी थरूर ने ही दृढ़ता से पेश किया था।

आख़िरकार, विवाद यह बड़ा प्रश्न उठाता है: क्या राजनीतिक शिष्टाचार तब भी सार्थक है, जब स्वयं लोकतंत्र की नींव ही दबाव में हो?

थरूर का मानना हो सकता है कि इसका उत्तर “हाँ” है — लेकिन उनके आलोचक इससे सहमत नहीं दिखते।

(डॉ. सतीश मिश्रा वरिष्ठ पत्रकार और अनुभवी राजनीतिक विश्लेषक हैं। वे ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन में सीनियर फ़ेलो रह चुके हैं।)

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