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प्रो. शिवाजी सरकार

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नई दिल्ली | शनिवार | 25 अक्टूबर 2025

भी भारत की समृद्धि और सुशासन के आदर्श मॉडल के रूप में पेश किया जाने वाला गुजरात हाल ही में एक राजनीतिक झटके से गुज़रा है। सोलह मंत्रियों ने अचानक इस्तीफ़ा दे दिया और उनकी जगह 25 नए चेहरों को शामिल किया गया, जिनमें 12 पहली बार चुने गए विधायक हैं। यह फेरबदल जिस तेजी से किया गया, उसने उस स्थिरता और सफलता की चमक के नीचे छिपे गहरे असंतोष की ओर इशारा कर दिया है।

भाजपा जैसी पार्टी, जो अनुशासन और निरंतरता पर गर्व करती है, के लिए ऐसा व्यापक फेरबदल असामान्य है। राज्य, जिसे भाजपा का वैचारिक गढ़ माना जाता है, में यह “दिवाली क्लीन-अप” सवाल खड़े करता है — क्या यह केवल प्रशासनिक सुधार है या फिर भीतर उबल रहे असंतोष और एंटी-इनकंबेंसी को शांत करने की कोशिश?

फेरबदल का अर्थ और पृष्ठभूमि

16 अक्टूबर को घोषित इस निर्णय के बाद मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल अपने पुराने मंत्रिमंडल के एकमात्र बचे सदस्य रहे। सूत्रों के अनुसार, यह कदम प्रशासनिक सुस्ती को दूर करने, जनता का भरोसा बहाल करने और आगामी स्थानीय निकाय चुनावों से पहले सरकार को नई ऊर्जा देने के लिए उठाया गया है। स्थानीय परंपरा के अनुसार, दिवाली के बाद का पखवाड़ा अशुभ माना जाता है, इसलिए बड़े बदलाव से पहले यह तेज़ी दिखाई गई।

लेख एक नज़र में
कभी “विकास मॉडल” के प्रतीक रहे गुजरात में हाल ही में 16 मंत्रियों के इस्तीफे और 25 नए चेहरों की नियुक्ति ने राजनीतिक हलचल मचा दी। यह बदलाव प्रशासनिक सुस्ती, बढ़ते असंतोष और आगामी चुनावों से पहले सरकार में नई ऊर्जा लाने की कोशिश माना जा रहा है। हालांकि, इसके पीछे गहराती असमानता और एंटी-इनकंबेंसी की झलक भी दिखती है।
औद्योगिक सफलता के बावजूद गुजरात सामाजिक रूप से पिछड़ा है — यहाँ देश की सबसे कम मजदूरी दरें, 38% कुपोषित आबादी और व्यापक ग्रामीण गरीबी है। मनरेगा घोटाला, पुल हादसे और आंतरिक कलह ने सरकार की छवि को नुकसान पहुँचाया है। “गुजरात मॉडल” अब विकास बनाम समावेशन की बहस में बदल गया है।
 राज्य की वास्तविक चुनौती अब आर्थिक विस्तार नहीं, बल्कि मानव पूंजी, पोषण, शिक्षा और समानता को सशक्त बनाना है — ताकि समृद्धि सिर्फ उद्योगों तक सीमित न रहे।

नया शक्ति केंद्र – हर्ष सांघवी का उदय

नए नेताओं में प्रमुख हैं हर्ष सांघवी, जैन समुदाय से आने वाले युवा नेता जिन्हें गृह विभाग की जिम्मेदारी सौंपी गई है — जो पारंपरिक रूप से मुख्यमंत्री के पास रहता है। इससे उनके बढ़ते प्रभाव का संकेत मिलता है। सांघवी चिमनभाई पटेल के दौर से अब तक छठे उपमुख्यमंत्री हैं, जो दिखाता है कि गुजरात भाजपा में भी राजनीतिक संतुलन बनाए रखना अब भी जरूरी है।

चमक के नीचे छिपे संकट

गुजरात औद्योगिक उत्पादन, वित्तीय अनुशासन और आधारभूत ढांचे में देश में अग्रणी है, लेकिन हालिया आंकड़े एक विरोधाभास उजागर करते हैं। भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की रिपोर्ट बताती है कि गुजरात और मध्य प्रदेश में देश के सबसे कम दैनिक मजदूरी दरें हैं। नीति आयोग के मानव विकास सूचकांक भी यही बताते हैं — समृद्धि कुछ के लिए, असुरक्षा बहुतों के लिए।

गांधी रोजगार योजना में 71 करोड़ का घोटाला

“गुजरात मॉडल” की चमक को सबसे बड़ा झटका दाहोद जिले में मनरेगा योजना में 71 करोड़ रुपये के घोटाले से लगा। जांच में पाया गया कि फर्जी दस्तावेजों के ज़रिए धन की हेराफेरी की गई। इस घोटाले में तत्कालीन पंचायत और कृषि राज्य मंत्री बचुभाई खाबड़ के बेटे मुख्य आरोपी के रूप में गिरफ्तार हुए। इस घटना ने सरकार की छवि को गहरा धक्का दिया और प्रशासनिक ढीलापन उजागर कर दिया।

वडोदरा पुल हादसा और जवाबदेही का अभाव

जुलाई 2025 में वडोदरा के गंभीर पुल का हिस्सा ढह गया, जिससे 22 लोगों की मौत हो गई। स्थानीय लोगों ने वर्षों से चेतावनी दी थी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। चार इंजीनियरों को निलंबित किया गया, पर असली जिम्मेदारी तय नहीं हो सकी।

पार्टी के भीतर झगड़े और अनुशासनहीनता

14 अक्टूबर को दो भाजपा विधायकों में सड़क निर्माण को लेकर हाथापाई हो गई। यह घटना कैमरे में कैद हुई और पार्टी नेतृत्व के लिए शर्मिंदगी का कारण बनी। कहा जा रहा है कि इसी के बाद फेरबदल की प्रक्रिया तेज हुई।

गुजरात की औद्योगिक ताकत

गुजरात भारत के रासायनिक उत्पादन का एक-तिहाई और पेट्रोकेमिकल उत्पादन का 62 प्रतिशत योगदान देता है। कांडला, मुंद्रा और दहेज जैसे बंदरगाह मिलकर देश के 40 प्रतिशत माल और 30 प्रतिशत निर्यात को संभालते हैं। राज्य की 33 लाख से अधिक सूक्ष्म, लघु और मध्यम इकाइयाँ (MSME) अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं।

वित्त वर्ष 2023–24 में गुजरात बैंक वित्तपोषित औद्योगिक परियोजनाओं का शीर्ष गंतव्य बना, जो निवेशकों के निरंतर विश्वास का प्रमाण है।

दूसरा गुजरात — असमानता की कहानी

नीति आयोग के बहुआयामी गरीबी सूचकांक (MPI) के अनुसार, गुजरात की लगभग 38 प्रतिशत आबादी कुपोषित है। ग्रामीण इलाकों में लगभग आधी जनसंख्या पोषण की कमी से जूझ रही है — यह आंकड़ा उस राज्य के लिए चौंकाने वाला है जिसे देश का “विकास इंजन” कहा जाता है।

इसके अलावा, 23.3 प्रतिशत लोग अपर्याप्त आवास में रहते हैं, खासकर दाहोद, नर्मदा और छोटा उदेपुर जिलों में। इसके विपरीत, सूरत और अहमदाबाद जैसे शहरों में प्रति व्यक्ति आय देश में सबसे अधिक है। शहरी समृद्धि और ग्रामीण पिछड़ेपन का अंतर पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गया है।

पिछले पांच वर्षों में 7,269 MSME इकाइयाँ बंद हुईं, जिससे 33,000 से अधिक नौकरियाँ चली गईं। ग्रामीण इलाकों से मजदूरों का पलायन लगातार जारी है — वे या तो औद्योगिक क्षेत्रों में जा रहे हैं या अन्य राज्यों में काम की तलाश कर रहे हैं।

विकास, लेकिन समावेश के बिना

गुजरात में गरीबी की तीव्रता भले घट रही हो, लेकिन गरीबी अनुपात के मामले में यह तेलंगाना, महाराष्ट्र और तमिलनाडु से पीछे है। औद्योगीकरण के लाभ समान रूप से नहीं पहुंचे। औपचारिक क्षेत्र में रोजगार सीमित हैं और वेतन असमानताएं गहरी हैं।

श्रम बाजार सक्रिय है, लेकिन उसमें अनौपचारिकता और सामाजिक सुरक्षा की कमी प्रमुख है। उत्पादन-आधारित नीति ने मानव विकास को पीछे छोड़ दिया है।

‘गुजरात मॉडल’ की उलझनें

गुजरात का विरोधाभास यही है — आर्थिक चमक और मानवीय अभाव का सह-अस्तित्व। उद्योग, लॉजिस्टिक्स और निर्यात में सफलता के बावजूद स्वास्थ्य, शिक्षा और कल्याण में निवेश कम है।

नीति आयोग के सतत विकास लक्ष्य (SDG) सूचकांक के अनुसार, गुजरात “उद्योग, नवाचार और बुनियादी ढांचे” में मजबूत है, लेकिन “भूखमुक्ति” और “स्वास्थ्य” जैसे लक्ष्यों पर पिछड़ा है। यह दिखाता है कि केवल आर्थिक विस्तार से सामाजिक समानता नहीं आती।

आगे की राह — विकास से समावेशन की ओर

अब गुजरात की असली चुनौती नई फैक्टरियाँ या हाईवे बनाना नहीं, बल्कि मानव पूंजी का निर्माण है। राज्य की राजकोषीय ताकत और औद्योगिक संपन्नता को पोषण, स्वास्थ्य, आवास और शिक्षा की ओर मोड़ने की जरूरत है।

भूपेंद्र पटेल सरकार का यह बड़ा फेरबदल अल्पकालिक प्रशासनिक राहत दे सकता है, लेकिन यह गुजरात के गहरे विभाजन को नहीं भर पाएगा। जब तक शासन समावेशी विकास की दिशा में नहीं बढ़ता, “गुजरात मॉडल” एक चेतावनी की कहानी बन सकता है — ऐसी सफलता जिसकी जड़ें सामाजिक असमानता में हैं।

वह राज्य जो खुद को भारत की विकास प्रयोगशाला कहता है, अब उसे सामाजिक समानता की प्रयोगशाला भी बनना होगा। ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं को सशक्त करना, पोषण योजनाओं को मजबूत करना, गुणवत्तापूर्ण रोजगार सृजित करना और यह सुनिश्चित करना कि समृद्धि केवल बंदरगाहों और औद्योगिक गलियारों तक सीमित न रहे — यही गुजरात का अगला चरण होना चाहिए।

गुजरात की कहानी आज भी विरोधाभासों से भरी है — जहाँ एक ओर चमचमाती एक्सप्रेसवे हैं, वहीं दूसरी ओर कुपोषित बच्चे; जहाँ राजनीतिक स्थिरता है, वहीं सामाजिक नाजुकता। यह बड़ा फेरबदल शायद एक गहरे आत्ममंथन की शुरुआत भर है — उस अधूरे विकास एजेंडा से निपटने की, जिसे अब तक नजरअंदाज किया गया है।

(प्रो. शिवाजी सरकार वरिष्ठ पत्रकार और मीडिया कार्यकर्ता हैं। वे वित्तीय और आर्थिक विषयों के विश्लेषण में विशेषज्ञ हैं।)

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