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डॉ. सतीश मिश्रा

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नई दिल्ली | शनिवार | 8 नवंबर 2025

विश्वविद्यालय—जहाँ विचारों की आज़ादी, अकादमिक विमर्श और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का सम्मान होना चाहिए—वहीं इन दिनों दिल्ली विश्वविद्यालय में एक अजीब और चिंताजनक दृश्य देखने को मिल रहा है। यहाँ अब मानवाधिकार नहीं, बल्कि “गौरक्षा अधिकार” ज़्यादा प्रभावी हो गए लगते हैं।

देश की राजधानी के इस प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में इन दिनों ऐसा विवाद खड़ा हो गया है जो शिक्षण संस्थानों की गरिमा पर ही सवाल उठाता है। हाल ही में विश्वविद्यालय प्रशासन ने अपने सभी कॉलेजों को निर्देश दिया कि वे एक आगामी सम्मेलन में भाग लें जिसका विषय था — “गाय और भारतीय संस्कृति”।

पहली नज़र में यह सामान्य लग सकता है, पर असल विवाद तब शुरू हुआ जब इस आयोजन को विश्वविद्यालय की शैक्षणिक गतिविधियों से जोड़ने की बजाय एक धार्मिक और राजनीतिक रंग देने की कोशिशें दिखाई देने लगीं। कई शिक्षकों ने आपत्ति जताई कि यह शैक्षणिक विमर्श नहीं, बल्कि एक तरह से “गौ-राजनीति” को शिक्षा परिसर में लाने की कवायद है।

शिक्षक संघों और छात्रों ने सवाल उठाया कि जब विश्वविद्यालय में शिक्षकों की कमी, अनुसंधान के लिए संसाधनों की तंगी, और अधोसंरचना की बदहाली जैसी समस्याएँ बनी हुई हैं, तो गाय पर सम्मेलन आयोजित करने की यह हड़बड़ी क्यों? क्या यह अकादमिक प्राथमिकताओं से भटकना नहीं है?

एक कॉलेज के शिक्षक ने तीखा सवाल किया — “क्या अब हमारे पाठ्यक्रम में भी गौ-चरित्र या गौ-नीति जोड़ी जाएगी?” जबकि एक अन्य ने व्यंग्य किया कि “लाइब्रेरी के बजाय शायद अब गौशाला विश्वविद्यालय की पहचान बन जाए।”

प्रशासनिक पक्ष से यह तर्क दिया गया कि यह कार्यक्रम भारत की परंपरा और संस्कृति के प्रति जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से है। पर सवाल यह है कि क्या विश्वविद्यालयों का काम धार्मिक प्रतीकों की महिमा गाना है या वैज्ञानिक दृष्टिकोण और तर्कसंगत विचारों का विकास करना?

इस विवाद का एक और पहलू भी है—इसमें असहमति जताने वालों को “असंस्कारी” और “पशु विरोधी” करार दिया जा रहा है। यही लोकतांत्रिक और शैक्षणिक विमर्श के लिए सबसे खतरनाक संकेत है। विश्वविद्यालयों का अस्तित्व इसीलिए होता है कि वहाँ मतभेद, बहस और आलोचना की गुंजाइश बनी रहे।

दुखद यह है कि इस पूरे प्रकरण में विश्वविद्यालय प्रशासन की भूमिका रक्षक से अधिक प्रचारक की लग रही है। यह वही विश्वविद्यालय है जिसने कभी विज्ञान, समाजशास्त्र और मानवीय अध्ययन में देश को दिशा दी थी। आज वही विश्वविद्यालय “अकादमिक स्वतंत्रता बनाम धार्मिक प्रतीकवाद” की लड़ाई का मैदान बन गया है।

इस विवाद ने एक बुनियादी सवाल खड़ा कर दिया है—क्या भारत के विश्वविद्यालय अब विचारों के मंदिर रहेंगे या आस्था के अखाड़े बनते जाएंगे?

गाय भारतीय जीवन और संस्कृति का हिस्सा रही है, इसमें कोई दो राय नहीं। पर जब गाय को शिक्षा से ऊपर रखा जाने लगे, तब यह केवल परंपरा नहीं, बल्कि तर्क और विवेक की हार बन जाती है।

अगर विश्वविद्यालयों में अब “गाय की पूजा” पर चर्चा ज्यादा होगी और “विज्ञान की प्रगति” पर कम, तो यह भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं है। शिक्षा संस्थान किसी विचारधारा या धार्मिक भावना के विस्तारक नहीं, बल्कि स्वतंत्र सोच के प्रयोगशाला होने चाहिए।

आज जरूरत है कि विश्वविद्यालय अपनी मूल भूमिका याद करें — आलोचनात्मक चिंतन, तथ्य आधारित अध्ययन और मुक्त अभिव्यक्ति का पोषण।

वरना आने वाले समय में शायद हमें यह मानने के लिए मजबूर होना पड़ेगा कि भारत में “कक्षा” नहीं, “काष्ठ” यानी गौशाला अधिक पवित्र हो गई है।

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