
ईरान ने एक बार फिर साबित कर दिया कि “झुकती है दुनिया, झुकाने वाला चाहिए।” होर्मुज़ जलडमरूमध्य को दो दिन के भीतर खोलने की धमकी देना और फिर उसे पाँच दिन के लिए टाल देना एक मशहूर किस्सा याद दिलाता है। शादी से पहले एक आदमी को उसके दोस्त ने सलाह दी कि बीवी को डरा-धमकाकर काबू में रखना, वरना वह सिर पर चढ़ जाएगी। इसलिए पति अपने हर आदेश के अंत में धमकी देते हुए “वरना” कहने लगा। पत्नी जब तंग आ गई तो उसने जवाब देने का फैसला किया। एक दिन पति ने कहा—“फौरन नहाने के लिए पानी गर्म करो, वरना?” पत्नी बोली—“वरना क्या कर लोगे?” पति इस जवाब के लिए तैयार नहीं था, इसलिए झेंपकर बोला—“वरना ठंडे पानी से नहा लूँगा।”
ट्रम्प ने भी 48 घंटे के भीतर होर्मुज़ जलडमरूमध्य खोलने की धमकी देते हुए कहा कि अगर ऐसा नहीं हुआ तो वह ईरान के बिजलीघरों को निशाना बनाएगा। ईरान ने जवाब दिया कि ऐसा हुआ तो वह बारूदी सुरंगें बिछाकर इस रास्ते को बंद कर देगा और जब तक बिजलीघर फिर से नहीं बन जाते, होर्मुज़ बंद रहेगा। बस फिर क्या था—सारी अकड़ निकल गई।
जब इज़राइल ने अमेरिका की सरपरस्ती में हमला किया तो ईरान ने करारा जवाब देते हुए होर्मुज़ को बंद कर दिया। इस फैसले ने मोदी जैसे ट्रम्प समर्थकों के भी होश उड़ा दिए। होर्मुज़ को खोलने के लिए “अब्राहम लिंकन” नामक नौसैनिक बेड़ा आगे बढ़ा, लेकिन उस पर हमले होने लगे और उसे युद्ध क्षेत्र से दूर ले जाया गया, ताकि भविष्य में इस “खिलौने” से क्यूबा जैसे देशों को डराया जा सके।
इसके बाद ट्रम्प ने यूरोप से लेकर जापान, ऑस्ट्रेलिया और चीन तक सभी सहयोगियों से मदद की गुहार लगाई, लेकिन सबने मुँह मोड़ लिया। यह अमेरिका की कमजोरी का खुला प्रमाण था। आखिरकार ट्रम्प ने नाटो देशों को खरी-खोटी सुनाई और फिर ईरान को धमकी दी कि 48 घंटे में जलडमरूमध्य नहीं खुला तो बिजलीघरों पर हमला होगा।
ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने जवाब दिया कि अगर उनके बिजली तंत्र को निशाना बनाया गया तो वे इज़राइल के बिजलीघरों और अमेरिकी ठिकानों को बिजली देने वाले प्लांट्स पर हमला करेंगे। यदि ईरानी तट या द्वीपों पर हमला हुआ तो खाड़ी के सभी समुद्री रास्तों को बारूदी सुरंगों से भर दिया जाएगा।
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान ने कहा कि हर हमले का निर्णायक जवाब दिया जाएगा। ईरान को नक्शे से मिटाने की बात दुश्मन की निराशा दर्शाती है। धमकियाँ ईरानी जनता को कमजोर नहीं बल्कि और मजबूत बना रही हैं। उन्होंने यह भी कहा कि होर्मुज़ जलडमरूमध्य उन सभी देशों के लिए खुला है जो ईरान की संप्रभुता का सम्मान करते हैं।
काश भारत भी चीन की तरह ईरान की संप्रभुता का सम्मान करता, तो ईंधन की आपूर्ति निर्बाध रहती। लेकिन मोदी जी इज़राइल जाकर नेतन्याहू के करीब हो गए, जिसकी कीमत देश की जनता चुका रही है।
युद्धोन्माद में डूबे ट्रम्प ने ईरान के बिजलीघरों पर हमले को पाँच दिन के लिए टालते हुए कहा कि दोनों देशों के बीच बातचीत सकारात्मक रही है। उन्होंने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लिखा कि पिछले दो दिनों में गहन और रचनात्मक बातचीत हुई है, जिसका उद्देश्य मध्य पूर्व में तनाव का स्थायी समाधान ढूँढना है।
यह सवाल उठता है कि बातचीत पहले भी हो रही थी—फिर उसे किसने बिगाड़ा? इस तनाव के लिए जिम्मेदार कौन है?
अगर शुरुआत में ही समझदारी दिखाई जाती तो यह स्थिति क्यों बनती? लेकिन सच है कि “लातों के भूत बातों से नहीं मानते।” ईरान ने अपनी ताकत दिखाकर अमेरिका को झुका दिया।
जब ट्रम्प की अक्ल ठिकाने आई तो बाकी लोग भी लाइन पर आ गए। मोदी जी को संसद में बयान देने की अनुमति मिल गई। उन्होंने हकलाते हुए लिखा हुआ भाषण पढ़ा ताकि कोई ऐसा शब्द न निकल जाए जिससे “आका” नाराज़ हो जाए।
उन्होंने कहा कि “दुनिया इस संकट के शांतिपूर्ण समाधान की उम्मीद कर रही है,” लेकिन खुद उन्होंने ईरान से संवाद सीमित रखा और बाकी देशों से बात करते रहे।
प्रधानमंत्री ने यह भी माना कि “ऊर्जा आधुनिक अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और पश्चिम एशिया इसका प्रमुख स्रोत है,” लेकिन उनकी विदेश नीति ने भारत को मुश्किल में डाल दिया।
उन्होंने शांति और कूटनीति की बात की, लेकिन सवाल उठता है कि यही सिद्धांत भारत-पाक संबंधों में क्यों नहीं अपनाया जाता?
इज़राइल ने अमेरिका और यूरोप के समर्थन से फिलिस्तीन पर कब्जा कर रखा है और लगातार अत्याचार कर रहा है। दुनिया के कई देश फिलिस्तीन के साथ हैं, लेकिन मोदी सरकार इज़राइल के करीब होती गई।
7 अक्टूबर के हमले को तो आतंकवाद कहा गया, लेकिन गाज़ा में हो रही तबाही पर चुप्पी साध ली गई।
हालात ऐसे बने कि ईरान ने इज़राइल को कड़ा जवाब दिया और अमेरिका की पकड़ कमजोर पड़ गई। होर्मुज़ बंद होने से भारत में भी संकट जैसी स्थिति पैदा हो गई, जिसका खुद प्रधानमंत्री ने स्वीकार किया।
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