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सैयद ख़ालिक़ अहमद

नई दिल्ली | शनिवार | 10  जनवरी 2026

भारत के संवैधानिक मूल्यों के भविष्य को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच, शनिवार को पत्रकारों, वकीलों, राजनीतिक विश्लेषकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने संविधान क्लब ऑफ़ इंडिया में एकत्र होकर धर्मनिरपेक्षता और संवैधानिक नैतिकता की रक्षा के लिए मज़बूत आह्वान किया।
गणराज्य का पुनर्निर्माण: भारत में संवैधानिक नैतिकता की पुनर्स्थापना” शीर्षक से आयोजित इस सार्वजनिक संवाद का उद्देश्य भारतीय संविधान की प्रस्तावना में ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘समाजवादी’ शब्दों के शामिल किए जाने की वर्षगांठ को स्मरण करना था।

‘हम भारत के लोग’ नामक सामूहिक मंच द्वारा आयोजित यह कार्यक्रम तीखी आलोचना, ऐतिहासिक विमर्श और राजनीतिक चेतावनी का केंद्र बना। वक्ताओं ने आगाह किया कि कानूनी और संस्थागत तरीकों से संवैधानिक मूल्यों का सुनियोजित क्षरण किया जा रहा है।

वरिष्ठ पत्रकार क़ुरबान अली ने भारत की बहुलतावादी विरासत की याद दिलाते हुए चर्चा की दिशा तय की। उन्होंने कहा, “भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम बहादुर शाह ज़फ़र के नेतृत्व में हुआ, जबकि अंतिम चरण महात्मा गांधी के नेतृत्व में था। यह निरंतरता देश के समावेशी चरित्र को दर्शाती है।” नागरिक शिक्षा के महत्व पर ज़ोर देते हुए उन्होंने कहा कि बच्चों को स्कूलों में संविधान की प्रस्तावना पढ़ाई जानी चाहिए ताकि वे संवैधानिक मूल्यों में रचे-बसे ज़िम्मेदार नागरिक बन सकें। उन्होंने दृढ़ता से कहा, “यह देश धर्मनिरपेक्ष था, है और रहेगा।”

कार्यक्रम में सबसे सशक्त हस्तक्षेप वरिष्ठ सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता अवनी बंसल का रहा। उन्होंने चेतावनी दी, “कोई भी तानाशाह खुलकर यह नहीं कहता कि वह संविधान बदल रहा है। तानाशाह संविधान को क़ानूनों के ज़रिये धीरे-धीरे बदलते हैं।” उन्होंने आरोप लगाया कि संवैधानिक सिद्धांतों को चरणबद्ध तरीके से कमजोर किया जा रहा है और नागरिकों से सतर्क रहने का आग्रह किया। उन्होंने कहा, “उस दिन का इंतज़ार मत कीजिए जब संविधान औपचारिक रूप से संशोधित किया जाएगा। यह प्रक्रिया पहले से चल रही है। संविधान की रक्षा हम सबकी ज़िम्मेदारी है।” इस पर श्रोताओं ने तालियों से समर्थन जताया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए सामाजिक कार्यकर्ता और टिप्पणीकार शहनवाज़ आलम ने संवैधानिक जागरूकता को बढ़ावा देने के प्रति सरकार की उदासीनता की आलोचना की। उन्होंने कहा, “देशभर में संवैधानिक कार्यक्रम आयोजित करना सरकार की ज़िम्मेदारी है, लेकिन वह ऐसा नहीं करेगी।” इंदिरा गांधी के कार्यकाल में प्रस्तावना में ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द जोड़े जाने का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि उन्होंने अपने जीवन की क़ीमत पर भी धर्मनिरपेक्षता की रक्षा की। “उन्हें अपनी सुरक्षा के लिए धार्मिक आधार पर भेदभाव करने की सलाह दी गई थी, लेकिन उन्होंने ऐसा करने से इंकार कर दिया,” उन्होंने कहा।

आलम ने राजनीतिक ध्रुवीकरण के डर को भी चुनौती दी। उन्होंने कहा, “लोग कहते हैं कि बोलने से समाज ध्रुवीकृत हो जाएगा। ऐसे छल को जहाँ भी हो, बेनक़ाब किया जाना चाहिए।” जवाहरलाल नेहरू के पहले चुनाव अभियान का उल्लेख करते हुए उन्होंने याद दिलाया कि नेहरू ने विभाजन से बुरी तरह प्रभावित जालंधर से अपने अभियान की शुरुआत करते हुए एक प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष भारत के लिए खुलेआम वोट माँगे थे। उन्होंने ज़ोर देकर कहा, “हमें धर्मनिरपेक्ष भारत के लिए वोट माँगने का साहस दिखाना होगा।”

वरिष्ठ पत्रकार पंकज श्रीवास्तव ने संविधान की समतामूलक दृष्टि पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा, “संविधान हम सबको समान नागरिक के रूप में देखता है। वह हमें सबसे पहले नागरिक की तरह व्यवहार करना सिखाता है। इस विचार को पुनर्स्थापित करना समय की आवश्यकता है।”

एक अन्य वरिष्ठ पत्रकार प्रशांत टंडन ने संवैधानिक मजबूती की नींव के रूप में समावेशिता पर ज़ोर दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रस्तावना से ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘समाजवादी’ शब्दों को हटाने के लगातार प्रयास हो रहे हैं। उन्होंने कहा, “लोगों और राजनीतिक दलों को ऐसे प्रयासों का लगातार विरोध करना चाहिए। आज का कार्यक्रम उसी प्रतिरोध का हिस्सा है।”

राजनीतिक जवाबदेही पर सवाल उठाते हुए नेशनल फेडरेशन ऑफ़ यूथ मूवमेंट (NFYM) के अध्यक्ष मसीहउज्जमा अंसारी ने कथित अन्याय के मामलों में विपक्ष की चुप्पी पर चिंता जताई। उन्होंने पूछा, “जब नागरिकों पर अत्याचार होता है, तब विपक्ष कहाँ होता है? वह सड़कों पर क्यों नहीं दिखता?” उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका बेहद अहम होती है, खासकर तब जब संविधान की मूल भावना ख़तरे में हो।

कार्यक्रम में हेमंत प्रधान, मुदस्सिर शम्स, रूबी अरुण, शरद जायसवाल, तमजीद अहमद, शिवराम वाल्मीकि, शोएब ख़ान, दीपक छोटीवाला, आरिफ़ अली तुर्क, मसूद ख़ान, शहनवाज़ ख़ान, शम्सुल हसन और मिस्बाहुल हक़ सहित कई अन्य वक्ताओं ने भी संवैधानिक मूल्यों, सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक ज़िम्मेदारी पर अपने विचार रखे।

इस अवसर पर जन विमर्श और लोकतांत्रिक सहभागिता में योगदान देने वाले प्रतिष्ठित पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को सम्मानित भी किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य समकालीन भारत में संवैधानिक नैतिकता की प्रासंगिकता पर गहन चिंतन को प्रोत्साहित करना और लोकतांत्रिक संस्थाओं को मज़बूत करने के तरीकों पर विचार करना था।

संवाद का संचालन डॉ. मोहम्मद ख़ालिद ख़ान ने किया। कार्यक्रम की शुरुआत राष्ट्रगान से हुई और समापन संविधान की प्रस्तावना के सामूहिक पाठ के साथ हुआ, जिसमें न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व—भारतीय गणराज्य के मूल आदर्शों—के प्रति प्रतिबद्धता दोहराई गई।

 

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