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डॉ सलीम खान

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नई दिल्ली | शनिवार | 18 अक्टूबर 2025

क्षिण एशिया की शतरंज पर नई चालें — तालिबान, चीन, पाकिस्तान और भारत का पुनर्संतुलन

अफ़ग़ानिस्तान एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में है। कभी ‘ग्रेट गेम’ का मैदान रहा यह देश आज अमेरिका की वापसी, तालिबान की सत्ता, चीन की बढ़ती दखलंदाज़ी और भारत की नई कूटनीतिक सक्रियता का संगम बन गया है। बीते कुछ महीनों में काबुल और नई दिल्ली के बीच संपर्कों में जो हलचल दिखी है, उसने यह संकेत दिया है कि भारत अब अपने पारंपरिक संकोचों से बाहर आ रहा है और अफ़ग़ान सवाल पर व्यावहारिक नीति अपनाने की कोशिश कर रहा है।

तालिबान का बदला चेहरा या बदला एजेंडा?

तालिबान के शासन को अब चार वर्ष होने को हैं। 2021 में अमेरिका की अफ़ग़ानिस्तान से वापसी के बाद यह संगठन सत्ता में तो आ गया, लेकिन वैधता का संकट उसके गले की हड्डी बना रहा। महिलाएं, शिक्षा, मानवाधिकार और अल्पसंख्यक — इन सवालों पर तालिबान की नीति आज भी पुराने दौर जैसी कठोर और अस्वीकार्य है।

 

लेख एक नज़र में
अफ़ग़ानिस्तान एक बार फिर वैश्विक भू-राजनीति का केंद्र बन गया है, जहाँ तालिबान, चीन, पाकिस्तान और भारत के बीच नया शक्ति-संतुलन उभर रहा है। 2021 में अमेरिका की वापसी के बाद तालिबान सत्ता में तो आ गया, लेकिन वैधता और आर्थिक समर्थन की कमी उसकी सबसे बड़ी चुनौती बनी रही।
कठोर नीतियों के बावजूद तालिबान अब भारत, रूस और चीन जैसे देशों से जुड़ाव बढ़ाने का प्रयास कर रहा है। चीन आर्थिक निवेश के माध्यम से प्रभाव बढ़ाना चाहता है, जबकि पाकिस्तान स्वयं तालिबान समर्थित गुटों से असहज है। भारत, जो पहले विकास परियोजनाओं के माध्यम से ‘सॉफ्ट पॉवर’ दिखाता था, अब व्यावहारिक कूटनीति की ओर लौट रहा है ताकि अफ़ग़ानिस्तान पूरी तरह चीन-पाक धुरी में न फिसले।
सुरक्षा, महिला अधिकार और क्षेत्रीय स्थिरता भारत की प्रमुख चिंताएँ हैं। बदलते एशियाई समीकरणों में अफ़ग़ानिस्तान एक रणनीतिक परीक्षण-स्थल बन चुका है, जहाँ संवाद और संतुलन ही स्थिरता का मार्ग हो सकते हैं।

 

फिर भी, तालिबान यह भलीभांति जानता है कि अंतरराष्ट्रीय समर्थन के बिना अफ़ग़ानिस्तान की अर्थव्यवस्था चलाना असंभव है। यही कारण है कि काबुल अब भारत, रूस, चीन और ईरान जैसे देशों के साथ नज़दीकी बनाने की कोशिश कर रहा है।

तालिबान के वरिष्ठ प्रतिनिधियों की हाल की भारत-भ्रमण यात्रा को इसी क्रम में देखा जा रहा है। दिल्ली में भले इसे “ट्रैक-टू डिप्लोमेसी” कहा गया हो, लेकिन यह साफ़ है कि अफ़ग़ान सरकार भारत के साथ सीधा संवाद चाहती है।

भारत की रणनीति में व्यावहारिक मोड़

भारत लंबे समय तक अफ़ग़ानिस्तान में लोकतांत्रिक संस्थाओं और विकास परियोजनाओं का समर्थक रहा है। काबुल से लेकर कंधार तक भारत ने सड़कों, बांधों, संसद भवन और अस्पतालों का निर्माण किया — यह ‘सॉफ्ट पावर’ भारत की सबसे बड़ी पूँजी रही। लेकिन तालिबान की वापसी के बाद नई दिल्ली ने शुरुआती झिझक में अपने मिशन बंद कर दिए और प्रतीक्षा की नीति अपनाई।

अब परिस्थितियाँ बदल रही हैं। तालिबान की सत्ता स्थिर होती दिख रही है, और अफ़ग़ान भूभाग में चीन-पाकिस्तान की पकड़ मज़बूत होती जा रही है। इन दोनों के साझा हित न केवल सुरक्षा बल्कि आर्थिक विस्तार से भी जुड़े हैं — विशेषकर बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव के तहत।

भारत समझ गया है कि यदि उसने सक्रिय भूमिका नहीं निभाई, तो अफ़ग़ानिस्तान पूरी तरह चीन-पाकिस्तान धुरी में समा जाएगा। यही कारण है कि भारत अब अपने पुराने निवेश और संपर्कों को धीरे-धीरे पुनर्जीवित करने की कोशिश में है।

काबुल के रास्ते बीजिंग और इस्लामाबाद की भूमिका

अफ़ग़ानिस्तान आज चीन के लिए अवसरों का देश है — खनिज संपदा, रणनीतिक स्थिति और मध्य एशिया तक पहुंच का द्वार। चीन ने तालिबान शासन को औपचारिक मान्यता तो नहीं दी है, लेकिन आर्थिक सहयोग के नाम पर वह लगातार जाल बुन रहा है।

पाकिस्तान, जो कभी तालिबान का सबसे बड़ा संरक्षक था, अब खुद उसके हाथों असहज महसूस कर रहा है। टीटीपी (तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान) की गतिविधियाँ इस्लामाबाद के लिए सिरदर्द बन चुकी हैं।

इन हालात में चीन और पाकिस्तान दोनों चाहते हैं कि तालिबान कुछ हद तक अंतरराष्ट्रीय स्वीकृति पा ले ताकि अफ़ग़ानिस्तान स्थिर दिखे और उनके आर्थिक हित सुरक्षित रहें।

अमेरिका की वापसी और उसका साया

अमेरिका की वापसी के चार साल बाद भी वाशिंगटन अफ़ग़ान संकट से पूरी तरह बाहर नहीं है। वह अब भी आतंकवाद, मानवाधिकार और नशीले पदार्थों के नियंत्रण के सवाल पर तालिबान पर दबाव बनाए हुए है। लेकिन अमेरिका का प्रभाव घटा है और उसका ध्यान अब चीन-प्रतिरोध की नीति पर केंद्रित है।

इस पृष्ठभूमि में भारत के लिए अवसर और चुनौती दोनों हैं — एक ओर अमेरिका भारत को क्षेत्रीय संतुलन के लिए उपयोगी साझेदार मानता है, दूसरी ओर अफ़ग़ान प्रश्न पर भारत को स्वायत्त नीति रखनी होगी ताकि उसकी छवि किसी पश्चिमी ब्लॉक की ‘एक्सटेंशन’ न बन जाए।

भारत के सामने चुनौतियाँ

अफ़ग़ानिस्तान में भारत की सबसे बड़ी पूँजी उसकी ‘नैतिक वैधता’ रही है — भारत को वहाँ कभी भी आक्रामक या हस्तक्षेपकारी ताक़त के रूप में नहीं देखा गया। अफ़ग़ान जनता आज भी भारतीय सहायता परियोजनाओं और शिक्षा-स्वास्थ्य में भारत की भूमिका को याद करती है।

लेकिन नई स्थिति में यह भरोसा तभी टिक सकता है जब भारत तालिबान से संवाद करते हुए भी अपने मूल्यों से समझौता न करे।

महिला शिक्षा, अल्पसंख्यक सुरक्षा, और मानवाधिकार जैसे मुद्दों पर भारत को अपनी ‘सॉफ्ट पॉवर’ की पहचान बनाए रखनी होगी।

साथ ही, सुरक्षा का सवाल भी बड़ा है। अफ़ग़ान भूमि से इस्लामिक स्टेट-ख़ुरासान जैसे समूहों की गतिविधियाँ भारत की चिंता का कारण हैं। पाकिस्तान की सीमा पर बढ़ती अस्थिरता का असर जम्मू-कश्मीर तक पहुँच सकता है। ऐसे में, तालिबान शासन के साथ सीमित लेकिन स्पष्ट संवाद भारत के लिए रणनीतिक आवश्यकता बन गया है।

एक बदलते एशिया की तस्वीर

आज एशिया में शक्ति संतुलन तेजी से बदल रहा है।

चीन की आर्थिक ताक़त, रूस का पुनरुत्थान, ईरान का उभार और अमेरिका का सिमटता प्रभाव — इन सबके बीच भारत एक ‘संतुलक’ भूमिका निभाने की स्थिति में है।

अफ़ग़ानिस्तान इस संतुलन का ‘परीक्षण-क्षेत्र’ बन गया है, जहाँ हर शक्ति अपनी उपस्थिति दर्ज कराना चाहती है।

भारत के लिए यह समय भावनात्मक या वैचारिक रुख से अधिक व्यावहारिक कूटनीति का है — ऐसी नीति जिसमें न तो नैतिकता छूटे, न राष्ट्रीय हित।

निष्कर्ष: संवाद ही स्थिरता की कुंजी

अफ़ग़ानिस्तान में स्थिरता तभी संभव है जब क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय शक्तियाँ इसे एक साझा जिम्मेदारी मानें।

भारत यदि वहां संवाद, विकास और संतुलन के रास्ते पर चलता है, तो वह न केवल अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभाएगा बल्कि दक्षिण एशिया में स्थायी शांति की प्रक्रिया में निर्णायक योगदान भी दे सकता है।

तालिबान चाहे जितना भी बदलने का दावा करे, असली परीक्षा उसके शासन की नहीं बल्कि दुनिया की कूटनीति की है — क्या दुनिया उसे बदलने की दिशा दे पाएगी, या फिर इतिहास एक बार फिर अपने पुराने चक्र में लौटेगा। (एक वैज्ञानिक से मीडिया कर्मी बने डॉ. सलीम ख़ान सार्वजनिक नीतियों पर राजनीतिक विश्लेषक और टिप्पणीकार हैं। वे मुंबई-आधारित मीडिया चैनल NVN के संपादक हैं।)

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