ट्रंप अमेरिका के हितों को सुरक्षित करने के नाम पर एक अन्य देश की संप्रभुता को कमजोर करने और उसके संसाधनों का दोहन करने की कोशिश कर रहे हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, जिन्होंने खुले तौर पर अंतरराष्ट्रीय मानदंडों का उल्लंघन करते हुए वेनेजुएला में हस्तक्षेप किया और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को बंदी बनाया, अब एक और आक्रामक कदम की ओर बढ़ते दिखाई दे रहे हैं। ट्रंप पहले भी दुनिया के सबसे बड़े द्वीप आर्कटिक ग्रीनलैंड को खरीदने की बात कह चुके हैं और कई बार इसे अमेरिकी प्रशासन के अधीन लाने की इच्छा जता चुके हैं। उनके इन बयानों से सार्वजनिक आक्रोश भड़क चुका है, हालांकि उनके इरादों के खिलाफ ठोस प्रतिरोध को आकार लेने में समय लग सकता है।
अपने पहले कार्यकाल में भी ट्रंप ने ग्रीनलैंड को सीधे खरीदने का प्रस्ताव रखा था। ग्रीनलैंड का प्रशासन संभालने वाले डेनमार्क ने स्पष्ट और विनम्र शब्दों में कहा था कि ग्रीनलैंड बिक्री के लिए नहीं है। इसके बावजूद ट्रंप ने साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं का संकेत देते हुए यहां तक कहा कि जरूरत पड़ी तो सैन्य बल का प्रयोग भी किया जा सकता है। सैन्य दृष्टि से देखें तो किसी टकराव की स्थिति में डेनमार्क के लिए टिक पाना कठिन होगा। ग्रीनलैंड की आबादी 60 हजार से भी कम है, डेनमार्क की कुल आबादी लगभग 55 लाख है, जबकि अमेरिका की आबादी 33 करोड़ है। यह असमानता सैन्य शक्ति में भी झलकती है, जिससे अमेरिकी कार्रवाई अपेक्षाकृत आसान हो सकती है। हालांकि ऐसी स्थिति में रूस और चीन मूकदर्शक बने रहें, यह मान लेना भी उचित नहीं होगा।
नाटो के सदस्य होने के कारण डेनमार्क और अमेरिका सामूहिक रक्षा संधि से बंधे हैं, जिसके अनुसार किसी एक सदस्य पर हमला पूरे नाटो पर हमला माना जाता है। ऐसे में यदि एक नाटो देश दूसरे सदस्य पर आक्रमण करे, तो यह वैश्विक व्यवस्था को बुनियादी रूप से हिला देगा। यही कारण है कि ट्रंप के बयान के तुरंत बाद कई यूरोपीय देशों ने चेतावनी दी कि ऐसा कदम नाटो के अंत का कारण बन सकता है।
अमेरिका की नजर ग्रीनलैंड पर क्यों है, इसके पीछे ठोस कारण हैं। बर्फ से ढकी इस भूमि के नीचे आधुनिक दुनिया के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण खनिज और धातुओं के विशाल भंडार मौजूद हैं। इनमें दुर्लभ मृदा तत्व (रेयर अर्थ एलिमेंट्स) शामिल हैं, जो लगभग सभी इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में प्रयुक्त सेमीकंडक्टर के निर्माण के लिए आवश्यक हैं। ये खनिज नवीकरणीय ऊर्जा तकनीक और इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण हैं। ग्रीनलैंड में यूरेनियम के भंडार होने की भी संभावना है, जो परमाणु ऊर्जा और परमाणु हथियारों दोनों के लिए अहम है। चीन, जो वैश्विक रेयर अर्थ आपूर्ति श्रृंखला में प्रभुत्व रखता है, इस क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ा रहा है। यदि चीन ताइवान पर नियंत्रण स्थापित कर ले, जहां दुनिया के अधिकांश सेमीकंडक्टर बनते हैं, तो अमेरिका को एक और रणनीतिक चुनौती का सामना करना पड़ेगा। इसके अलावा, जलवायु परिवर्तन के कारण आर्कटिक जलमार्ग अधिक समय तक नौवहन योग्य होते जा रहे हैं, जिससे अमेरिका, एशिया और यूरोप के बीच समुद्री दूरी कम और व्यापार अधिक सुगम हो सकता है। इससे ग्रीनलैंड का भू-राजनीतिक महत्व और बढ़ जाता है।
अमेरिकी महत्वाकांक्षाओं पर वैश्विक बहस तेज होते ही प्रतिक्रियाएं भी सामने आने लगीं। स्वयं अमेरिका में सीनेट में ‘ग्रीनलैंड संप्रभुता संरक्षण विधेयक’ पेश किया गया, जिसे रिपब्लिकन और डेमोक्रेट दोनों दलों के सांसदों ने समर्थन दिया। इस विधेयक का उद्देश्य राष्ट्रपति को किसी भी नाटो सदस्य देश के क्षेत्र पर कब्जा करने से रोकना है। इसके तहत रक्षा विभाग और विदेश विभाग को किसी नाटो सहयोगी के क्षेत्र पर नियंत्रण पाने या उस पर प्रतिबंध लगाने के लिए संघीय धन के उपयोग की अनुमति नहीं होगी। विधेयक पेश करने वाली सीनेटर जीन शाहीन ने कहा कि करदाताओं का पैसा नाटो को विभाजित करने या उसके मूल सिद्धांतों का उल्लंघन करने में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। यदि यह विधेयक पारित होता है, तो यह राष्ट्रपति के एकतरफा और मनमाने कदमों पर अंकुश लगाएगा।
दूसरी ओर, यूरोपीय देशों ने ट्रंप के बयानों का कड़ा विरोध किया है। ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, पोलैंड, स्पेन और डेनमार्क ने स्पष्ट कर दिया है कि ग्रीनलैंड वहां के लोगों का है और उसके भविष्य का निर्णय केवल डेनमार्क और ग्रीनलैंड ही कर सकते हैं। ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री जेन्स-फ्रेडरिक नील्सन ने भी कहा है कि यदि अमेरिका और डेनमार्क में से किसी एक को चुनने की नौबत आई, तो ग्रीनलैंड हमेशा डेनमार्क को चुनेगा। हालांकि अमेरिका की ग्रीनलैंड में सैन्य मौजूदगी है, ट्रंप ने रूसी और चीनी नौसैनिक गतिविधियों के बढ़ते खतरे का हवाला देते हुए द्वीप को अमेरिकी सुरक्षा के लिए आवश्यक बताया है, हालांकि इन दावों की पुष्टि नहीं हुई है। डेनमार्क की संसद में ग्रीनलैंड के एक प्रतिनिधि ने स्पष्ट कहा, “हम अमेरिकी नहीं बनना चाहते। हम अपनी भाषा, पहचान और संस्कृति को सुरक्षित रखना चाहते हैं—और यदि हम अमेरिका का हिस्सा बन गए, तो यह संभव नहीं होगा।”
ट्रंप का दृष्टिकोण सुरक्षा को आधार बनाकर किसी अन्य देश की संप्रभुता को कमजोर करने और उसके संसाधनों को अमेरिकी हितों के लिए उपयोग करने का प्रयास दर्शाता है। हाल तक वैश्विक राजनीति में अपेक्षाकृत शांत रहे इस द्वीप के इतिहास में ऐसा नाटकीय मोड़ शायद ही किसी ने कल्पना की होगी।
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