बेंगलुरु में हाल ही में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत का भाषण — “सौ वर्ष की संघ यात्रा: नए क्षितिज” — गंभीर विवेचना का विषय है। यह व्याख्यान संघ की शताब्दी यात्रा के मूल्यांकन के रूप में प्रस्तुत किया गया, परंतु वस्तुतः यह संघ की घटती विश्वसनीयता को बचाने का एक बड़ा जनसंपर्क और छवि-निर्माण अभियान प्रतीत हुआ।
दशकों से आरएसएस स्वयं को राष्ट्र का नैतिक और सांस्कृतिक दिशा-सूचक बताता रहा है। किंतु भागवत का भाषण आधे-अधूरे सच, चयनात्मक स्मृति-लोप और ऊँचे दावों से भरा था, जिनका यथार्थ से मेल कम ही दिखा। उनका यह कहना कि “भारत में कोई अहिंदू नहीं है” और “सभी — हिंदू, मुस्लिम, ईसाई — एक ही पूर्वज और संस्कृति के वंशज हैं,” सुनने में भले ही आकर्षक लगा, पर यह बात खोखली प्रतीत हुई। इस तरह का भाषण चाहे कितना भी सुगठित क्यों न हो, वह संघ की उस विभाजनकारी राजनीति को ढक नहीं सकता जो उसके वैचारिक विस्तार — भाजपा — के माध्यम से समाज में फैल चुकी है।
वास्तविकता पर परदा
जब भागवत ने कहा कि “गैर-हिंदू शायद यह नहीं जानते या उन्हें भुला दिया गया है” कि वे भी इसी परंपरा के अंग हैं, तो उन्होंने दोष दूसरों पर डाल दिया। उनका यह कहना कि “सचेत या अचेत रूप से, सभी भारतीय संस्कृति का ही पालन करते हैं,” संघ की उस छवि को सुधारने का प्रयास था जो वर्षों की नफरत फैलाने वाली राजनीति, मॉब लिंचिंग, “लव जिहाद” अभियानों और भाजपा शासित राज्यों के धर्मांतरण-विरोधी कानूनों के कारण निर्मित हुई है।
उनका यह आग्रह कि “हर हिंदू को समझना चाहिए कि वह हिंदू है, क्योंकि हिंदू होना भारत के प्रति जिम्मेदार होना है,” हिंदू पहचान को राष्ट्रवाद के साथ जोड़ने की पुरानी संघीय रणनीति को दोहराता है। परंतु शब्दों और कर्मों के बीच का विरोधाभास स्पष्ट है। शाखाओं में दिया जाने वाला रोज़ का प्रशिक्षण अल्पसंख्यकों को संदेह और विरोध की दृष्टि से देखने की प्रवृत्ति को ही पोषित करता है।
चयनात्मक इतिहास और सुविधाजनक विस्मृति
भागवत का यह दावा कि “ब्रिटिशों ने हमें राष्ट्र नहीं दिया” और भारत की “मूल संस्कृति हिंदू है”, ऐतिहासिक तथ्यों से मेल नहीं खाता। “हिंदू” शब्द स्वयं विदेशी यात्रियों द्वारा सिंधु नदी के पार रहने वाले लोगों के लिए प्रयुक्त हुआ था। भारत की वास्तविक आध्यात्मिक आत्मा सनातन है, न कि “हिंदुत्व” — जो समावेशन नहीं, बल्कि बहिष्करण का राजनीतिक औज़ार है।
इतना ही नहीं, भागवत का यह कहना कि “हिंदू राष्ट्र” संविधान के अनुरूप है और “सनातन धर्म ही हिंदू राष्ट्र है,” भी भ्रामक है। वे यह भूल गए कि संघ ने आरंभिक वर्षों में संविधान का विरोध किया था और 1970 के दशक तक अपने कार्यालयों पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने से भी इंकार किया। केवल तब, जब सरकार ने कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी, संगठन ने सार्वजनिक रूप से संविधान-निष्ठा का दावा किया।
राजनीति से असंबद्धता का दावा
भागवत ने कहा कि आरएसएस “नीतियों का समर्थन करता है, राजनीति का नहीं,” और भाजपा से किसी प्रकार का नियंत्रण न होने की बात कही। किंतु यह सर्वविदित है कि संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ता सरकार के नियुक्तियों, तबादलों और उम्मीदवार चयन तक में प्रभाव डालते हैं। भाजपा के लगभग हर बड़े निर्णय — चाहे वह मंत्रिमंडल पुनर्गठन हो या राज्य नेतृत्व का चयन — में संघ की भूमिका स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है।
उन्होंने यह भी कहा कि राम मंदिर मुद्दे पर संघ ने भाजपा का समर्थन “नीति के अनुरूपता” के कारण किया, न कि राजनीतिक निष्ठा से। यहां तक कहा कि “यदि कांग्रेस ने समर्थन किया होता तो हमारे स्वयंसेवक उसके लिए भी मतदान करते।” यह कथन उस संगठन की दोहरी नीति को ही पुष्ट करता है जो परदे के पीछे से राजनीति नियंत्रित करता है पर सार्वजनिक रूप से स्वयं को निष्पक्ष बताता है।
दिखावटी समावेशन
जब उनसे पूछा गया कि क्या मुसलमान या ईसाई संघ में शामिल हो सकते हैं, तो उनका उत्तर था — “कोई भी जाति या मजहब से बाहर नहीं रखा गया है, बशर्ते वे अपनी अलग पहचान को बाहर छोड़ दें।” यह सशर्त समावेशन संघ की मूल समस्या को उजागर करता है — भारत की बहुलतावादी पहचान को स्वीकार न कर पाने की अक्षमता। भागवत की शब्दावली में “सहनशीलता” का अर्थ है — “हिंदू सांस्कृतिक ढांचे के अनुरूप बनो।”
उनका यह कहना कि “हम किसी से नहीं पूछते कि वे कौन हैं,” संघ के अल्पसंख्यक-विरोधी अभियानों की पृष्ठभूमि में खोखला लगता है। ऐसी बयानबाज़ी दशकों से चले आ रहे सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और हिंसा के दाग को नहीं मिटा सकती, जिन्हें “सांस्कृतिक राष्ट्रवाद” के नाम पर वैध ठहराया गया।
जवाबदेही से ऊपर संगठन
भागवत ने आलोचकों को यह भी याद दिलाया कि आरएसएस कोई पंजीकृत संस्था नहीं है, बल्कि “व्यक्तियों का समूह” है जिसे कानून ने मान्यता दी है। उन्होंने कहा, “अगर हम नहीं होते, तो सरकार ने किसे प्रतिबंधित किया था?” पर वे यह नहीं बोले कि पंजीकरण न होने से संगठन सार्वजनिक वित्तीय लेखा-परीक्षा से बच जाता है। विडंबना यह है कि जहाँ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आरएसएस को “दुनिया का सबसे बड़ा एनजीओ” बताया, वहीं भागवत कहते हैं कि इसे किसी पंजीकरण की आवश्यकता नहीं — यह विरोधाभास अब तक अनुत्तरित है।
विविधता के बिना एकता?
भागवत ने अपने भाषण में कहा, “हमारी परंपरा विविधता को बिना नष्ट किए एकता रचने की है। विविधता एकता का आभूषण है।” यह कथन आदर्श तो है, पर ज़मीनी हकीकत इसके विपरीत है। आज समाज धर्म, जाति और विचारधाराओं के आधार पर पहले से अधिक विभाजित है — और इस विभाजन में संघ की सोच की भूमिका असंदिग्ध है।
कलंकित विरासत
भागवत के ये वक्तव्य ऐसे समय आए जब आरएसएस और कांग्रेस के बीच टकराव फिर तेज़ हुआ है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की यह टिप्पणी कि “आरएसएस पर प्रतिबंध लगना चाहिए” संघ के नेताओं को नागवार गुज़री। भागवत ने प्रतिक्रिया में कहा कि “विरोध होने पर संघ और मज़बूत होता है।” संख्या-बल के लिहाज़ से यह सही हो सकता है, परंतु नैतिक अधिकार प्रचार और विरोधाभासों के सहारे नहीं बनता।
राष्ट्रसेवा और एकता की ऊँची बातें करने वाला संघ आज व्यापक रूप से सत्ता के दलाल के रूप में देखा जा रहा है, न कि नैतिक शक्ति के प्रतीक के रूप में। जिस भाजपा सरकार को उसने पोषित किया, वही अब भाई-भतीजावाद, भ्रष्टाचार और दमन की पहचान बन चुकी है। जो संघ कभी निस्वार्थ अनुशासन का प्रतीक था, वही अब सत्ता और विशेषाधिकारों के जाल में उलझा दिखता है।
एक वरिष्ठ भाजपा नेता ने निजी बातचीत में कटाक्ष किया — “अब आरएसएस-भाजपा जगत में ‘कंचन और काया’ का ही शासन है।” प्रश्न यह है कि क्या भागवत में इतना साहस है कि वे इसे नकार सकें — या कभी स्वतंत्र प्रेस का सामना बिना स्क्रिप्ट के कर सकें?
(डॉ. सतीश मिश्र वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं। वे ऑब्ज़र्वर रिसर्च
फाउंडेशन में सीनियर फेलो रह चुके हैं।)
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