इस साल की दीवाली एक सुखद समाचार लेकर आई है—न केवल भारत में बल्कि उस पश्चिमी दुनिया में भी, जहाँ से इस्लामोफ़ोबिया की शुरुआत हुई थी, अब इस प्रवृत्ति के कमजोर पड़ने के संकेत दिखाई दे रहे हैं।
दरअसल, इस्लामोफ़ोबिया केवल सांस्कृतिक या धार्मिक असहिष्णुता नहीं है। यह कोई मात्र ऐतिहासिक शिकायतों का परिणाम नहीं, बल्कि एक सोचा-समझा आर्थिक और राजनीतिक षड्यंत्र है, जिससे पूंजीवादी पश्चिम और भारत के हिंदू व्यापारी वर्ग को लाभ मिलता है। अपने व्यावसायिक हितों को ये लोग आधे सच और आधे झूठ के आवरण में छिपाते हैं, जिसका आज की दुनिया से कोई वास्तविक संबंध नहीं है।
भारत में मुसलमानों के खिलाफ नफ़रत फैलाने वाली राजनीति को नई पीढ़ी के राजनीतिक नेतृत्व ने चुनौती दी है। यह पीढ़ी मूल्य नियंत्रण, रोजगार के अवसर, सस्ती शिक्षा और कमजोर वर्गों व अल्पसंख्यकों के प्रति न्यायसंगत व्यवहार जैसे वास्तविक मुद्दों पर बल दे रही है। वहीं पश्चिम में यह चुनौती एक अप्रत्याशित दिशा से आई है—एक युवा भारतीय मूल के नेता ज़ोहरान ममदानी से, जो न्यूयॉर्क के मेयर चुनाव में दोनों प्रमुख दलों—रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक—के स्थापित नेताओं को चुनौती देकर अग्रणी उम्मीदवार बन गए हैं।
ज़ोहरान की जड़ें भारत में हैं। उनके पिता मुस्लिम और माता हिंदू हैं, जो पहले अफ्रीका और बाद में अमेरिका जाकर बसे। ज़ोहरान की लोकप्रियता का एक कारण यह भी है कि वे प्रधानमंत्री मोदी और पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप दोनों के प्रखर आलोचक हैं।
पिछले रविवार को ज़ोहरान ममदानी के भाषण ने इस्लामोफ़ोबिया के अंत की घंटी बजा दी। यह वह मोड़ है, जिसकी प्रतीक्षा लंबे समय से थी। अमेरिका ने खाड़ी युद्धों के बाद और तथाकथित “वॉर ऑन टेरर” के नाम पर बीते तीन दशकों में मुस्लिम देशों पर जो युद्ध और प्रचार अभियान चलाए, उन्होंने इस्लाम के खिलाफ घृणा का वैश्विक वातावरण तैयार किया।
दिलचस्प बात यह है कि भारत का आरएसएस-भाजपा तंत्र भले ही खुद को हिंदू संस्कृति का रक्षक बताता हो, पर उसकी राजनीतिक सोच और संगठनात्मक पद्धति नाज़ी जर्मनी और आधुनिक ईसाई पश्चिम से प्रेरित है। उनकी ‘मुस्लिम-विरोधी मुहिम’ अमेरिकी कॉरपोरेट सत्ता संरचना की नकल है।
अमेरिका ने ‘अशिक्षित, दाढ़ी वाले आतंकवादी’ को मुसलमानों का चेहरा बनाकर पूरी दुनिया में इस्लाम की गलत छवि पेश की। हकीकत में ये उग्रपंथी मुसलमानों की विशाल आबादी का नगण्य हिस्सा हैं, परंतु उन्हें प्रतीक बनाकर अरबों आम, शांतिप्रिय मुसलमानों को संदेह और नफ़रत का निशाना बना दिया गया।
तीन दशकों से मुसलमान, खासकर भारत जैसे देशों में रहने वाले, घरेलू और अंतरराष्ट्रीय भेदभाव के शिकार बने हुए हैं—उन घटनाओं और व्यक्तियों के कारण जिनसे उनका कोई लेना-देना नहीं।
इस्लामोफ़ोबिया कभी आतंकवाद या तानाशाही के खिलाफ संघर्ष नहीं था; यह तो बहुसंख्यकवाद और नस्लवाद को वैध ठहराने का मुखौटा था।
आज जब ज़ोहरान ममदानी जैसे युवा मुस्लिम नेता अमेरिका के प्रतीक शहर न्यूयॉर्क में आत्मविश्वास के साथ चुनाव लड़ रहे हैं, तो यह न केवल इस्लामोफ़ोबिया के पतन का संकेत है, बल्कि एक नए साहस, दृष्टि और आत्मगौरव की घोषणा भी है।
यह विरोधाभास भी उल्लेखनीय है कि जहाँ विवेक रामास्वामी जैसे नेता अपने हिंदू होने से कतराते हैं, वहीं ज़ोहरान ममदानी खुले तौर पर अपनी पहचान पर गर्व करते हैं। यह आज के समय का संदेश है—हिंदुओं के लिए भी—कि उन्हें संकीर्ण भावनाओं से ऊपर उठकर विनम्रता, सहिष्णुता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना होगा।
युवा पीढ़ी को अब शाकाहार या धार्मिक प्रतीकों जैसे सतही मुद्दों से आगे बढ़कर आधुनिक युग की चुनौतियों का विवेकपूर्ण सामना करना चाहिए।
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