पारंपरिक मैक्रोइकॉनॉमिक मानकों के अनुसार, भारत को वित्तीय वर्ष 2026–27 (FY27) के बजट चक्र में अपेक्षाकृत आराम की स्थिति में प्रवेश करना चाहिए। आर्थिक वृद्धि 7 प्रतिशत से ऊपर बनी रहने की उम्मीद है, मुद्रास्फीति महामारी के बाद के शिखर से नीचे आ चुकी है और राजकोषीय समेकन भी मोटे तौर पर सही दिशा में दिखाई देता है, जिसमें राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद के लगभग 4.4 प्रतिशत तक सिमटने का अनुमान है। वैश्विक आर्थिक सुस्ती के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था का यह प्रदर्शन लचीलापन दर्शाता है।
लेकिन बजट केवल वर्तमान की तस्वीर नहीं होते, वे भविष्य के जोखिमों और दबावों का पूर्वानुमान लगाने का उपकरण भी होते हैं। सतही स्थिरता के नीचे कई गहरी संरचनात्मक कमजोरियाँ छिपी हैं, जिन्हें FY27 का बजट अनदेखा नहीं कर सकता। इनमें घरेलू बचत में गिरावट, सार्वजनिक व्यय की असंतुलित प्राथमिकताएँ, सुस्त विनिर्माण क्षेत्र, नाजुक निजी निवेश, बढ़ते बाहरी जोखिम और कम उत्पादकता में फंसी कृषि अर्थव्यवस्था शामिल हैं। स्थिरता का यह आभास कहीं ठहराव का पर्याय न बन जाए, यही सबसे बड़ा खतरा है। हाल के महीनों में मुद्रास्फीति का फिर से भारतीय रिज़र्व बैंक की सहनशीलता सीमा की ओर बढ़ना भी याद दिलाता है कि नीति-निर्माताओं के पास आत्मसंतोष की गुंजाइश बहुत कम है।
हाल के वर्षों में सरकार के राजस्व में सुधार अप्रत्यक्ष करों, बेहतर कर अनुपालन और स्थिर नाममात्र वृद्धि से हुआ है। किंतु मात्रा के साथ-साथ गुणवत्ता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। वित्त वर्ष 2024 में शुद्ध घरेलू वित्तीय बचत घटकर सकल घरेलू उत्पाद के लगभग 5.2 प्रतिशत पर आ गई, जो दशकों के निचले स्तरों में से एक है, जबकि घरेलू ऋण लगातार बढ़ रहा है। इसका अर्थ है कि राजस्व वृद्धि आंशिक रूप से ऐसे उपभोग पर टिकी है जो पर्याप्त बचत के बिना हो रहा है। यह आधार स्वभावतः अस्थिर है।
सरकार द्वारा हाल में अपनाए गए कुछ कदम इस दबाव को रेखांकित करते हैं। पान मसाला, सिगरेट और तंबाकू जैसे उत्पादों पर जीएसटी दर को बढ़ाकर 40 प्रतिशत करना तथा रेल किराए में वृद्धि से अतिरिक्त संसाधन जुटाना घाटे को नियंत्रित करने में सहायक हो सकता है, लेकिन यह भी संकेत देता है कि राजस्व के स्रोत सीमित होते जा रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने जिस “राजस्व निचोड़” की चेतावनी दी है, उसकी झलक यहां दिखाई देती है। इसलिए FY27 के बजट को उपभोग-आधारित कर संग्रह पर अत्यधिक निर्भरता से बचते हुए औपचारिक रोजगार, उत्पादक निवेश और आय सृजन के माध्यम से कर आधार को व्यापक करने पर ध्यान देना होगा।
वित्त वर्ष 2021 के बाद से सार्वजनिक व्यय का झुकाव पूंजीगत निवेश की ओर रहा है और केंद्रीय पूंजीगत व्यय 11 लाख करोड़ रुपये से ऊपर पहुँच चुका है। इससे सड़कों, रेल, बंदरगाहों और डिजिटल अवसंरचना को मजबूती मिली है। लेकिन खर्च की संरचना एक असंतुलन भी दिखाती है। मानव पूंजी—शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल और अनुसंधान—में निवेश अपेक्षाकृत कम बना हुआ है। शिक्षा पर खर्च जीडीपी के लगभग 3 प्रतिशत के आसपास अटका है, अनुसंधान एवं विकास पर व्यय 0.7 प्रतिशत से कम है और सीखने के परिणामों में अपेक्षित सुधार नहीं दिखता। केवल भौतिक ढांचा मजबूत करने से दीर्घकालिक उत्पादकता नहीं बढ़ेगी, जब तक कि श्रमशक्ति में समानांतर निवेश न हो।
विनिर्माण क्षेत्र भी अब तक वह गति नहीं पकड़ सका है जो एक व्यापक निजी निवेश चक्र को जन्म दे सके। उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन (पीएलआई) योजनाओं ने निवेश और रोजगार को बढ़ावा दिया है, लेकिन वे संपूर्ण औद्योगिक पुनरुद्धार का विकल्प नहीं बन सकतीं। हाल के पीएमआई आंकड़े बताते हैं कि नए ऑर्डर और उत्पादन वृद्धि की रफ्तार धीमी हो रही है। विनिर्माण को टिकाऊ बनाने के लिए स्पष्ट और स्थिर नियामक ढांचा, तेज़ मंजूरी, भरोसेमंद लॉजिस्टिक्स और समय पर सरकारी भुगतान अनिवार्य हैं। बजट में देरी से भुगतान पर दंडात्मक ब्याज, बकाया राशि का पारदर्शी प्रकटीकरण और एमएसएमई के लिए दीर्घकालिक निवेश को प्रोत्साहित करने वाली ऋण गारंटी योजनाएँ निजी पूंजी को सक्रिय कर सकती हैं।
वैश्विक परिदृश्य भी कम चुनौतीपूर्ण नहीं है। यदि अमेरिका में संरक्षणवादी टैरिफ नीतियाँ लौटती हैं, तो इस्पात, एल्युमीनियम, फार्मा और आईटी सेवाओं में भारत के निर्यात प्रभावित हो सकते हैं। कई मुक्त व्यापार समझौते अपेक्षित निर्यात लाभ नहीं दे पाए हैं, जिससे संकेत मिलता है कि समस्या केवल बाजार पहुंच की नहीं, बल्कि घरेलू प्रतिस्पर्धात्मकता की भी है। इसलिए FY27 के बजट में लॉजिस्टिक्स, गुणवत्ता मानकों, तकनीकी उन्नयन और पैमाने की अर्थव्यवस्था पर विशेष बल दिया जाना चाहिए।
कृषि की स्थिति और भी जटिल है। यह क्षेत्र जीडीपी का पाँचवां हिस्सा भी नहीं बनाता, लेकिन लगभग आधे कार्यबल को रोजगार देता है। कम उत्पादकता, अस्थिर आय और जलवायु जोखिम इसे अत्यंत संवेदनशील बनाते हैं। फिर भी सार्वजनिक समर्थन का बड़ा हिस्सा उत्पादक निवेश की बजाय सब्सिडी पर केंद्रित है। सिंचाई, भंडारण, फसल विविधीकरण और कृषि-प्रसंस्करण में निवेश के बिना ग्रामीण आय में स्थायी वृद्धि संभव नहीं होगी। कमजोर कृषि आय का सीधा असर खपत, बचत और समग्र आर्थिक स्थिरता पर पड़ता है।
सामाजिक सुरक्षा भी व्यापक आर्थिक स्थिरता से जुड़ी हुई है। स्वास्थ्य बीमा और आय सुरक्षा का सीमित कवरेज परिवारों को जोखिम लेने से रोकता है और बचत को दबाता है। एक ऐसी अर्थव्यवस्था जो उच्च निवेश और नवाचार पर निर्भर है, वह व्यापक असुरक्षा के साथ आगे नहीं बढ़ सकती। इसलिए स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा का विस्तार केवल कल्याणकारी कदम नहीं, बल्कि दीर्घकालिक विकास की शर्त है।
भारत किसी तात्कालिक राजकोषीय संकट के मुहाने पर नहीं है। चुनौती अधिक सूक्ष्म, लेकिन अधिक दूरगामी है—क्या FY27 का बजट मौजूदा स्थिरता को व्यापक और टिकाऊ विकास में बदल पाएगा? इसके लिए मानव पूंजी और उत्पादकता पर खर्च बढ़ाना, निजी निवेश की बाधाएँ हटाना, बाहरी झटकों के लिए तैयारी करना और कृषि तथा अनुसंधान जैसे उपेक्षित क्षेत्रों को प्राथमिकता देना आवश्यक होगा। असली परीक्षा समुच्चय को संभालने की नहीं, बल्कि नींव को मजबूत करने की है। FY27 का बजट यही बताएगा कि भारत अल्पकालिक आराम से आगे बढ़कर अपने दीर्घकालिक विकास पथ की संरचनात्मक चुनौतियों का सामना करने के लिए कितना तैयार है।
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