जहाँ तक मैं अपने अबोध मन से समझ पाया हूँ यह वह “पवित्र गीत” है, जिसे भगवान श्री कृष्ण जी ने स्वयं अपने श्री मुख से गाया है, अर्थात वह गीत जिसे भगवान ने स्वयं गाया है इसीलिए मूल रूप से यह "भगवत गीत" है जो अंग्रजी में "भागवत गीता" हो गया जैसे ‘योग’ अंग्रेजी में ‘योगा’ हो गया ‘वेद’ अंग्रेजी में ‘वेदा’ हो गया ,यह सभी को जानना बहुत जरुरी है कि इसे भगवान ने स्वयं अपने श्री मुख से गाया है और महर्षि वेदव्यास ने संकलित किया है, इसलिए यह अत्यंत पवित्र ग्रंथ के रूप में पूजा जाता है,कहने की आवश्यकता नहीं है, कि समय-समय पर अनेक संत-महन्त , ऋषि-मुनि, विद्वानों ने अपनी चेतना के अनुसार इसे परिभाषित किया है, इस संबंध में मैं बहुत स्पष्ट हूँ कि “भगवान को अपना कार्य जिससे भी कराना है, वे अपने आप ‘योग्य पात्र’ खोज लेते हैं”I
जिस प्रकार भगवान ने स्वयं सारथी बनकर अर्जुन को खोजा और अपना कार्य उनसे कराया। यहाँ स्पष्ट कर दूँ कि अर्जुन को कुरुक्षेत्र में भ्रम हो गया कि श्री कृष्ण वास्तव में भगवान हैं कि नहीं ? क्यों कि वे आपस में बाल सखा थे ! अर्जुन ने अपना भ्रम दूर करने के लिए प्रश्न किया है कि पहले तो आप ने कभी नहीं बताया कि आप भगवान है, तो भगवान ने कहा है सवाल “रिसीवर” और ट्रांसमीटर” का था ,पहले बताता तो तुम नहीं समझ पाते, आज तुम्हारी परिस्थितियां ऐसी है कि तुम सब समझ सकते हो I अर्थात “विषाद योग” सब कुछ रिसीव कर सकते हो I सम्पूर्ण “भगवत गीत” यही है कि क्षेत्र में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को प्रशिक्षित कर रहे है I
मैं यह संदर्भ सिर्फ इसलिए लिया कि भगवान को अपना कार्य कराना है, तो वे अपना “योग्य पात्र” खोज लेते हैं, उसी श्रेणी में श्री दिनेश एन वर्मा (खुशदिल) साहब हैं ,स्वयं उन्हीं के शब्दों में "संयोगवश, मेरे लिए काम आसान करने के लिए, मथुरा के एक विद्वान द्वारा लिखित हिंदी में गीता की व्याख्या का अंग्रेजी में अनुवाद करने का अवसर मेरे पास आया, जिसे मैंने किसी आर्थिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि इसके सिद्धांतों की बारीकियों को समझने के लिए लिया, आखिर क्या इस दुनिया में रह रहे आठ सौ करोड़ मानव आत्माओं में अंग्रेजी अनुबाद करने के लिए और कोई नहीं था ? क्यों ‘खुशदिल’ साहब को ही चुना ? क्योंकि उनके मन में जो बचपन से जो बीज प्रस्फुटित हो रहा था, वह अंकुरित होने के साथ साथ समयानुसार पुष्पित-पल्लवित होता रहा और बाद में वटवृक्ष की शकल लेने लगा था I भगवान आपको बचपन से ही सिखाते आ रहे हैं, यह भी भगवत कृपा ही है कि आप को “खुशदिल” बनाया I
"भगवत गीत" आज के जीवन शैली में आम आदमी की प्रबल आवश्यकता है शायद इसी लिए भगवान ने श्री खुशदिल साहब को अंग्रेजी अनुबाद करने के बहाने से ‘गीता में डूबने’ का अवसर प्रदान किया, तभी यह "भगवद गीता और आम आदमी" अंतर्मन से निकल कर बाहर आया। बगैर भगवत कृपा के यह असम्भव होता ! यहां पर एक उदाहरण से और स्पष्ट करना चाहता हूँ कि आदि कवि महर्षि बाल्मीकि ने रामायण की मूल रचना संस्कृत में किया है, उसके अनेको अनुबाद हुए किन्तु कालांतर में जब गोस्वामी तुलसी दास जी ने आम आदमी की भाषा में उसकी रचना किया तो वह “श्री राम चरित मानस” के रूप में घर-घर में पहुंच गया। सम्भवतः श्री खुशदिल साहब द्वारा लिखी गयी यह पुस्तक भी आम आदमी के लिए ही लिखी गयी है.I वैसे तो यह पुस्तक अंग्रेजी में लिखी गयी है किन्तु सहज व् सरल है, यदि हिंदी में लिखा होता तो और भी उत्कृष्ट होता।
हमारे व्यक्तिगत समझ से जीवन के सभी मुद्दों का स्थाई समाधान "भगवत गीता" है, इस किताब का सारांश है यह है कि , जीवन के किसी भी मुद्दों /समस्या को नजर अंदाज करने से भविष्य में दूरगामी दुखद परिणाम हो सकते हैं, किसी भी रोग का निदान तात्कालिक शमन नहीं, बल्कि उसका स्थाई निवारण होना जरुरी होता है, अन्यथा रोग कालांतर में बढ़ते-बढ़ते असाध्य रूप धारण कर लेता है, जो युक्तिहीन और खतरनाक सम्भावनाओ से भरपूर होता है, आज हमारे समाज में बहुआयामी समस्याएं है, जिससे छुटकारा पाने का निकट भविष्य में कोई आसार नजर नहीं आ रहा है, हमारा समाज राजनितिक , सामाजिक, संवैधानिक, क़ानूनी , नैतिक पतन से जूझ रहा है, ऐसे में यह किताब निश्चित रूप से समाज का मार्गदर्शन करने में एक विशेष औषधि का कार्य करेगा। श्री खुशदिल साहब साधुवाद के पात्र है हमारी अनंत शुभकामनाये।
( अधिवक्ता, सर्वोच्च न्यायालय, नई दिल्ली)
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